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30July2011

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30July2011 Powered By Docstoc
					                    अजकी शुभ तिति–
          श्रावण ऄमावस्या, तव.सं.-२०६८, शतनवार




                                                (गि ब्लॉगसे अगेका)
                                     अपने       वृत्रासुर,
                                     प्रह्लाद, तवभीषण,
                                     सुग्रीव, हनुमान्,
                                     गजेन्द्र,   जटायु,
                                     िुलाधर         वैश्य,
                                     धममव्याध, कु ब्जा,
व्रजकी गोतपयााँ अददका भी ईद्धार कर ददया, यह देखकर
हमारी तहम्मि होिी है दक अप हमारा भी ईद्धार करें गे ।
जैसे ऄत्यंि लोभी अदमी कू ड़े-कचड़ेमें पड़े पैसेको भी ईठा
लेिा है, ऐसे ही अप भी कू ड़े-कचड़ेमें पड़े हम-जैसोंको ईठा
लेिे हो । िोड़ी बािसे ही अप रीझ जािे हो–‘िुम्ह रीझहु
सनेह सुठठ िोरें ’ (मानस, बालकाण्ड ३४२/२) । कारण दक
अपका स्वाभाव है–
रहिी न प्रभु तचि चूक दकए की । करि सुरति सय बार तहए की ॥
                                 (मानस,बालकाण्ड २९/३)
                स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज
        ऄगर अपका ऐसा स्वाभाव न हो िो हम अपके
नजदीक भी न अ सकें ; नजदीक अनेकी तहम्मि भी न हो
सके ! अप हमारे ऄवगुणोंकी िरफ देखिे ही नहीं । िोड़ा
भी गुण हो िो अप ईस िरफ देखिे हो । वह िोड़ा भी
अपकी दृतिसे है । हे नाि ! हम तवचार करें िो हमारे में
राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ-मोह, ऄतभमान अदद दकिने
ही दोष भरे पड़े हैं ! हमारे से अप ज्यादा जानिे हो, पर
जानिे हुए भी अप ईनको मानिे नहीं–‘जन ऄवगुन प्रभु
मान न काउ’, आसीसे हमारा काम चलिा है प्रभो ! कहीं
अप देखने लग जाओ दक यह कै सा है, िो महाराज ! पोल-
ही-पोल तनकलेगी !

        हे नाि ! तबना अपके कौन सुननेवाला है ? कोइ
जाननेवाला भी नहीं है ! हनुमान्जी तवभीषणसे कहिे हैं
दक मैं चंचल वानरकु लमें पैदा हुअ हाँ । प्रािःकाल जो
हमलोगोंका नाम भी ले ले िो ईस दीन ईसको भोजन न
तमले ! ऐसा ऄधम होनेपर भी भगवान्ने मेरेपर कृ पा की,
दफर िुम िो पतवत्र ब्राह्मणकु लमें पैदा हुए हो ! कानोंसे
ऐसी मतहमा सुनकर ही तवभीषण अपकी शरणमें अये
और बोले–
      श्रवन सुजसु सुनी अयईाँ प्रभु भंजन भव भीर ।
      त्रातह त्रातह अरिी हरन सरन सुखद रघुबीर ॥
                                (मानस, सुन्द्दरकाण्ड ४५)
               स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज
       जो अपकी शरणमें अ जािा है, ईसकी अप रक्षा
करिे हो, ईसको सुख देिे हो, यह अपका स्वाभाव है–
   ऐसो ईदार को जग माहीं ।
   तबनु सेवा जो रवै दीन पर, राम सठरस कोई नाहीं ॥
                                 (तवनयपतत्रका १६२)
    यतह दरबार दीन को अदर, रीति सदा चतल अइ ।
                               (तवनयपतत्रका १६५/५)
       हरे क दरबारमें दीनका अदर नहीं होिा । जबिक
हमारे पास कु छ धन-सम्पति है, कु छ गुण है, कु छ योग्यिा
है िभीिक दुतनया हमारा अदर करिी है । दुतनया िो
हमारे गुणोंका अदर करिी है, हमारा खुदका (स्वरूपका)
नहीं । परन्द्िु अप हमारा खुदका अदर करिे हो, हमें
ऄपना ऄंश मानिे हो–‘ममैवांशो जीवलोके ’ (गीिा १५/७),
‘सब मम तप्रय सब मम ईपजाए’ (मानस, ईिरकाण्ड ८६/२) ।
हमें ऄपना ऄंश मानिे ही नहीं, स्पििया जानिे हो और
ऄपना जानकर कृ पा करिे हो । हमारे ऄवगुणोंकी िरफ अप
देखिे ही नहीं । बच्चा कै सा ही हो, कु छ भी करे , पर ‘ऄपना
है’–यह जानकर मााँ कृ पा करिी है, नहीं िो मुफ्िमें कौन
अफि मोल ले महाराज ?
 (शेष अगेके ब्लॉगमें)             –‘सब जग इश्वररूप है’ पुस्िकसे

                  स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज

				
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posted:7/30/2011
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