GURUTVA JYOTISH OCT-2010 by GURUTVAKARYALAY

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									                                 Font Help >> http://gurutvajyotish.blogspot.com

गु   व कायालय   ारा   तुत मािसक ई-प का                        ू
                                                           अ टबर-2010




                                    NON PROFIT PUBLICATION
                                                              2                                            ू
                                                                                                        अ टबर 2010



           FREE                                 य आ मय
        E CIRCULAR                                    बंधु/ ब हन
गु      व     योितष प का
                                                                     जय गु दे व
संपादक                                           युग-युगांतर से विभ न समय पर दै वीय श                   यां उ प न होकर अपने

            िचंतन जोशी                     लीलाएं    बखेरती रह ं।    जसाका      व तृ त वणन हमारे वेद, पुराण व शा          मे
                                           िमलता ह।
संपक
                                                 जब-जब कसी आसुर श              ने अ याचार व ाकृ ितक आपदाओं ारा दे वता-
गु     व    योितष वभाग                     मानव जीवन को तबाह करने क कोिशश क ह, तब-तब कसी न कसी दै वीय श

गु      व कायालय                                                                     े
                                           का अवतरण हआ। इसी कार जब म हषासुरा द दै य क अ याचार से भूलोक व
                                                     ु
                                                      ु
                                           दे वलोक याकल हो उठा तब परम पता परमे र क ेरणा से सभी दे व गण ने एक
92/3. BANK COLONY,
BRAHMESHWAR PATNA,                         अ तश
                                             ु         का सृ जन कया जो आ द श                          े
                                                                                         माँ जगदं बा क नाम से स पूण     ा डम
BHUBNESWAR-751018,                          या हवां। ज ह ने म हषासुर इ या द दै य का वध कर भूलोक व दे वलोक लोक
                                                ु
(ORISSA) INDIA                             म पुनः ाण श      वर ाश       का संचार कर दया ह।
फोन                                              दे वी भागवत, सूय पुराण, िशव पुराण, भागवत पुराण, मारक डे य इ या द
91+9338213418,                             पुराण म िशव-श       क क याणकार कथाओं का अ तीय वणन कयागया ह।
91+9238328785,                                      नवरा    े
                                                           क नौ दन पव पूण आ था,                  ा, भ               े
                                                                                                          व हष लास क साथ
                                           संयम एवं प व ता को मह व दे ते हव नव दे वय
                                                                          ु                       क आराधना कर आप अपने
ईमेल
                                           प रवार क उ नित, सुख एवं समृ               ा               े
                                                                                           कर, जीवन क भयंकर रोग, क ,
     gurutva.karyalay@gmail.com,
                                           दःख-द र ता से छटकारा
                                            ु             ु             पाने     म   माँ जगदं बा        आपक    सहायता    कर
      gurutva_karyalay@yahoo.in,
                                           शुभकामनाएं।
वेब                                                                                           े
                                                                  सवमंगल-मांग ये िशवेसवाथसािधक ।
http://gk.yolasite.com/                                                े
                                                             शर ये य बक गौ र नाराय ण नमोऽ तुते॥
http://www.gurutvakaryalay.blogspot.com/
                                                              सृ      थित वनाशानां श         भूते सनातिन।
प का        तुित                                               गुणा ये गुणमये नाराय ण नमोऽ तुते॥
िचंतन जोशी,        व तक.ऎन.जोशी अथात: हे दे वी नारायणी आप सब कार का मंगल दान करने वाली मंगलमयी हो।
फोटो       ाफ स                            क याण दाियनी िशवा हो। सब पु षाथ को िस                करने वाली शरणा गतव सला
                                           तीन ने    वाली गौर हो, आपको नम कार ह। आप सृ              का पालन और संहार करने
िचंतन जोशी,        व तक आट
                                           वाली श     भूता सनातनी दे वी, आप गुण का आधार तथा सवगुणमयी हो। नारायणी
हमारे मु य सहयोगी                          दे वी तु ह नम कार है ।

 व तक.ऎन.जोशी                                                                                               िचंतन जोशी
( व तक सो टे क इ डया िल)

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                                                    3                               ू
                                                                                 अ टबर 2010



                                             वशेष लेख
नवदगा और योितष
   ु                                         14              े
                                                    माँ दगा क अचुक भावी मं
                                                         ु                                    17
नवदगा आराधना का मह व
   ु                                         16     मातृ सुख एवं योितष                        36


                                                  अनु म
  थम शैलपु ी                                 4          ुं
                                                    िस क जका तो म ्                           42

  तीयं        चा रणी                         5      दगा कम ्
                                                     ु                                        43
तृ तीयं च     घ टा                           6      भवा य कम ्                                44
      ू
चतुथ क मा डा                                 7      दे व ितमा                                 45
      ं
पंचम कदमाता                                  8      दगा ो र शतनाम तो म ्
                                                     ु                                        46
ष म ् का यायनी                               9      व ंभर      तुित                           47
स म कालरा                                    10     पित-प ी म कलह िनवारण हे तु                48
अ म महागौर                                   11     म हषासुरम दिन तो म ्                      49
नवम ् िस दा ी                                12     तुलसी सेवन करते समय रखे सावधानी           51
         े
मां दगा क नव प क उपासना
     ु                                       13     करवा चौथ त                                53
  मुख श       पीठ म होती ह वशेष पूजा         21        ू
                                                    अ टबर 2010 मािसक पंचांग                   54
शारद य नवरा           े
                   त क लाभ                   24        ू
                                                    अ टबर -2010 मािसक त-पव- यौहार             56

नवरा      त                                  25        ू
                                                    अ टबर २०१० वशेष योग                       58
  भाते कर दशनम ्                             26                  ू
                                                        ह चलन अ टबर-2010                      59
नवरा म क या पूजन अनु ान                      30     मािसक रािश फल                             60
दगा चालीसा
 ु                                           32     दै िनक शुभ एवं अशुभ समय                   61
शाप वमोचन मं                                 33     चौघ डये                                   62
  ीकृ ण कृ त दे वी तुित                      34     वा तु परामश                               63
     े
मां क चरण िनवास करते सम त ह तीथ              35         योितष परामश                           64
दे वी आराधना से सुख        ाि                39
ऋ वेदो      दे वी सू म ्                     40
 विभ न दे वी क              े
                     स नता क िलये गाय ी मं   40
स त लोक दगा
         ु                                   41
दगा आरती
 ु                                           41

                                             लघु कथाएं
  वाला मां का परम भ                          27                 े
                                                    पु चार कार क होते ह                       38
मातृ भ                                       38
                                                            4                                      ू
                                                                                                अ टबर 2010



                                                        थम शैलपु ी

                                                                                                        िचंतन जोशी
         नवरा    के              े
                      थम दन मां क शैलपु ी                                                           े
                                                 व प का पूजन करने का वधान ह। पवतराज (शैलराज) हमालय क यहां
पावती     प म ज म लेने से भगवती को शैलपु ी कहा जाता ह।
                        े
         भगवती नंद नाम क वृ षभ पर सवार ह।                         े
                                                    माता शैलपु ी क दा हने हाथ म         शूल और बाएं हाथ म कमल पु प
सुशोिभत ह।
         मां शैलपु ी को शा                 े
                               म तीनो लोक क सम त व य जीव-जंतुओं का र क माना गया ह। इसी कारण से व य
                                            े
जीवन जीने वाली स यताओं म सबसे पहले शैलपु ी क मं दर क                   थापना क जाती ह जस स उनका िनवास             थान
       े
एवं उनक आस-पास के          थान सुर    त रहे ।


मूल मं :-
व दे वांिछतलाभाय च दाधकृ तशेखराम। वृ षा ढां शूलधरां शैलपु ीं यश वनीम।।
                                ्                                   ्


 यान मं :-
व दे वांिछतलाभायाच       ाघकृ तशेखराम। वृ षा ढांशूलधरांशैलपु ीयश वनीम।
                                     ्                               ्
पूणे दिनभांगौर मूलाधार
      ु                      थतां थम दगा
                                      ु         ने ा।
पटा बरप रधानांर       कर ठांनानालंकारभू षता।
  ु                               ु
 फ ल वंदना प लवाधंराकातंकपोलांतुगकचाम।
                                     ्
कमनीयांलाव यां मेरमुखी ीणम यांिनत बनीम।
                                      ्


 तो :-
 थम दगा
     ु          वं हभवसागर तारणीम। धन ऐ य दायनींशैलपु ी णमा हम।
                                 ्                            ्
चराचरे र वं हमहामोह वनािशन। भु           मु     दायनी,शैलपु ी णमा यहम।
                                                                     ्


कवच:-
ओमकार: मेिशर: पातुमूलाधार िनवािसनी। ह ंकारपातुललाटे बीज पामहे र ।                  ींकारपातुवदनेल जा पामहे र । हंु कार
पातु दयेता रणी श         वघृ त। फ कार:पातुसवागेसव िस       फल दा।


         मां शैलपु ी का मं - यान-कवच- का विध- वधान से पूजन करने वाले                य      को सदा धन-धा य से संप न
रहता ह। अथात उसे जवन म धन एवं अ य सुख साधनो को कमी महसुस नह ं होतीं।
         नवरा    के   थम दन क उपासना से योग साधना को            ारं भ करने वाले योगी अपने मन से 'मूलाधार' च   को जा त
कर अपनी उजा श           को क त करते ह, जससे उ ह अनेक              कार क िस यां एवं उपल धयां        ा    होती ह।
                                                           ***
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                                                                                                   अ टबर 2010



                                                        तीयं           चा रणी
                                                                                                         िचंतन जोशी
         नवरा       े ू
                   क दसरे दन मां के          चा रणी     व प का पूजन करने का वधान ह। यो क                का अथ ह तप। मां
   चा रणी तप का आचरण करने वाली भगवती ह इसी कारण उ ह                             चा रणी कहा गया।
         शा ो म मां          चा रणी को सम त व ाओं क               ाता माना गया ह। शा ो म                        े
                                                                                                  चा रणी दे वी क व प का
वणन पूण          योितमय एवं अ यंत द य दशाया गया ह।
         मां       चा रणी     ेत व            े
                                      पहने उनक दा हने हाथ म अ दल क जप माला एवं बाय हाथ म कमंडल सुशोिभत
रहता ह। श            व पा दे वी ने भगवान िशव को         ा         े
                                                            करने क िलए 1000 साल तक िसफ फल खाकर तप या रत रह ं
                                                                            े
और 3000 साल तक िशव क तप या िसफ पेड़ से िगर प यां खाकर क, उनक इसी क ठन तप या क कारण उ ह
   चा रणी नाम से जाना गया।


मं :
दधानापरप ा याम मालाककम डलम। दे वी
                          ्                         सीदतु मिय         चा र यनु मा।।

 यान:-
व दे वांिछत लाभायच           ाघकृ तशेखराम।
                                         ्
जपमालाकम डलुधरां             चा रणी शुभाम।
                                         ्
गौरवणा वािध ान थतां तीय दगा
                         ु                  ने ाम।
                                                 ्
धवल प रधानां           पांपु पालंकारभू षताम।
                                           ्
पदमवंदनांप लवाधरांकातंकपोलांपीन पयोधराम।
                                       ्
कमनीयांलाव यां मेरमुखींिन न नािभंिनत बनीम।।
                                         ्

 तो :-
तप ा रणी वं हताप यिनवारणीम।
                          ्                  पधरा     चा रणीं णमा यहम।।
                                                                     ्
नवच भेदनी वं हनवऐ य दायनीम। धनदासुखदा
                          ्                                 चा रणी      णमा यहम॥
                                                                               ्
शंकर या वं हभु         -मु     दाियनी शांितदामानदा      चा रणी    णमा यहम।
                                                                         ्

कवच:-
  पुरा         मेहदयेपातुललाटे पातुशंकरभािमनी।        अपणासदापातुने ोअधरोचकपोलो॥         पंचदशीक ठे पातुम यदे शेपातुमाहे र
षोडशीसदापातुनाभोगृ होचपादयो। अंग             यंग सतत पातु        चा रणी॥


मं - यान-कवच- का विध- वधान से पूजन करने वाले य                          को अनंत फल क     ाि   होती ह। य     म तप, याग,
सदाचार, संयम जैसे स           गुण    क वृ    होती ह।


                                                                 ***
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                                                                                                          अ टबर 2010



                                                           तृ तीयं च         घ टा
                                                                                                                 िचंतन जोशी
           नवरा     े              े
                   क तीसरे दन मां क च              घ टा     व प का पूजन करने का वधान ह। च               घ टा का व प शांितदायक
और परम क याणकार ह। च                         े              े
                                       घ टा क म तक पर घ टे क आकार का अधच                       शोिभत रहता ह । इस िलये मां को
च      घ टा दे वी कहा जाता ह। च                े
                                         घ टा क दे ह का रं ग                े
                                                                        वण क समान चमक ला ह और दे व उप थित म चार तरफ
अ त तेज दखाई दे ता ह।
  ु
           मां तीन ने    एवं दस भुजाए ह, जसम कमल, धनुष-बाण, ख ग, कमंडल, तलवार,                          शूल और गदा आ द अ -
                                 े ं     े
श , बाण आ द सुशोिभत रहते ह। मां क कठ म सफद पु प                                                          ु
                                                                             क माला और शीष पर र ज ़डत मुकट शोभायमान ह।
च      घ टा का वाहन िसंह ह, इनक मु ा यु                    े                            े
                                                          क िलए तैयार रहने क होती ह। इनक घ टे सी भयानक              चंड   विन से
अ याचार दै य, दानव, रा स व दै व भयिभत रहते ह।

मं :
प डज                        ै
            वरा ढ़ा च डकोपा कयु ता।            सादं तनुते महयं च दघ टे ित व ु ता।।

 यान:-
व दे वांिछत लाभायच           ाघकृ तशेखराम।
                                         ्
िसंहा ढादशभुजांच        घ टायश वनीम॥
                                   ्
 ं
कचनाभांम णपुर        थतांत ृ तीय दगा
                                  ु     ने ाम।
                                             ्
खंग गदा       शूल चापहरं पदमकम डलु माला वराभीतकराम।
                                                  ्
पटा बरप रधांनामृदहा यांनानालंकारभू षताम।
                 ु                     ्
             े    ं       ु
मंजीर, हार, कयूर क क णर नक डलम डताम॥
                                   ्
  ु                               ु
 फ ल वंदना बबाधाराकातंकपोलांतुंग कचाम।
                                     ्
                  ं
कमनीयांलाव यां ीणक टिनत बनीम॥
                            ्

    ोत:-
आपद ु ा रणी       वं हआघाश      : शुभा पराम। म णमा दिस दधदा ीच
                                           ्                                घ टे णभा यहम॥
                                                                                        ्
च    मुखीइ दा ी इ       मं     व पणीम। धनदा ीआनंददा ीच
                                     ्                           घ टे णमा यहम॥
                                                                             ्
नाना पधा रणीइ छामयीऐ यदायनीम। सौभा यारो यदायनीच
                            ्                                       घ टे णमा यहम॥
                                                                                ्

कवच:-
रह यं       ुणुव यािमशैवेशीकमलानने।          ी च    घ टा यकवचंसविस             दायकम॥ बना
                                                                                    ्        यासं बना    विनयोगं बना शापो ार बना
                 ं
होमं। नानंशौचा दकना त                        ् ु       ु
                                  ामा ेणिस दम॥ किश यामक टलायवंचकायिन दाकायच। न दात यंन दात यंपदात यंकदािचतम॥
                                                                                                           ्


मं - यान-कवच- का विध- वधान से पूजन करने से                          य       का म णपुर च     जा त हो जाता ह। उपासना से          य
को सभी पाप से मु                िमलती ह उसे सम त सांसा रक आिध- यािध से मु                                 े
                                                                                              िमलती ह। इसक उपरांत         य        को
िचरायु, आरो य, सुखी और संप न होनता                  ा     होती ह।       य     क साहस एव वरता म वृ
                                                                               े                          होती ह।   य         वर म
               े
िमठास आती ह उसक आकषण म भी वृ                         होती ह। च      घ टा को       ान क दे वी भी माना गया है ।
                                                           7                                  ू
                                                                                           अ टबर 2010



                                                        ू
                                                  चतुथ क मा डा
                                                                                               िचंतन जोशी
           नवरा    े             े ू
                  क चतुथ दन मां क क मा डा         व प का पूजन करने का वधान ह। अपनी मंद हं सी      ारा   ा ड को
                 े               ू
उ प न कया था इसीक कारण इनका नाम क मा डा दे वी रखा गया।
           शा ो    उ लेख ह, क जब सृ           का अ त व नह ं था, तो चार तरफ िसफ अंधकार         ह था। उस समय
 ू
क मा डा दे वी ने अपने मंद सी हा य से             ांड क उ प         ू                  े
                                                               क। क मा डा दे वी सूरज क घेरे म िनवास करती ह।
        ू             े
इसिलये क मा डा दे वी क अंदर इतनी श                                               ू
                                                ह, जो सूरज क गरमी को सहन कर सक। क मा डा दे वी को जीवन क
श          दान करता माना गया ह।
            ू
           क मा डा दे वी का   व प अपने वाहन िसंह पर सवार ह, मां अ                      े
                                                                       भुजा वाली ह। उनक म तक पर र        ज ़डत
   ु
मुकट सुशोिभत ह, ज से उनका             व प अ यंय उ जवल                         े
                                                               ितत होता ह। उनक हाथम हाथ म        मश: कम डल,
माला, धनुष-बाण, कमल, पु प, कलश, च           तथा गदा सुशोिभत रहती ह।

मं :
                                                ु
सुरास पूण कलशं िधरा लुतमेव च। दधाना ह तप ा यां क मांडा शुभदा तुमे।।

 यान:-
व दे वांिछत कामथच         ाघकृ तशेखराम।
                                      ्
               ु
िसंह ढाअ भुजा क मा डायश वनीम॥
                            ्
भा वर भानु िनभांअनाहत          थतांचतुथ दगा
                                         ु      ने ाम।
                                                     ्
कम डलु चाप, बाण, पदमसुधाकलशच              गदा जपवट धराम॥
                                                       ्
पटा बरप रधानांकमनीयाकृ दहग यानानालंकारभू षताम।
                        ु                    ्
           े    ं      ु
मंजीर हार कयूर क कणर नक डलम डताम।
                                ्
  ु
 फ ल वदनांना           ु                   ू
                    िचककांकांत कपोलांतुंग कचाम।
                                              ्
कोलांगी मेरमुखीं ीणक टिन ननािभिनत बनीम॥
                                      ्

    ोत:-
                                             ू
दगितनािशनी वं हदा र ा द वनािशनीम। जयंदाधनदांक मा डे णमा यहम॥
 ु                              ्                          ्
                                      ू
जग माता जगतक ीजगदाधार पणीम। चराचरे र क मा डे णमा यहम॥
                          ्                         ्
                                              ू
 ैलो यसुंदर वं हद:ख शोक िनवा रणाम। परमानंदमयीक मा डे णमा यहम॥
                 ु               ्                          ्

कवच:-
                 ू
हसरै मेिशर: पातुक मा डे भवनािशनीम। हसलकर ंने थ,हसरौ ललाटकम॥ कौमार पातुसवगा ेवाराह उ रे तथा। पूव
                                 ्                        ्
पातुवै णवी इ      ाणी द                    ूं
                           णेमम। द दधसव ैवकबीजंसवदावतु॥

मं - यान-कवच- का विध- वधान से पूजन करने वाले य                 का अनाहत च                   ू         े
                                                                            जा त हो ह। मां क मा डाका क पूजन
से सभी            े
             कार क रोग, शोक और      लेश से मु     िमलती ह, उसे आयु य, यश, बल और बु     ा    होती ह।
                                                               8                                 ू
                                                                                              अ टबर 2010



                                                     पंचम       ं
                                                               कदमाता
                                                                                                     िचंतन जोशी
           नवरा   के     पांचव    दन मां के      कदमाता
                                                  ं        व प का पूजन करने का                ं
                                                                                     वधान ह। कदमाता       ु
                                                                                                         कमार अथात ्
     े              े
काितकय क माता होने क कारण, उ ह                   क दमाता क नाम से जाना जाता ह।
                                                          े                          िसंह और मयूर    ं      े
                                                                                                    कदमाता क वाहन
ह। दे वी      ं          े                                                             े
             कदमाता कमल क आसन पर प ासन क मु ा म वराजमान रहती ह, इसिलए उ ह प ासन दे वी क नाम से
भी जाना जाता ह।            ं
                          कदमाता का                               े
                                          व प चार भुजा वाला ह। उनक दोन हाथ म कमलदल िलए हए ह, उनक दा हनी
                                                                                        ु
तरफ क ऊपर वाली भुजा म                    व प     क    कमार को अपनी गोद म िलये हए ह। और
                                                       ु                       ु              ं      े
                                                                                             कदमाता क दा हने तरफ
क नीचे वाली भुजा वरमु ाम ह।               ं
                                         कदमाता यह     व प परम क याणकार मनागया ह।

मं :
िसंहासानगता िनतयं प ाि तकर या। शुभदा तु सदा दे वी           क दमाता यश वनी।।

 यान:-
व दे वांिछत कामथच         ाघकृ तशेखराम। िसंहा ढाचतुभुजा क धमातायश वनीम॥
                                      ्                               ्
धवलवणा वशु        च     थतांपंचम दगा
                                  ु       ने ाम। अभय पदमयु म करांद      ण
                                                                  े
उ पु धरामभजेम॥ पटा बरप रधानाकृ दह सयानानालंकारभू षताम। मंजीर हार कयूर
             ्                  ु                    ्
 ं      ु
क क णर क डलधा रणीम।। भु लवंदनाप लवाधरांकांत कपोलांपीन पयोधराम।
                                                             ्
कमनीयांलाव यांजा         वलींिनत बनीम॥
                                     ्

 तो :-
नमािम      क धमाता क धधा रणीम। सम त वसागरमपारपारगहराम॥
                             ्                       ्
                ु
िश भांसमु वलां फर छशागशेखराम। ललाटर नभा कराजगत द भा कराम॥
                            ्                           ्
महे                  ु
       क यपािचतांसन कमारसं तुताम। सुरासेरे
                                ्                 व दतांयथाथिनमलादभुताम॥
                                                                       ्
मुमु ुिभ विच ततां वशेषत वमूिचताम। नानालंकारभू षतांकृगे
                                ्                            वाहना ताम।।
                                                                      ्
सुशु त वातोषणां वेदमारभषणाम। सुधािमककौपका रणीसुरे
                           ्                                वै रघाितनीम॥
                                                                       ्
शुभांपु पमािलनीसुवणक पशा खनीम। तमोअ कारयािमनीिशव वभावकािमनीम॥
                             ्                              ्
सह सूय रा जकांधन जयो का रकाम। सुशु काल क दलांसुभ ृडकृ दम जुलाम॥
                            ्                                 ्
 जाियनी जावती नमािममातरं सतीम। वकमधारणेगितंह र य छपावतीम॥
                             ्                          ्
इन तश       का तदांयशोथमु        दाम। पुन:पुनजग तांनमा यहं सुरािचताम॥
                                    ्
जये    र लाचने सीददे व पा हमाम॥
                              ्

कवच:-
ऐं बीजािलंकादे वी पदयु मधरापरा। दयंपातुसा दे वी काितकययुता॥ ींह ं हंु ऐं दे वी पूव यांपातुसवदा। सवाग म सदा
पातु क धमातापु         दा॥ वाणवाणामृ तेहु ं फ   बीज सम वता। उ र यातथा नेचवा णेने तेअवतु॥ इ   ाणी भैरवी
चैवािसतांगीचसंहा रणी। सवदापातुमां दे वी चा या यासु ह द वै॥

मं - यान-कवच- का विध- वधान से पूजन करने वाले य                     का वशु    च    जा त होता ह। य     क सम त
इ छाओं क पूित होती ह एवं जीवन म परम सुख एवं शांित                  ा    होती ह।
                                                               9                                ू
                                                                                             अ टबर 2010



                                                      ष म ् का यायनी
                                                                                                    िचंतन जोशी
         नवरा   के               े
                      छठ दन मां क का यायनी            व प का पूजन करने का वधान ह। मह ष का यायन क पु ी होने के
                   े
कारण उ ह का यायनी क नामसे जाना जाता ह। का यायनी माता का ज म आ                       न कृ ण चतुदशी को हवा था, ज म
                                                                                                      ु
 े
क प याता मां का यायनी ने शु ल स मी, अ मी तथा नवमी तक तीन दन तक का यायन ऋ ष क पूजा                                  हण
कथी एवं वजया दशमी को म हषासुर का वध कया था।
         दे वी का यायनी का वण               े
                                        वण क समान चमक ला ह, इस कारण दे वी का यायनी का             व प अ यंत ह भ य
एवं द य                                              े
            ितत होता ह। का यायनी क चार भुजाएं ह। उनेक दा हनी तरफ का ऊपर वाला हाथ अभय मु ाम है, तथा
                            े
नीचे वाला वरमु ाम, बाई तरफ क ऊपर वाले हाथ म कमल पु प सुशोिभत ह, नीचे वाले हाथम तलवार सुशोिभत रहती
ह। का यायनी दे वी अपने वाहन िसंह वराजन होती ह।

मं :
चं हासो जवलकरा शाइलवरवाहना। का यायनी शुभं द ा े वी दानवघाितनी।।

 यान:-
व दे वांिछत मनोरथाथच         ाघकृ तशेखराम। िसंहा ढचतुभु जाका यायनी यश वनीम॥
                                         ्                                ्
 वणवणाआ ाच           थतांष    दगा
                               ु    ने ाम। वराभीतंकरांषगपदधरांका यायनसुतांभजािम॥
                                                    े    ं      ु
पटा बरप रधानां मेरमुखींनानालंकारभू षताम। मंजीर हार कयुर क क णर क डलम डताम।।
                                       ्                                 ्
                               ु
 स नवंदनाप जवाधरांकातंकपोलातुगकचाम। कमनीयांलाव यां वली वभू षतिन न नािभम॥
                                  ्                                    ्

 तो :-
 ं                     ु
कचनाभां कराभयंपदमधरामुकटो वलां। मेरमुखीिशवप ीका यायनसुतेनमोअ तुते॥
पटा बरप रधानांनानालंकारभू षतां। िसंहा थतांपदमह तांका यायनसुतेनमोअ तुते॥
परमदं दमयीदे व पर        परमा मा। परमश        ,परमभ    ् का यायनसुतेनमोअ तुते॥
व कत , व भत , व हत , व              ीता। व ािचतां, व ातीताका यायनसुतेनमोअ तुते॥
कां बीजा, कां जपानंदकां बीज जप तो षते। कां कां बीज जपदास ाकां कां स तुता॥
कांकारह षणीकां धनदाधनमासना। कां बीज जपका रणीकां बीज तप मानसा॥
                                                 ूं ै
कां का रणी कां मू पू जताकां बीज धा रणी। कां क ं कक क:ठ:छ: वाहा पणी॥

कवच:-
का यायनौमुख पातुकां कां             वाहा व पणी। ललाटे वजया पातुपातुमािलनी िन य संदर ॥ क याणी               दयंपातुजया
भगमािलनी॥


मं - यान-कवच- का विध- वधान से पूजन करने वाले                    य     का आ ा च     जा त होता ह।     दे वी का यायनी के
पूजन से रोग, शोक, भय से मु            िमलती ह। का यायनी दे वी को वै दक युग म ये ऋ ष-मुिनय को क           दे ने वाले र -
दानव, पापी जीव को अपने तेज से ह न              कर दे ने वाली माना गया ह।
                                                                10                                      ू
                                                                                                     अ टबर 2010



                                                        स म कालरा
                                                                                                           िचंतन जोशी
          नवरा    के                     े
                            सातव दन मां क कालरा         व प का पूजन करने का वधान ह। कालरा                    े
                                                                                                      दे वी क शर र का रं ग
                                   े     ै
घने अंधकार क तरह एकदम काला ह, िसर क बाल फलाकर रखने वाली ह।
          कालरा        का    व प तीन ने    वाला एवं गले म चमकने वाली माला धारण करने वाली ह। कालरा                  क आंख
से अ न क वषा होती है एवं नािसका के               ास म अ न क भंयकर               वालाएं िनकलती रहती ह। कालरा      े
                                                                                                                क ऊपर उठे
               े
हए दा हने हाथ क वरमु ासे सभी मनु यो को वर
 ु                                                         दान करती ह। दा हनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभयमु ाम ह।
एक हाथ से श ुओं क गदन पकडे हए ह, दसरे हाथ म ख ग-तलवार श
                            ु     ू                                                     से श ु का नाश करने वाली कालरा
वकट        प म अपने वाहन गदभ(गधे) वराजमान ह।


मं ः
एक वेधी जपाकणपूरा न ना खरा थता। ल बो ी क णकाकणी तैला य शर रणी।।
वामपदो लस लोहलताक टक भूषणा। वधनमूध वजा कृ णा कालरा भयंकर ।।

 यान:-
                   े
करालवदनां घोरांमु कशींचतुभुताम। कालरा ंकरािलंका द यां व ु माला वभू षताम॥
                              ्                                        ्
द य लौहव ख ग वामाघो वकरा बुजाम। अभयंवरदांचैवद
                              ्                                णो वाघ:पा णकाम॥
                                                                             ्
महामेघ भां यामांतथा चैपगदभा ढां। घोरदं ाकाराला यांपीनो नतपयोधराम॥
                                                                ्
सुख       स न वदना मेरानसरो हाम। एवं संिचय तये कालरा ंसवकामसमृ
                               ्                                                धदाम॥
                                                                                    ्


 तो :-
ह ं कालरा         ींकराली च लींक याणी कलावती।
कालमाताकिलदप नीकमद ंशकृ प वता॥
                          ु      ु           ु
कामबीजजपा दाकमबीज व पणी। कमितघनीकलीनाितनिशनीकल कािमनी॥
 लींह ं     ींमं वणनकालक टकघाितनी। कृ पामयीकृ पाधाराकृ पापाराकृ पागमा॥


कवच:-
ॐ      लींम हदयंपातुपादौ ींकालरा । ललाटे सततंपातुद ु        हिनवा रणी॥ रसनांपातुकौमार भैरवी च ुणोमम
हौपृ ेमहे शानीकण शंकरभािमनी। व जतािनतु थानािभयािनचकवचेन ह। तािनसवा णम दे वी सततंपातु त भनी॥


मं - यान-कवच- का विध- वधान से पूजन करने वाले य                       का भानु च       जा त होता ह। कालरा      े
                                                                                                            क पूजन से
अ न भय, आकाश भय, भूत पशाच इ याद श                       यां कालरा    दे वी के    मरण मा   से ह भाग जाते ह, कालरा         का
 व प दे खने म अ यंत भयानक होते हवे भी सदै व शुभ फल दे ने वाला होता ह, इस िलये कालरा
                                ु                                                                         को शुभंकर के
नामसे भी जाना जाता ह। कालरा               श ु एवं द ु   का संहार कर ने वाली दे वी ह।
                                                              11                                  ू
                                                                                               अ टबर 2010



                                                  अ म महागौर
                                                                                                   िचंतन जोशी
         नवरा     के               े
                       आठव दन मां क महागौर        व प का पूजन करने का वधान ह। महागौर          व प उ जवल, कोमल,
  ेतवणा तथा        ेत व धार ह। महागौर म तक पर च                     ु                         े
                                                              का मुकट धारण कये हए ह। का तम ण क समान का त
                                                                                ु
वाली दे वी जो अपनी चार भुजाओं म                                                       े
                                            मशः शंख, च , धनुष और बाण धारण कए हए ह, उनक कान म र
                                                                              ु
     ु                                  े
ज डतक डल झलिमलाते रहते ह। महागौर वृ षभ क पीठ पर वराजमान ह। महागौर गायन एवं संगीत से                       स न होने
वाली 'महागौर ' माना जाता ह।

मं :
  ेते वृ षे सम ढ़ा ेता बराधरा शुिच:। महागौर शुभं द ा महादे व मोददा।।

 यान:-
व दे वांिछत कामाथच          ाघकृ तशेखराम।
                                        ्
िसंहा ढाचतुभु जामहागौर यश वीनीम॥
                               ्
पुणे दिनभांगौर सोमव
      ु                      थतांअ म दगा
                                      ु        ने म।
वराभीितकरां शूल ढम धरांमहागौर ंभजेम॥
                                   ्
पटा बरप रधानामृ दु हा यानानालंकारभू षताम।
                                        ्
             े     ं
मंजीर, कार, कयूर, क क णर          ु
                                 क डल म डताम॥
                                            ्
  ु
 फ ल वदनांप लवाधरांकांत कपोलांचैवो यमोहनीम।
                                          ्
कमनीयांलाव यांम ृ णालांचंदन ग ध िल ाम॥
                                     ्

 तो :-
सवसंकट हं ी वं हधन ऐ य            दायनीम।
                                        ्
  ानदाचतुवदमयी,महागौर णमा यहम॥
                             ्
सुख शांित दा ी, धन धा य         दायनीम।
                                      ्
डम वाघ या अघा महागौर णमा यहम॥
                            ्
 ैलो यमंगला वं हताप य णमा यहम।
                             ्
वरदाचैत यमयीमहागौर णमा यहम॥
                          ्

कवच:-
ओंकार: पातुशीष मां, ह ं बीजंमां     दयो। लींबीजंसदापातुनभोगृ होचपादयो॥ ललाट कण ,हंू , बीजंपात महागौर मां ने   ाण ।
कपोल िचबुकोफ           पातु वाहा मां सववदनो॥


मं - यान-कवच- का विध- वधान से पूजन करने वाले य                     का सोमच                        े
                                                                             जा त होता ह। महागौर क पूजन से य
 े                             े                     े                  े
क सम त पाप धुल जाते ह। महागौर क पूजन करने वाले साधन क िलये मां अ नपूणा क समान, धन, वैभव और
सुख-शांित       दान करने वाली एवं    संकट से मु        दलाने वाली दे वी महागौर ह।
                                                              12                                    ू
                                                                                                 अ टबर 2010



                                                     नवम ् िस दा ी
                                                                                                    िचंतन जोशी
             नवरा   के               े
                         नौव दन मां क िस दा ी        व प का पूजन करने का वधान ह।
दे वी    िस दा ी का                                                         े
                          व प कमल आसन पर वरा जत, चार भुजा वाला, दा हनी तरफ क नीचे वाले हाथ म च , ऊपर
वाले हाथ म गदा, बाई तरफ से नीचे वाले हाथ म शंख और ऊपर वाले हाथ म कमल पु प सुशोिभत रहते ह।

मं      : िस गंधवय ा ैरसुरैररमरै र प। से यमाना सदा भूयात िस दा िस दाियनी।।

 यान:-
व दे वांिछतमनरोराथच          ाघकृ तशेखराम।
                                         ्
कमल थताचतुभु जािस            यश वनीम॥
                                    ्
  वणावणािनवाणच             थतानवम् दगा
                                    ु       ने ाम।
शंख, च , गदा पदमधरा िस दा ीभजेम॥
                               ्
पटा बरप रधानांसुहा यानानालंकारभू षताम।
                                     ्
            े     ं      ु
मंजीर, हार कयूर, क क णर क डलम डताम॥
                                  ्
   ु
  फ ल वदनाप लवाधराकांत कपोलापीनपयोधराम।
                                      ्
कमनीयांलाव यां ीणक टं िन ननािभंिनत बनीम॥
                                       ्


  तो :-
 ं                    ु
कचनाभा शंखच गदामधरामुकटो वलां। मेरमुखीिशवप ीिस                  दा ीनमोअ तुते॥
पटा बरप रधानांनानालंकारभू षतां। निलन थतांपिलना ींिस दा ीनमोअ तुते॥
परमानंदमयीदे व पर           परमा मा। परमश       ,परमभ   िस दा ीनमोअ तुते॥
 व कतीं व भत व हतीं व            ीता। व िचता व तीतािस         दा ीनमोअ तुते॥
भु      मु    कारणीभ क िनवा रणी। भवसागर ता रणी िस दा ीनमोअ तुते।।
धमाथकाम दाियनीमहामोह वनािशनी। मो दाियनीिस                दा ीिस दा ीनमोअ तुते॥


कवच:-
ओंकार: पातुशीष मां, ऐं बीजंमां       दयो। ह ं बीजंसदापातुनभोगृ होचपादयो॥ ललाट कण ींबीजंपातु लींबीजंमां ने    ाणो।
कपोल िचबुकोहसौ:पातुजग          सू यैमां सव वदनो॥


मं - यान-कवच- का विध- वधान से पूजन करने वाले य                     का िनवाण च                          े
                                                                                 जा त होता ह। िस दा ी क पूजन से
 य           क सम त कामनाओं क पूित होकर उसे ऋ , िस               क    ाि   होती ह। पूजन से यश, बल और धन क       ाि
काय म चले आ रहे बाधा- व न समा                हो जाते ह। य      को यश, बल और धन क       ाि   होकर उसे मां क कृ पा से
धम, अथ, काम और मो             क भी     ाि    वतः हो जाती ह।
                                                                 13                                            ू
                                                                                                            अ टबर 2010



                                                  े
                                         मां दगा क नव प
                                              ु                             क उपासना
                    े
           मां दगा क नव प क उपासना िन न मं
                ु                                     े
                                                     क ारा क जाती है . थम दन शैलपु ी क एवं                         े
                                                                                                      मशः मां दगा क नव प क
                                                                                                               ु
उपासना क जाती है ।

           १. शैलपु ी २.     चा रणी ३. च               ू
                                              घ टा ४. क मा डा ५. क दमाता ६. का यायनी ७. कालरा              ८. महागौर ९. िस दा ी

1.शैलपु ी                                                             6. का यायनी
व दे वा छतलाभाय च             ाधकृ तशेखराम् ।                         च     हासो वलकरा शादलवरवाहना ।
                                                                                          ू
वृ षा ढां शूलधरां शैलपु ीं यश वनीम ् ॥                                का यायनी शुभं द ा े वी दानवघाितनी

2.        चा रणी                                                      7. कालरा
दधाना करप मा याम मालाकम डलू ।                                         एकवेणी जपाकणपूरा न ना खरा थता ।
दे वी सीदतु मिय            चा र यनु मा ॥                              ल बो ी क णकाकण तैला य शर रणी ॥
                                                                      वामपादो लस लोहलताक टकभूषणा ।
3. च      घ टा
                                                                      वधनमूध वजा कृ णा कालरा भय कर ॥
                     ै
प डज वरा ढा च डकोपा कयु ता ।
 सादं तनुते म ां च         घ टे ित व ु ता ॥                           8. महागौर
                                                                          ेते वृ षे समा ढा ेता बरधरा शुिचः ।
    ू
4. क मा डा
                                                                      महागौर शुभं द ा महादे व मोददा ॥
सुरास पूण कलशं िधरा लुतमेव च ।
                   ू
दधाना ह तप मा यां क मा डा शुभदा तु मे ॥                               9. िस दा ी
                                                                      िस ग धवय ा ैरसुरैरमरै र प ।
5. क दमाता
                                                                      से यमाना सदा भूयात ् िस दा िस दाियनी ॥
िसंहासनगता िन यं प माि तकर या ।
                                                                                                    ****
शुभदा तु सदा दे वी क दमाता यश वनी ॥


                                                      दगा बीसा यं
                                                       ु
               शा ो       े
                      मत क अनुशार दगा बीसा यं
                                   ु                   दभा य को दर कर य
                                                        ु        ू                  क सोये हवे भा य को जगाने वाला माना
                                                                                     े      ु
     गया ह। दगा बीसा यं
             ु                   ारा य        को जीवन म धन से संबंिधत सं याओं म लाभ             ा     होता ह। जो य
     आिथक सम यासे परे शान ह , वह य                य द नवरा   म    ाण       ित त कया गया दगा बीसा यं
                                                                                         ु                        को   थाि       कर
     लेता ह, तो उसक धन, रोजगार एवं यवसाय से संबंधी सभी सम य का शी ह अंत होने लगता ह। नवरा                                   े
                                                                                                                           क दनो
     म    ाण     ित त दगा बीसा यं
                       ु                 को अपने घर-दकान-ओ फस-फ टर म
                                                     ु         ै                     था पत करने से वशेष लाभ            ा       होता
     ह, य        शी ह अपने यापार म वृ           एवं अपनी आिथक     थती म सुधार होता दे खगे। संपूण             ाण    ित त एवं
     पूण चैत य दगा बीसा यं
                ु                   को शुभ मुहू त म अपने घर-दकान-ओ फस म
                                                             ु                        था पत करने से वशेष लाभ               ा    होता
     ह।                                                                               मू य: Rs.550 से Rs.8200 तक
                                                                         14                                              ू
                                                                                                                      अ टबर 2010



                                                    नवदगा और
                                                       ु                          योितष
                                                                                                                          िचंतन जोशी
        दगा पूजा श
         ु                      उपासना का महापव ह। शारद य                     संभवतः अ य     कसी पूजा, अचना, साधना, र                       एवं
नवरा     े
        क दनो म                 े
                             ह क दु                   े
                                         भाव से बचने क िलए                    अ य उपायो से सरलता से नह ं होती ह। अथवा पूण
मां दगा क पूजा करने से वशेष लाभ
     ु                                          ा       होता है ।              ह पीडाए शांत नह ं हो पाती ह। एसी               थती म आ द
श       एवं भ             े
                         क साथ सांसा रक                                                      श                    े
                                                                                                   मां भगवती दगा क नव
                                                                                                              ु                           पो क
              े
सुख को दे ने क िलए वतमान समय                                                                 आराधना से            य      सरलता से वशेष
म य द कोई दे वता है । तो वह एक                                                               लाभ     ा   कर सकता ह।
मा     दे वी दगा ह
              ु              ह। सामा यतया                                                            भगवान            राम    ने     भी     इसके
सम त दे वी-दे वता ह पूजा का अ छा                                                              भाव से          भा वत होकर अपनी दश
प रणाम दे ते ह।                                                                              अथवा आठ नह ं ब क नवधा भ
हमारे धम शा           े
                     क अनुशार:                                                               का ह उपदे श              दया है । अना द काल
            'कलौ च ड         वनायकौ’                                                         से क दे वता, दानव, असुर से लेकर
अथातः किलयुग म दगा एवं गणेश ह
                ु                                                                            मनु य       म        कसी भी      कारका संकट
पूण एवं त काल फल दे ने वाले ह।                                                               होने पर
                                                    मं        िस        मूंगा गणेश           सम त लोक म मां दगा क अराधना
                                                                                                             ु
तां क           े
             थ क अनुशार:                            मूंगा गणेश को व ने र और िस               करने का              चलन       चला आरहा ह।
        नौर च ड खेटा              जाता              वनायक के           प म जाना जाता ह।       यो क मां दगा ने सभी दे व-दानव-
                                                                                                        ु
     िनिधना ढवा ो ढवगु ठ दे या।                     इस क पूजन से जीवन म सुख
                                                        े                                    असुर-मनु य            सभी       ाणी    मा       का
अथातः नौ र , नौ               ह    क पीड़ा से        सौभा य म वृ         होती ह।              उ ार कया ह।
मु   , नौ िनिध क             ाि , नौ दगा क
                                      ु   े         र      संचार को संतुिलत करता ह।                  इसिलये            कसी भी           कार के
अनु ान से सवथा स भव है ।                 इसका       म त क को ती ता                दान कर     जाद-टोना, रोग, भय, भूत,
                                                                                                ू                                        पशा च,
                     े
त पय ह क नवदगा नव ह क िलए
            ु                                        य       को चतुर बनाता ह। बार-बार        डा कनी, शा कनी आ द से मु                        क
ह    वितत हु        ह।                              होने वाले गभपात से बचाव होता ह।           ाि      े
                                                                                                     क िलये मां दगा
                                                                                                                 ु                  क      विध-
                                                    मूंगा गणेश से बुखार, नपुंसकता ,          वधान            से       पूजा-अचना           सवदा
            योितष        क        ी म नव ह          स नपात और चेचक जेसे रोग म                फलदायक रह ं है ।
संबंिधत पीड़ा एवं दै वी आपदाओं से                    लाभ ा होता ह।                                    दगा दख का नाश करने वाली
                                                                                                      ु   ु
मु      ा     करने का सरल साधन दे वी                                                         ह। इसिलए नवरा                   े
                                                                                                                            क दनो म जब
                                                          Rs.550 से Rs.8200 तक
                     ुं
क आराधना ह। य द ज म कडली म                                                                   उनक पूजा पूण                   ा और व ास से
चंडाल योग, द र           योग,     हण योग, वष योग, कालसप                       क जाती ह, तो मां दगा क
                                                                                                ु                  मुख नौ श         याँ जा त
एवं मांगिलक दोष, एवं अ या य योग अथवा दोष एसे                                  हो जाती ह,   जससे नव            ह को िनयं त करती ह,
ह,   ज से      य         जीवन भर अथक प र म करने के                            जससे    ह से    ा    होने वाले अिन                  भाव से र ा
उपरांत भी दःख भोगता रहता ह।
           ु                                        जसक        शांित          होकर   ह जनीत पीडाएं शांत हो जाती ह।
                                                                  15                                           ू
                                                                                                            अ टबर 2010


दगा
 ु    क नव श                को जा त करने हे तु शा             म        6. नवाण मं        का ष     बीज मं         डा ह, डा से छठे
नवाण मं     का जाप करने का वधान ह।                                           नवरा     को दगा
                                                                                          ु     क छठ        श         का यायनी       क
नव का अथात नौ एवं अण का अथात अ र होता ह।                                     उपासना     क जाती ह।      जस म शु                  ह को
(नव+अण= नवाण) इसी कारण नवाण नव अ र वाला                                      िनयं त करने वाली श       समाई हई ह।
                                                                                                            ु
 भावी मं    ह।                                                         7. नवाण मं        का स म बीज मं           यै ह, यै से सातव
                                                                             नवरा     को दगा
                                                                                          ु      क स म श               कालरा         क
नवाण मं                                                                      उपासना     क जाती ह।      जस म शिन                 ह को
                 ऐं     ं   लीं चामुंडायै व चे                               िनयं त करने वाली श       समाई हई ह।
                                                                                                            ु
नव अ र वाले इस अ ुत नवाण मं                   े
                                             क हर अ र म                8. नवाण मं        का अ म बीज मं           व ह, व से आठव
दे वी दगा
       ु    क एक-एक श               समायी हई ह, जस का
                                           ु                                 नवरा     को दगा
                                                                                          ु     क अ म           श          महागौर    क
संबंध एक-एक           ह से ह।                                                उपासना क जाती ह। जस म राहु               ह को िनयं त
                                                                             करने वाली श       समाई हई ह।
                                                                                                     ु
1. नवाण मं        का        थम बीज मं      ऐं ह, ऐं से       थम        9. नवाण मं        का नवम बीज मं           चै ह, चै से नवम
   नवरा     को दगा
                ु            क    थम श           शैल पु ी     क              नवरा     को दगा
                                                                                          ु     क नवम श               िस दा ी        क
   उपासना        क जाती ह।           जस म सूय            ह को                उपासना     क जाती ह।            े
                                                                                                       जस म कतु                 ह को
   िनयं त करने वाली श              समाई हई ह।
                                         ु                                   िनयं त करने वाली श       समाई हई ह।
                                                                                                            ु
2. नवाण मं        का        तीय बीज मं       ं ह,    ं से दसरे
                                                           ू
   नवरा     को दगा
                ु            क    तीय श             चा रणी   क         इस नवाण मं दगा क नवो श
                                                                                   ु                            याँ   य       को धम,
   उपासना क जाती ह। जस म चं                      ह को िनयं त           अथ, काम और मो           इन चार क         ाि    म भी सहायक
   करने वाली श              समाई हई ह।
                                  ु                                    िस     होती ह।
3. नवाण मं            का तृ तीय बीज मं       लीं ह,      लीं से
                                                                       जप वधान
   तीसरे नवरा          को दगा क तृ तीय श
                           ु                        चं घंटा क
                                                                        ित दन       नान इ या दसे शु         होकर नवाण मं            का
   उपासना        क जाती ह।          जस म मंगल            ह को
                                                                       जाप 108 दाने       क माला से कम से कम तीन माला
   िनयं त करने वाली श              समाई हई ह।
                                         ु
                                                                       जाप अव य करना चा हए।
4. नवाण मं        का चतुथ बीज मं          चा ह, चा से चौथे
   नवरा     को दगा
                ु            क चतुथ श             ू
                                                 क मा डा     क
                                                                                  े
                                                                       दगा स शती क अनुशार
                                                                        ु
   उपासना क जाती ह। जस म बुध                     ह को िनयं त
                                                                       नवाण मं           े
                                                                                        क नौ अ र      मं      े
                                                                                                             क पहले ॐ अ र
   करने वाली श              समाई हई ह।
                                  ु
                                                                       जोड़कर भी कर सकते ह ॐ लगाने से भी यह नवाण
5. नवाण मं        का पंचम बीज मं          मुं ह, मुं से पाँचवे
                                                                       मं     े
                                                                             क समान ह फलदायक िस                 होता ह। इसम लेस
   नवरा     को दगा
                ु            क पंचम श              ं
                                                  कदमाता     क
                                                                       मा     भी संदेह नह ं ह। अतः मां भगवती दगा क कृ पा
                                                                                                              ु
   उपासना    क जाती ह।            जस म बृ ह पित          ह को
                                                                        ाि               े
                                                                              एवं नव हो क द ु     भावो से र ा         ाि     हे तु नवाण
   िनयं त करने वाली श              समाई हई ह।
                                         ु
                                                                       मं    का जाप पूण िन ा एवं           ा से कर सकते ह।
                                                               16                                     ू
                                                                                                   अ टबर 2010



                                            नवदगा आराधना का मह व
                                               ु
                                                                                                       िचंतन जोशी
               नमो दे यै महादे यै िशवायै सततं नम:।              इस मं       े
                                                                           क जप से माँ         क शरणागती       ा    होती ह।

         नम: कृ यै भ ायै िनयता: णता: मताम॥
                                         ्                                      े         े
                                                                    ज से मनु य क ज म-ज म क पाप का नाश होता है ।

अथात: दे वी को नम कार ह, महादे वी को नम कार ह।                  मां जननी सृ     क आ द, अंत और म य ह।

महादे वी िशवा को सवदा नम कार ह। कृ ित एवं भ ा को मेरा
                                                                दे वी से ाथना कर –
  णाम ह। हम लोग िनयमपूव क दे वी जगद बा को नम कार
                                                                              शरणागत-द नात-प र ाण-परायणे
करते ह।
                                                                                                           े
                                                                           सव याितहरे दे व नाराय ण नमोऽ तुत॥
उपरो      मं    से दे वी दगा का मरण कर ाथना करने मा से
                          ु                                     अथात: शरण म आए हए द न एवं पी ़डत क र ा म संल न
                                                                                ु
दे वी स न होकर अपने भ           क इ छा पूण करती ह। सम त
                                                                रहने वाली तथा सब क पीड़ा दर करने वाली नारायणी दे वी
                                                                                         ू
दे व गण जनक           तुित   ाथना करते ह। माँ दगा अपने भ ो
                                               ु
                                                                आपको नम कार है ।
क र ा कर उन पर कृ पा            ी वषाती ह और उसको उ नती
                                                                                  रोगानशेषानपहं िस तु ा
 े
क िशखर पर जाने का माग              स त करती ह। इस िलये
                                                                                 ा तु कामान सकलानभी ान।
                                                                                                      ्
ई र म           ा व ार रखने वाले सभी मनु य को दे वी क
शरण म जाकर दे वी से िनमल        दय से     ाथना करनी चा हये।                      वामाि तानां न वप नराणां
                                                                                वामाि ता हा यतां या त।
       दे वी प नाितहरे सीद       सीद मातजगतोs खल य।
                                                                अथातः दे वी आप       स न होने पर सब रोग को न कर दे ती
       पसीद व ेत र पा ह व ं वमी र दे वी चराचर य।
                                                                       ु
                                                                हो और क पत होने पर मनोवांिछत सभी कामनाओं का नाश
अथात: शरणागत क पीड़ा दर करने वाली दे वी आप हम पर
                     ू
                                                                                                       े
                                                                कर दे ती हो। जो लोग तु हार शरण म जा चुक है । उनको
  स न ह । संपूण जगत माता स न ह । व े र दे वी व
                                                                    वप   आती ह नह ं। तु हार शरण म गए हए मनु य दसर
                                                                                                      ु        ू
 क र ा करो। दे वी आप ह एक मा                चराचर जगत क
                                                                को शरण दे ने वाले हो जाते ह।
अिध र हो।
                                                                            सवबाधा शमनं ेलो य या खले र ।
                                           े
               सवमंगल-मांग ये िशवेसवाथसािधक ।
                                                                           एवमेव वया कायम य दै र वनाशनम।
                                                                                                       ्
                    े
          शर ये य बक गौ र नाराय ण नमोऽ तुते॥
                                                                अथातः हे सव र आप तीन लोक क सम त बाधाओं को
           सृ      थित वनाशानां श       भूते सनातिन।
                                                                शांत करो और हमारे सभी श ुओं का नाश करती रहो।
               गुणा ये गुणमये नाराय ण नमोऽ तुते॥
                                                                            शांितकम ण सव तथा द: व दशने।
                                                                                              ु
अथात: हे दे वी नारायणी आप सब             कार का मंगल     दान
                                                                            हपीडासु चो ासु महा मयं शणुया मम।
करने वाली मंगलमयी हो। क याण दाियनी िशवा हो। सब
                                                                अथातः सव शांित कम म, बुरे व न दखाई दे ने पर तथा
पु षाथ को िस         करने वाली शरणा गतव सला तीन ने
                                                                    ह जिनत पीड़ा उप थत होने पर माहा         य       वण करना
वाली गौर हो, आपको नम कार ह। आप सृ               का पालन और
                                                                चा हए। इससे सब पीड़ाएँ शांत और दर हो जाती ह।
                                                                                               ू
संहार करने वाली श            भूता सनातनी दे वी, आप गुण का
आधार तथा सवगुणमयी हो। नारायणी दे वी तु ह नम कार
है ।                                                                                     ***
                                                                       17                                          ू
                                                                                                                अ टबर 2010



                                                          े
                                                 माँ दगा क अचुक
                                                      ु                          भावी मं
                                                                                                                   िचंतन जोशी
               ाजी ने मनु य                                   ु
                                क र ा हे तु माक डे य पुराण म कछ परमगोपनीय साधन-क याणकार दे वी कवच एवं परम
पव      उपायो का उ लेख कया ह, ज से साधारण से साधारण                          य                                े        ु
                                                                                       जसे माँ दगा पूजा अचना क बारे म कछ भी
                                                                                                ु
जानकार नह ं होने पर भी वशेष लाभ                     ा   कर सकते ह।
         े
माँ दगा क इन मं ो का जाप
     ु                                    ित दन भी कर सकते ह। पर नवरा                 म जाप करने से शी      भाव दे खा गया ह।

सव     कार क बाधा मु                ु
                                हे त:
सवाबाधा विनमु ो धनधा यसुता वतः। मनु यो म                      सादे न भ व यित न संशयः॥
अथातः- मनु य मेरे            साद से सब बाधाओं से मु            तथा धन, धा य एवं पु              से स प न होगा- इसम जरा भी संदेह
नह ं है ।
कसी भी               े
                कार क संकट या बाधा क आशंका होने पर इस मं                         का    योग कर। उ      मं   का     ा से जाप करने से
 य      सभी       कार क बाधा से मु               होकर धन-धा य एवं पु    क     ाि      होती ह।

              ु
बाधा शा त हे त:
सवाबाधा शमनं             ैलो य या खले           र। एवमेव वया कायम म ै र वनाशनम॥
                                                                              ्
अथातः- सव           र! तुम इसी          कार तीन लोक क सम त बाधाओं को शा त करो और हमारे श ुओं का नाश करती
रहो।

वप          नाश हे तु:
शरणागतद नातप र ाणपरायणे। सव याितहरे दे व नाराय ण नमोऽ तु ते॥
अथातः- शरण म आये हए द न एवं पी डत क र ा म संल न रहनेवाली तथा सबक पीडा दर करनेवाली नारायणी
                  ु                                                    ू
दे वी! तु ह नम कार है ।

पाप नाश हे तु:
हन त दै यतेजांिस             वनेनापूय या जगत। सा घ टा पातु नो दे व पापे योऽन: सुतािनव॥
                                            ्
अथातः- दे व! जो अपनी             विन से स पूण जगत ् को                  े      े
                                                                  या करक दै य क तेज न                 कये दे ता है , वह तु हारा घ टा
हमलोग क पाप से उसी कार र ा करे , जैसे माता अपने पु                          क बुरे कम से र ा करती है ।

वप नाश और शुभ क                 ाि          ु
                                        हे त:
करोतु सा न: शुभहे तुर         र शुभािन भ ा यिभह तु चापदः।
अथातः- वह क याण क साधनभूता ई र हमारा क याण और म गल करे तथा सार आप य का नाश कर डाले।
                                                                   18                              ू
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भय नाश हे तु:
सव व पे सवशे सवश                    सम वते। भये या ह नो दे व दग दे व नमोऽ तु ते॥
                                                              ु
एत े वदनं सौ यं लोचन यभू षतम। पातु न: सवभीित य: का यायिन नमोऽ तु ते॥
                            ्
 वालाकरालम यु मशेषासुरसूदनम।
                           ्                     शूलं पातु नो भीतेभ कािल नमोऽ तु ते॥
अथातः- सव व पा, सव र तथा सब                       कार क श     य से स प न द य पा दग दे व! सब भय से हमार र ा करो;
                                                                                 ु
तु ह नम कार है । का यायनी! यह तीन लोचन से वभू षत तु हारा सौ य मुख सब                         े
                                                                                        कार क भय से हमार र ा करे ।
तु ह नम कार है । भ काली!                             े
                                             वालाओं क कारण वकराल तीत होनेवाला, अ य त भयंकर और सम त असुर का
संहार करनेवाला तु हारा              शूल भय से हम बचाये। तु ह नम कार है ।

सव          े          ु
       कार क क याण हे त:
                           े           े
सवम गलम ग ये िशवे सवाथसािधक। शर ये य बक गौ र नाराय ण नमोऽ तु ते॥
अथातः- नारायणी! आप सब                       कार का म गल   दान करनेवाली म गलमयी हो। क याणदाियनी िशवा हो। सब पु षाथ
को िस         करनेवाली, शरणागतव सला, तीन ने वाली एवं गौर हो। आपको नम कार ह।

 य                                                        े
        द:ख, द र ता और भय से परे शान हो चाहकर भी या पर म क उपरांत भी सफलता
         ु                                                                                      ा   नह ं होरह ह तो
उपरो         मं     का      योग कर।

सुल णा प नी क                 ाि   हे तु:
                                                            ु
प नीं मनोरमां दे ह मनोवृ ानुसा रणीम। ता रणीं दगसंसारसागर य कलो वाम॥
                                   ्          ु                   ्
                  े
अथातः- मन क इ छा क अनुसार चलनेवाली मनोहर प नी दान करो, जो दगम संसारसागर से तारनेवाली तथा उ म
                                                           ु
 ु
कल म उ प न हई हो।
            ु

श        ाि        हे तु:
सृ      थित वनाशानां श               भूते सनातिन। गुणा ये गुणमये नाराय ण नमोऽ तु ते॥
अथातः- तुम सृ , पालन और संहार करने वाली श                         भूता, सनातनी दे वी, गुण का आधार तथा सवगुणमयी हो।
नाराय ण! तु ह नम कार है ।

र ा     ाि        हे तु:
                                   े
शूलेन पा ह नो दे व पा ह ख गेन चा बक। घ टा वनेन न: पा ह चाप यािन: वनेन च॥
                                        े
अथातः- दे व! आप शूल से हमार र ा कर। अ बक! आप ख ग से भी हमार र ा कर तथा घ टा क                             विन और
धनुष क टं कार से भी हमलोग क र ा कर।

दे ह को सुर            त रखने हे तु एवं उसे कसी भी                                         े
                                                          कार क चोट या हानी या कसी भी कार क अ -स         से सुर   त
रखने हे तु इस मं             का     ा से िनयम पूव क जाप कर।
                                                                          19                                       ू
                                                                                                                अ टबर 2010


व ा        ाि                     ु
                 एवं मातृ भाव हे त:
व ा: सम ता तव दे व भेदा:                       य: सम ता: सकला जग सु।
 वयैकया पू रतम बयैतत ् का ते                   तुित:   त यपरा परो    ः॥
अथातः- दे व! व            क स पूण व ाएँ तु हारे ह िभ न-िभ न                     व प ह। जगत ् म जतनी           याँ ह, वे सब तु हार ह
मूितयाँ ह। जगद ब! एकमा                    तुमने ह इस व          को   या        कर रखा है । तु हार   तुित     या हो सकती है ? तुम तो
 तवन करने यो य पदाथ से परे हो।

सम त            कार क व ाओं क             ाि       हे तु और सम त     य म मातृ भाव क ाि           े
                                                                                                क िलये इस मं का पाठ कर।

 स नता क             ाि   हे तु:
 णतानां          सीद वं दे व व ाितहा र ण।               ैलो यवािसनामीडये लोकानां वरदा भव॥
अथातः- व            क पीडा दर करनेवाली दे व! हम तु हारे चरण पर पडे हए ह, हमपर
                            ू                                       ु                               स न होओ।       लोकिनवािसय क
पूजनीय परमे           र! सब लोग को वरदान दो।

आरो य और सौभा य क                    ाि   हे तु:
दे ह सौभा यमारो यं दे ह मे परमं सुखम।
                                    ्                    पं दे ह जयं दे ह यशो दे ह        षो ज ह॥
अथातः- मुझे सौभा य और आरो य दो। परम सुख दो,                            प दो, जय दो, यश दो और काम- ोध आ द मेरे श ुओं का
नाश करो।

महामार नाश हे तु:
जय ती म गला काली भ काली कपािलनी। दगा
                                  ु                            मा िशवा धा ी        वाहा    वधा नमोऽ तु ते॥

अथातः- जय ती, म गला, काली, भ काली, कपािलनी, दगा,
                                             ु                             मा, िशवा, धा ी, वाहा और         वधा- इन नाम से       िस
      े
जगद बक! तु ह मेरा नम कार हो।
रोग नाश हे तु:
रोगानशेषानपहं िस तु ा               ा तु कामान ् सकलानभी ान। वामाि तानां न वप नराणां वामाि ता
                                                           ्                                                     ा यतां या त॥
अथातः- दे व! तुमहारे               स न होने पर सब रोग को न                            ु
                                                                      कर दे ती हो और क पत होने पर मनोवािछत सभी कामनाओं
                                              े
का नाश कर दे ती हो। जो लोग तु हार शरण म जा चुक ह, उन पर वप                                   तो आती ह नह ं। तु हार शरण म गये
हए मनु य दसर को शरण दे नेवाले हो जाते ह।
 ु        ू

 व     क र ा हे तु:
या    ी:        वयं सुकृितनां भवने वल मी: पापा मनां कृ तिधयां              दयेषु बु :।
             ु
     ा सतां कलजन भव य ल जा तां वां नता:                       म प रपालय दे व व म॥
                                                                                ्
                      े
अथातः- जो पु या माओं क घर म                                                 े
                                                    वयं ह ल मी प से, पा पय क यहाँ द र ता प से, शु             अ त:करणवाले पु ष के
 दय म बु            प से, स पु ष म                          ु
                                                ा प से तथा कलीन मनु य म ल जा प से िनवास करती ह, उन आप भगवती दगा
                                                                                                             ु
को हम नम कार करते ह। दे व! आप स पूण व                           का पालन क जये।
                                                         20                                 ू
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व                 े
       यापी वप य क नाश हे तु:
दे व    प नाितहरे     सीद    सीद मातजगतोऽ खल य। सीद व े       र पा ह व ं वमी र दे व चराचर य॥
अथातः- शरणागत क पीडा दर करनेवाली दे व! हमपर
                      ू                                 स न होओ। स पूण जगत ् क माता!     स न होओ। व े       र!
व      क र ा करो। दे व! तु ह ं चराचर जगत ् क अधी र हो।

व       े
       क पाप-ताप िनवारण हे तु:
दे व                                            ै
        सीद प रपालय नोऽ रभीतेिन यं यथासुरवधादधुनव स :।
पापािन सवजगतां        शमं नयाशु उ पातपाकजिनतां महोपसगान॥
                                                       ्
अथातः- दे व!                                           े
                    स न होओ। जैसे इस समय असुर का वध करक तुमने शी         ह हमार र ा क है , उसी   कार सदा हम
       े
श ुओं क भय से बचाओ। स पूण जगत ् का पाप न                                        े
                                                        कर दो और उ पात एवं पाप क फल व प           ा   होनेवाले
महामार आ द बडे -बडे उप व को शी          दर करो।
                                         ू

व       े                             ु
       क अशुभ तथा भय का वनाश करने हे त:
य या:     भावमतुलं भगवानन तो         ा हर   न ह व ु मलं बलं च।
सा च डका खलजग प रपालनाय नाशाय चाशुभभय य मितं करोतु॥
          े
अथातः- जनक अनुपम             भाव और बल का वणन करने म भगवान ् शेषनाग,        ाजी तथा महादे वजी भी समथ नह ं ह,
वे भगवती च डका स पूण जगत ् का पालन एवं अशुभ भय का नाश करने का वचार कर।

सामू हक क याण हे तु:
दे या यया ततिमदं जगदा मश          या िन शेषदे वगणश    समूहमू या।
ताम बकाम खलदे वमह षपू यां भ          या नता:   म वदधातु शुभािन सा न:॥
अथातः- स पूण दे वताओं क श            का समुदाय ह     जनका व प है तथा जन दे वी ने अपनी श       से स पूण जगत ्
को या         कर रखा है, सम त दे वताओं और मह षय क पूजनीया उन जगद बा को हम भ             पूव क नम कार करते ह।
वे हमलोग का क याण कर।


 ै
कसे कर मं           जाप :-
नवरा      े       े                            े
         क ितपदा क दन संक प लेकर ातःकाल नान करक पूव या उ र दशा क और मुख                  े ु
                                                                                      करक दगा क मूित या िच
क पंचोपचार या द ोपचार या षो षोपचार से पूजा कर।


शु -प व आसन हण कर              ा , फ टक, तुलसी या चंदन क माला से मं का जाप १,५,७,११ माला जाप पूण कर अपने काय
उ े य क पूित हे तु मां से     ाथना कर। संपूण नवरा    म जाप करने से मनोवां छत कामना अव य पूर होती ह।

उपरो     मं     े           े
               क विध- वधान क अनुसार जाप करने से मां क कृ पा से य         को पाप और क        ु
                                                                                        से छटकारा िमलता ह
और मो          ाि   का मो    ाि का माग सुगम    ितत होता ह।
                                                               21                                    ू
                                                                                                  अ टबर 2010



                              मुख श             पीठ म होती ह वशेष पूजा

                                                                                                     व तक.ऎन.जोशी

       द        जापित क कई पु यां थी। सभी पु यां गुणवती थीं। फर भी द                 े
                                                                                    क मन म संतोष नह ं था। वे चाहते
      े
थे उनक घर म एक ऐसी पु ी का ज म हो, जो सव श                                                    े
                                                               -संप न हो एवं सव वजियनी हो। जसक कारण द              एक
            े
ऐसी ह पु ी क िलए तप करने लगे। तप करते-करते अिधक दन बीत गए, तो भगवती आ ा ने                           कट होकर कहा, 'म
तु हारे तप से     स न हंू । तुम कस कारण वश तप कर रहे ह ?

       द   न तप करने का कारण बताय तो मां बोली म                     वय पु ी   प म तु हारे यहां ज म धारण क ं गी। मेरा
नाम होगा सती। म सती के         प म ज म लेकर अपनी लीलाओं का व तार क ं गी। फलतः भगवती आ ा ने सती                          प
म द     े
       क यहां ज म िलया। सती द          क सभी पु य म सबसे अलौ कक थीं। इस िलये सतीने बा य अव था म ह
कई ऐसे अलौ कक आ य चिलत करने वाले काय कर दखाए थे, ज ह दे खकर द                         को भी आ य होता था।

       जब सती ववाह यो य होगई, तो द                   े
                                               को उनक िलए वर क िचंता होने लगी। उ ह ने              ा जी से इस वषय म
परामश कया।          ा जी ने कहा, सती आ ा का अवतार ह। आ ा आ द श                    और िशव आ द पु ष ह। अतः सती के
      े
ववाह क िलए िशव ह यो य और उिचत वर ह। द                     ने     ा जी क बात मानकर सती का ववाह भगवान िशव के
                 ै                     े                          े
साथ कर दया। सती कलाश म जाकर भगवान िशव क साथ रहने लगीं। भगवान िशव क द                               े           ं
                                                                                                  क दामाद थे, कतु एक
                      े
ऐसी घटना घट त होगई जसक कारण द                  के     दय म भगवान िशव के          ित बैर और वरोध भाव पैदा हो गया।
भगवान िशव के       ित बैर और वरोध भाव पैदा हो गया।

संपूण घटना इस       कार ह

       एक बार दे वलोक म                  े       े
                                ा ने धम क िन पण क िलए एक सभा का आयोजन कया था। सभी बड़े -बड़े दे वता
सभा म एक         होगये थे। भगवान िशव भी इस सभा म उप थत थे। सभा म डल म द                      का आगमन हआ। द
                                                                                                      ु             के
आगमन पर सभी दे वता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान िशव खड़े नह ं हए। उ ह ने द
                                                          ु                                  को    णाम भी नह ं कया।
फलतः द                             े
           ने अपमान का अनुभव कया। कवल यह नह ं, उनके                     दय म भगवान िशव के         ित ई या क आग जल
                        े
उठ । वे उनसे बदला लेने क िलए समय और अवसर क                     ती ा करने लगे।


                                               भा य ल मी द बी
                            सुख-शा त-समृ       क         े
                                                     ाि क िलये भा य ल मी द बी :- ज से धन ि , ववाह योग, यापार
                                                   े
                            वृ , वशीकरण, कोट कचेर क काय, भूत ेत बाधा, मारण, स मोहन, ता               क बाधा, श ु भय,
                            चोर भय जेसी अनेक परे शािनयो से र ा होित है और घर मे सुख समृ           क ाि होित है , भा य
                            ल मी द बी मे लघु        ी फ़ल, ह तजोड (हाथा जोड ), िसयार िस गी, ब ल नाल, शंख, काली-
                              े
                            सफ़द-लाल गुंजा, इ        जाल, माय जाल, पाताल तुमड जेसी अनेक दलभ साम ी होती है ।
                                                                                        ु
                                                                         मू य:- Rs. 910 से Rs. 8200 तक उ ल
                                      गु   व कायालय संपक : 91+ 9338213418, 91+ 9238328785
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                           ै
        एक बार सती और िशव कलाश पवत पर बैठे पर पर वातालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश माग से कई
वमान कनखल           क ओर जाते हए
                               ु       दखाई पड़े । भगवान शकर ने उ र
                                                          ं                   दया आपके       पता ने बहोत बडे य       का
आयोजन कया ह। सम त दे वता और दे वांगनाएं इन वमान म बैठकर उसी य                                       े
                                                                                     म स मिलत होने क िलए जारहे ह।

        इस पर सती ने दसरा
                      ू                कया    या मेरे पता ने आपको य                          े
                                                                              म स मिलत होने क िलए नह ं बुलाया?
भगवान       शंकर    ने   उ र    दया,    आपके     पता     मुझसे   बैर   रखते     ह,     फर     वे    मुझे   य   बुलायगे?
सती मन ह मन सोचने लगीं फर बोलीं य               े
                                               क इस अवसर पर अव य मेर सभी बहन आएंगी। उनसे िमले हए बहत
                                                                                               ु   ु
                                               े
दन हो गए। य द आपक अनुमित हो, तो म भी अपने पता क घर जाना चाहती हंू । भगवान िशव ने उ र दया, इस
                                 े
समय वहां जाना उिचत नह ं होगा। आपक पता मुझसे जलते ह हो सकता ह वे आपका भी अपमान कर। बना बुलाए
     े
कसी क घर जाना उिचत नह ं होता ह। इस पर सती ने                     कया एसा        ं
                                                                              यु? भगवान िशव ने उ र दया           ववा हत
                      े
लड़क को बना बुलाए पता क घर नह जाना चा हए,                  य क ववाह हो जाने पर लड़क अपने पित क हो जाती ह।
     े                  ू                              े
पता क घर से उसका संबंध टट जाता ह। ले कन सती पीहर जाने क िलए हठ करती रह ं। अपनी बात बार-बात
दोहराती रह ं। उनक इ छा दे खकर भगवान िशव ने पीहर जाने क अनुमित दे द ।

        पीहर जाने पर घर म सतीसे कसी ने भी              ेमपूव क वातालाप नह ं कया। द          ने उ ह दे खकर कहा तुम    या
यहां मेरा अपमान कराने आई हो? अपनी बहन को तो दे खो वे कस                                 े
                                                                       कार भांित-भांित क अलंकार और सुंदर व            से
सुस जत होकर आई ह। तु हारे शर र पर मा               बाघंबर ह। तु हारा पित      मशानवासी और भूत का नायक ह। वह
तु ह बाघंबर छोड़कर और पहना ह            या सकता ह।

        द     े
             क कथन से सती के        दय म प ाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं उ ह ने यहां आकर अ छा नह ं
                                           े
कया। भगवान ठ क ह कह रहे थे, बना बुलाए पता क घर भी नह ं जाना चा हए। पर अब                           या हो सकता ह? अब तो
आ ह गई हंू ।       पता क कटु और अपमानजनक श द सुनकर भी सती मौन रह ं। वे उस य मंडल म ग
                        े                                                                                      जहां सभी
                                  ु
दे वता और ॠ ष-मुिन बैठे थे तथा य क ड म धू-धू करती जलती हई अ न म आहितयां डाली जा रह थीं।
                                                        ु         ु

                                      े               ं
        सती ने य मंडप म सभी दे वताओं क तो भाग दे खे, कतु भगवान िशव का भाग नह ं दे खा। वे भगवान िशव
का भाग न दे खकर अपने पता से बोलीं पतृ े ! य                      े                   ं   ै
                                                         म तो सबक भाग दखाई पड़ रहे ह कतु कलाशपित का भाग
नह ं ह। आपने उनका भाग          य नह ं रखा? द       ने गव से उ र दया म तु हारे पित िशव को दे वता नह ं समझता।
वह तो भूत का        वामी, न न रहने वाला और ह डय क माला धारण करने वाला ह। वह दे वताओं क पं                        म बैठने
यो य नह ं ह। उसे कौन भाग दे गा?



                                                अ ल मी कवच
 अ ल मी कवच को धारण करने से                    य       पर सदा मां महा ल मी क कृ पा एवं आशीवाद बना
                        े
 रहता ह। ज से मां ल मी क अ                    प (१)-आ द ल मी, (२)-धा य ल मी, (३)-धैर य ल मी, (४)-
 गज ल मी, (५)-संतान ल मी, (६)- वजय ल मी, (७)- व ा ल मी और (८)-धन ल मी इन सभी
  पो का       वतः अशीवाद        ा   होता ह।                                                  मू य मा : Rs-1050
                                                              23                                    ू
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               े
          सती क ने       लाल हो उठे । उनक              ु
                                                 भ हे क टल हो ग ।
उनका मुखमंडल             े
                     लय क सूय क भांित तेजो             हो उठा। उ ह ने
                                          ै
पीड़ा से ितलिमलाते हए कहा ओह! म इन श द को कसे सुन रह ं
                   ु
हंू मुझे िध कार ह। दे वताओ तु ह भी िध कार ह! तुम भी उन
 ै       े               ै
कलाशपित क िलए इन श द को कसे सुन रहे हो जो मंगल के
 तीक ह और जो           ण मा      म संपूण सृ     को न    करने क श
रखते ह। वे मेरे                    े
                      वामी ह। नार क िलए उसका पित ह                  वग
                         े
होता ह। जो नार अपने पित क िलए अपमान जनक श द को
सुनती ह उसे नरक म जाना पड़ता ह। पृ वी सुनो, आकाश सुनो
और दे वताओं, तुम भी सुनो! मेरे पता ने मेरे         वामी का अपमान
कया ह। म अब एक                  ण भी जी वत रहना नह ं चाहती। सती
अपने कथन को समा               करती हई य
                                    ु          े ु     ू
                                              क क ड म कद पड़ । जलती हई आहितय क साथ उनका शर र भी जलने
                                                                    ु   ु    े
                                                                            े
लगा। य मंडप म खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया। दे वता उठकर खड़े हो गए। सती क साथ य                            म आये
      े
यिशव क गन वीरभ                ोध से कांप उटे । वे उ ल-उछलकर य         का व वंस करने लगे। य मंडप म भगदड़ मच गई।
दे वता और ॠ ष-मुिन वहां से भाग खड़े हए। वीरभ
                                    ु                    ने दे खते ह दे खते द    का म तक काटकर फक दया। समाचार
           े
भगवान िशव क कान म भी पड़ा। वे                                                         े
                                              चंड आंधी क भांित कनखल जा पहंु चे। सती क जले हए शर र को दे खकर
                                                                                           ु
भगवान िशव ने अपने आपको भूल गए। सती के                   ेम और उनक भ                   े
                                                                             ने शंकर क मन को        ु
                                                                                                 याकल कर दया। उन
      े
शंकर क मन को             ु
                      याकल कर दया ज ह ने काम पर भी वजय                   ा   क थी और जो सार सृ      को न   करने क
     मता रखते थे। वे सती के       ेम म खो गए, बेसुध हो गए।

                                         े                ं
          भगवान िशव ने उ मत क भांित सती क जले हए शर र को कधे पर रख वे सभी दशाओं म
                                               ु                                                     मण करने लगे।
सृ           ु
          याकल हो उठ भयानक संकट उप थत दे खकर सृ                 े
                                                               क पालक भगवान व णु आगे बढ़े । उ ह ने भगवान िशव
क बेसुधी म अपने च                      े
                               से सती क एक-एक अंग को काट-काट कर िगराने लगे। धरती पर इ यावन             थान म सती
 े                           े
क अंग कट-कटकर िगरे । जब सती क सारे अंग कट कर िगर गए, तो भगवान िशव पुनः अपने आप म वापस आए।
फर पुनः सृ         े
                  क सारे काय चलने लगे।

धरती पर जन इ यावन                          े
                                थान म सती क अंग कट-कटकर िगरे थे, वे ह                 थान आज श    पीठ के   थान माने
जाते ह। आज भी उन              थान म सती का पूजन होता ह, उपासना होती ह।

          विभ न शा ो एवं पुराण म श                        े
                                              पीठ क सं या क वणन म िभ नता ह।

         तं चूड़ा म ण म 52 श       पीठ का उ लेख कया गया ह।

          ीम े वीभागवत म 908 श       पीठ का उ लेख कया गया ह।

         दे वी गीता म 72 श     पीठ का उ लेख कया गया ह।

         दे वीपुराण म 51 श     पीठ का उ लेख कया गया ह।

                े
          दे वी क मु य अंग -     यंग क गणना म      मुख 51 श        पीठ माने जाते ह।
                                                            24                                  ू
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                                          शारद य नवरा                   े
                                                                     त क लाभ

                                                                                                 िचंतन जोशी
           नवरा     को श                                                े
                            क उपासना का महापव मना गया ह। माक डे यपुराण क अनुशार दे वी माहा    य म वयं मां
जगद बा का वचन ह-।

शर काले महापूजा          यतेया चवा षक । त यांममैत माहा    यं ु वाभ   सम वत:॥

सवाबाधा विनमु ोधनधा यसुता वत:। मनु योम            सादे नभ व यितन संशय:॥

               े
अथातः शरद ऋतु क नवरा म जब मेर वा षक महापूजा होती ह, उस काल म जो मनु य मेरे माहा                 य (दगास शती) को
                                                                                                    ु
भ     पूव कसुनेगा, वह मनु य मेरे साद से सब बाधाओं से मु    होकर धन-धा य एवं पु से स प न हो जायेगा।


           नवरा     म दगास शती को पढने या सुनने से दे वी अ य त स न होती ह एसा शा ो
                       ु                                                                 वचन ह। स शती का पाठ
उसक मूल भाषा सं कृ त म करने पर ह पूण भावी होता ह।

            य       को   ीदगास शती को भगवती दगा का ह
                           ु                 ु            व प समझना चा हए। पाठ करने से पूव ीदगास शती क पु तक
                                                                                             ु
का इस मं से पंचोपचारपूजन कर-

नमोदे यैमहादे यैिशवायैसततंनम:। नम: कृ यैभ ायैिनयता: णता: मताम॥
                                                             ्

जो य                     े
                दगास शतीक मूल सं कृ त म पाठ करने म असमथ ह तो उस
                 ु                                                      य    को स    ोक दगा को पढने से लाभ
                                                                                         ु                     ा
होता ह।         यो क सात    ोक वाले इस तो म ीदगास शती का सार समाया हवा ह।
                                              ु                     ु

जो य            स                        े    े
                     ोक दगा का भी न कर सक वह कवल नवाण मं का अिधकािधक जप कर।
                         ु


       े      े
दे वी क पूजन क समय इस मं        का जप करे ।

जय ती म गलाकाली भ काली कपािलनी।

दगा
 ु         मा िशवा धा ी वाहा वधानमोऽ तुते॥


दे वी से    ाथना कर-

 वधे हदे व क याणं वधे हपरमांि यम। पंदे हजयंदे हयशोदे ह षोज ह॥
                                ्
अथातः हे दे व! आप मेरा क याण करो। मुझे         े स प      दान करो। मुझे प दो, जय दो, यश दो और मेरे काम- ोध इ या द
श ुओं का नाश करो।


        े
 व ानो क अनुशार स पूण नवरा              े
                                     त क पालन म जो लोग असमथ हो वह नवरा           े
                                                                                क सात रा ी,पांच रा ी, द रा ी और
एक रा ी का                  े
                    त भी करक लाभ     ा   कर सकते ह। नवरा     म नवदगा क उपासना करने से नव ह का कोप शांत होता ह।
                                                                  ु
                                                       25                                    ू
                                                                                          अ टबर 2010



                                                 नवरा       त
                                                                                            व तक.ऎन.जोशी

                                                  े
       नव दन तक चलने वाले इस पव पर हम त रखकर मां क नौ अलग-अलग प क पूजा कजाती ह। इस दौरान घर म
कया जाने वाला विधवत हवन भी वा               े
                                         य क िलए अ यंत लाभ द ह। हवन से आ मक शांित और वातावरण क शु           के
अलावा घर नकारा मक श        य का नाश हो कर सकारा मक श        यो का     वेश होता ह।

नवरा    त

नवरा   म नव रा      से लेकर सात रा ी,पांच रा ी, द रा ी और एक रा ी     त करने का भी वधान ह।
नवरा          े            े
           त क धािमक मह व क अलावा वै ािनक मह व ह, जो वा        यक         से काफ लाभदायक होता ह।    त करने से
              ु
शर र म चु ती-फत बनी रहती ह। रोजाना काय करने वाले पाचन तं को भी               े
                                                                          त क दन आराम िमलता ह। ब चे, बुजुग,
बीमार, गभवती म हला को नवरा        त का नह ं रखना चा हए।

नवरा    त से संबंिधत उपयोगी सुझाव

             े
           त क दौरान अिधक समय मौन धारण कर।

             े
           त क शु आत म भूख काफ लगती ह। ऐसे म नींबू पानी पया जा सकता है । इससे भूख को िनयं त रखने म मदद
       िमलेगी।

                                                                                           े
       जहा तक संभव हो िनजला उपवास न रख। इससे शर र म पानी क कमी हो जाती ह और अपिश पदाथ शर र क बाहर
       नह ं आ पाते। इससे पेट म जलन, क ज, सं मण, पेशाब म जलन जैसी कई सम याएं पैदा हो सकती ह।

                                 े
       एक साथ खूब सारा पानी पीने क बजाए दन म कई बार नींबू पानी पएं।

                                                                               े
           यादातर लोगो को उपवास म अ सर क ज क िशकायत हो जाती ह। इसिलए त शु करने क पहले              फला, आंवला,
                              े
       पालक का सूप या करे ले क रस इ या द पदाथ का सेवन कर। इससे पेट साफ रहता है ।

             े
           त क दौरान चाय, काफ का सेवन काफ बढ़ जाता है । इस पर िनयं ण रख।

    े
 त क दौरान कौनसे खा        पदाथ    हण कर?

             त म अ न का सेवन व जत ह। जस कारण शर र म ऊजा क कमी हो जाती ह।

           अनाज क जगह फल व स जय का सेवन कया जा सकता ह। इससे शर र को ज र ऊजा िमलती ह।

                 े
            सुबह क समय आलू को             े
                                    ाई करक खाया जा सकता ह। आलू म काब हाइ े ट चुर मा ा म होता है । इस िलए आलू
            खाने से शर र को ताकत िमलती है ।

                                       े
            सुबह एक िगलास दध पल। दोपहर क समय फल या जूस ल। शाम को चाय पी सकते ह।
                           ू

           कई लोग त म एक बार ह भोजन करते ह। ऐसे म एक िन                                       े
                                                                त अंतराल पर फल खा सकते ह। रात क खाने म िसंघाड़े
             े
            क आटे से बने पकवान खा सकते ह।
                                                       26                                          ू
                                                                                                अ टबर 2010



                                              भाते कर दशनम ्

                                                                                                    िचंतन जोशी
                                                                                                    े
                                    हं द ू वै दक सं कृ ित म व ानो न दनचया क शु आत सुबह जागते ह दशन क साथ
                                        करने का वधान बताया ह।
                                             व ानो क मत क अनुशार सुबह ब तर से उठने से पेहले (अथातः
                                                    े    े
                                               ब तर छोडनेसे पूव) इस मं             के   मरण से हमारे अंदर एक अ त
                                                                                                               ु
                                                श      का संचार होता ह। ज से हमारे अंतरमन से हतासा और
                                                िनराशा जेसी नकारा म भावनाओं को दरहो कर हमारे अंदर एक
                                                                                ू
                                                    सकारा मन           कोण का िनमाण होता है । जो हमे अपने जीवन
                                                                े
                                                    म आगे बढने क िलये सरल और उ म माग खोजने मे सहायक
                                                िस     होती है ।

                                              यह      योग अ त और शी
                                                            ु                    भाव दखाने मे समथ है ।

                                                            करा े वसते ल मी, कर म ये सर वती।
                                                         कर मूले तू गो वंद         भाते कर दशनं॥

                                             Karagre Vasate Lakshami, Kar Madhaye Sawaswati
                                             Kar Moole too Govindam Prabhate Kar Darshanam

                े
अथात : उं गिलय क अ                                         े                              े
                        भाग म ल मी जी िनवास करती ह, हथेली क म य भाग म सर वती जी और हथेली क मूल
म नारयण का वास है , जनका सवेरे दशन करना शुभ द है ।

मं    को ३ या ७ बार मनमे उ चरण करे ।
         अपने दोनो हाथो को जोडकर हथेली को दे खते हवे दये गये मं
                                                  ु                           को पढते हवे अपने अंतर मन म एसा भाव
                                                                                       ु
                  े
लाये क हमारे हाथ क अ                                   े
                           भाग म मां महाल मी, तथा हाथ क म य भाग मे मां सर वती का वास है , और हाथ के
मूल भाग मे     वयं भगवान ह र बराजमान है ।

लाभ: दनभर मन         स न रहता है और अ छे काय करने क             ेरणा   ा   होकर हमे सभी काय म सफलता        ा   होती
है । (इस मं    े       े
              क उ चरण क बाद मे ब तर छोडे )

                                               मंगल यं
     ( कोण) मंगल यं                    े                  े                       े
                       को जमीन-जायदाद क ववादो को हल करने क काम म लाभ दे ता ह, इस क अित र
     य    को ऋण मु     हे तु मंगल साधना से अित शी     लाभ       ा    होता ह।    ववाह आ द म मंगली जातक के
     क याण क िलए मंगल यं
            े               क पूजा करने से वशेष लाभ         ा       होता ह।                मू य मा    Rs- 550
                                                              27                                 ू
                                                                                              अ टबर 2010



                                               वाला मां का परम भ

                                                                                                व तक.ऎन.जोशी

            वालामुखी मं दर 51 श    पीठो म से एक श
पीठ ह। वालामुखी मं दर का इितहास      चीन ह।

                             े
 वालामुखी मं दर को जोतावाली क नाम से भी जाना
जाता ह।      वालामुखी मं दर को खोजने का       े य पांडवो को
               े
जाता ह। उ ह ं क ारा इस प व धािमक थल क खोज
होने का माना जाता ह। इस थाल पर माता सती क जीभ
                              े
िगर थी। इस मं दर म माता योित क म म वराजमान ह।
इन    योितय को महाकाली, अ नपूणा, चंड , हं गलाज,
वं यावासनी, महाल मी, सर वती, अं बका, अंजीदे वी
 े
क नाम से जाना जाता ह।

       इस थान को पहली बार एक गाय पालक ने दे खा
था। वह अपनी गाय का पीछा करते हए इस
                              ु                  थान तक
आपहंु चा।     यो क उसक गाय दध नह दे रह थी गाय
                            ू
अपना सारा दध प व
           ू             वालामुखी म एक द य क या को
पला आती थी। उसने यह          य अपनी आँखो से दे खा और
      े
वहां क राजा को इसक जानकार द । राजा ने बात क
               े
स यता को जाँच क िलए अपने िसपा हय को भेजा।
िसपा हय ने भी यह नजारा दे खा। उ ह ने सार बात राजा को
                        े
आकर बताई और स य क जांच क प ात राजा                  ारा इस
 थान पर मं दर का िनमाण कराया गया।

                            े
            वालामुखी मं दर क संबंध म यानु भ       क कथा काफ        चिलत ह। यानुभ   माता वाला का परम भ   था। एक बार
       े     े                        े            े
दे वी क दशन क िलए वह अपने गांववािसयो क साथ वालाजी क िलए िनकला। जब उसका का फला द ली से गुजरा तो मुगल
             े                                      े
बादशाह अकबर क िसपा हय ने उसे रोक िलया और राजा अकबर क दरबार म पेश कया। अकबर ने जब यानु से पूछा क वह
                े                                                    े      े
अपने गांववािसय क साथ कहां जा रहा ह तो उ र म यानु ने कहा वह जोतावाली क दशनो क िलए जा रहे ह। अकबर ने कहा तेर
मां म या श       ह और वह या- या कर सकती ह? तब यानु ने कहा वह तो पूरे संसार क र ा करने वाली ह। ऐसा कोई भी काय
                                         े
नह ह जो वह नह ं कर सकती ह। अकबर ने यानु क घोड़े का सर कटवा दया और कहा क अगर तेर मां म श                         े
                                                                                                    ह तो घोड़े क सर
को जोड़कर उसे जी वत कर द। यह वचन सुनकर यानु दे वी क                                                          े
                                                              तुित करने लगा और अपना िसर काट कर माता को भेट क प म
 दान कया। माता क श          से घोड़े का सर जुड गया। इस कार अकबर को दे वी क श         का एहसास हआ। बादशाह अकबर ने
                                                                                              ु
       े
दे वी क मं दर म सोने का छ भी चढाया था।
                                                              28                                    ू
                                                                                                 अ टबर 2010



                                          सव रोगनाशक यं /कवच
                        े
       मनु य अपने जीवन क विभ न समय पर कसी ना कसी सा य या असा य रोग से                             त होता ह।

उिचत उपचार से         यादातर सा य रोगो से तो मु            िमल जाती ह, ले कन कभी-कभी सा य रोग होकर भी असा या
होजाते ह, या कोइ असा य रोग से            िसत होजाते ह। हजारो लाखो        पये खच करने पर भी अिधक लाभ           ा     नह ं हो
पाता। डॉ टर                                     े
                 ारा दजाने वाली दवाईया अ प समय क िलये कारगर सा बत होती ह, एिस                    थती म लाभा          ाि       के
िलये य                                े
              एक डॉ टर से दसरे डॉ टर क च कर लगाने को बा य हो जाता ह।
                           ू

       भारतीय ऋषीयोने अपने योग साधना के                                                         े
                                                       ताप से रोग शांित हे तु विभ न आयुवर औषधो क अित र                    यं ,
मं   एवं तं   उ लेख अपने        ंथो म कर मानव जीवन को लाभ            दान करने का साथक    यास हजारो वष पूव कया था।
         े
बु जीवो क मत से जो य              जीवनभर अपनी दनचया पर िनयम, संयम रख कर आहार                  हण करता ह, एसे य
को विभ न रोग से                                                 े
                        िसत होने क संभावना कम होती ह। ले कन आज क बदलते युग म एसे य                      भी भयंकर रोग
से     त होते दख जाते ह।          यो क सम                े
                                              संसार काल क अधीन ह। एवं मृ यु िन                          े
                                                                                         त ह जसे वधाता क अलावा
और कोई टाल नह ं सकता, ले कन रोग होने क                 थती म य         रोग दर करने का
                                                                            ू            यास तो अव य कर सकता ह।
इस िलये यं     मं    एवं तं    क कशल जानकार से यो य मागदशन लेकर य
                                े ु                                              रोगो से मु   पाने का या उसके             भावो
को कम करने का         यास भी अव य कर सकता ह।

                    े ु                                        े
         योितष व ा क कशल जानकर भी काल पु षक गणना कर अनेक रोगो क अनेको रह य को उजागर कर
सकते ह। योितष शा               े              े
                              क मा यम से रोग क मूलको पकडने मे सहयोग िमलता ह, जहा आधुिनक िच क सा शा
अ म होजाता ह वहा              योितष शा              े
                                           ारा रोग क मूल(जड़) को पकड कर उसका िनदान करना लाभदायक एवं
उपायोगी िस      होता ह।
       हर य          म लाल रं गक कोिशकाए पाइ जाती ह, जसका िनयमीत वकास                   म ब         े
                                                                                                तर क से होता रहता ह।
जब इन कोिशकाओ के              म म प रवतन होता है या वखं डन होता ह तब य                े
                                                                                     क शर र म     वा   य संबंधी वकारो
उ प न होते ह। एवं इन कोिशकाओ का संबंध नव                        े                       े      े
                                                            हो क साथ होता ह। ज से रोगो क होने क कारणा               य         के
ज मांग से दशा-महादशा एवं          हो क गोचर म     थती से       ा    होता ह।


       सव रोग िनवारण कवच एवं महामृ युंजय यं                 े
                                                           क मा यम से     य    े
                                                                              क ज मांग म        थत कमजोर एवं पी डत
     े
 हो क अशुभ          भाव को कम करने का काय सरलता पूव क कया जासकता ह। जेसे हर य                    को     ांड क उजा एवं
पृ वी का गु      वाकषण बल         भावीत कता ह    ठक उसी            कार कवच एवं यं    क मा यम से
                                                                                      े                ांड   क उजा के
सकारा मक       भाव से य         को सकारा मक उजा        ा    होती ह ज से रोग के      भाव को कम कर रोग मु           करने हे तु
सहायता िमलती ह।
       रोग िनवारण हे तु महामृ युंजय मं        एवं यं       का बडा मह व ह। ज से ह द ू सं कृ ित का         ायः हर           य
महामृ युंजय मं       से प रिचत ह।
                                                            29                                       ू
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     े
कवच क लाभ :
      एसा शा ो           वचन ह जस घर म महामृ युंजय यं             था पत होता ह वहा िनवास कता हो नाना           कार क
       आिध- यािध-उपािध से र ा होती ह।
      पूण      ाण    ित त एवं पूण चैत य यु         सव रोग िनवारण कवच कसी भी उ                           े
                                                                                            एवं जाित धम क लोग चाहे
           ी हो या पु ष धारण कर सकते ह।
                       े
       ज मांगम अनेक कारक खराब योगो और खराब                  हो क           ू
                                                                        ितकलता से रोग उतप न होते ह।
       ु                          ु
       कछ रोग सं मण से होते ह एवं कछ रोग खान-पान क अिनयिमतता और अशु तासे उ प न होते ह। कवच
       एवं यं                          े
                     ारा एसे अनेक कार क खराब योगो को न           कर, वा       य लाभ और शार रक र ण          ा   करने हे तु
       सव रोगनाशक कवच एवं यं             सव उपयोगी होता ह।
          े
       आज क भौितकता वाद आधुिनक युगमे अनेक एसे रोग होते ह, जसका उपचार ओपरे शन और दवासे भी
                        ु
       क ठन हो जाता ह। कछ रोग एसे होते ह जसे बताने म लोग हच कचाते ह शरम अनुभव करते ह एसे रोगो
                             े
       को रोकने हे तु एवं उसक उपचार हे तु सव रोगनाशक कवच एवं यं               लाभादािय िस    होता ह।
           येक य                                            े                           े
                          क जेसे-जेसे आयु बढती ह वैसे-वसै उसक शर र क ऊजा होती जाती ह। जसक साथ अनेक
                े
           कार क वकार पैदा होने लगते ह एसी          थती म उपचार हे तु सवरोगनाशक कवच एवं यं             फल द होता ह।
       जस घर म पता-पु , माता-पु , माता-पु ी, या दो भाई एक ह न                                             े
                                                                               मे ज म लेते ह, तब उसक माता क िलये
       अिधक क दायक              थती होती ह। उपचार हे तु महामृ युंजय यं     फल द होता ह।
       जस य          का ज म प रिध योगमे होता ह उ हे होने वाले मृ यु तु य क            एवं होने वाले रोग, िचंता म
       उपचार हे तु सव रोगनाशक कवच एवं यं            शुभ फल द होता ह।

नोट:- पूण     ाण     ित त एवं पूण चैत य यु        सव रोग िनवारण कवच एवं यं         े
                                                                                  क बारे म अिधक जानकार हे तु हम
से संपक कर।


                  े      ु      े
             या आपक ब चे कसंगती क िशकार ह?

                  े
             या आपक ब चे आपका कहना नह ं मान रहे ह?

                  े
             या आपक ब चे घर म अशांित पैदा कर रहे ह?
                                 ु         ु                े
  घर प रवार म शांित एवं ब चे को कसंगती से छडाने हे तु ब चे क नाम से गु                 व कायालत     ारा शा ो    विध-
  वधान से मं         िस     ाण- ित त पूण चैत य यु       वशीकरण कवच एवं एस.एन. ड बी बनवाले एवं उसे अपने घर
  म    था पत कर अ प पूजा, विध- वधान से आप वशेष लाभ                  ा     कर सकते ह।

  य द आप तो आप मं          िस    वशीकरण कवच एवं एस.एन. ड बी बनवाना चाहते ह, तो संपक इस कर सकते ह।

                                          GURUTVA KARYALAY
             92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785
                     Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
                                                              30                                       ू
                                                                                                    अ टबर 2010



                                         नवरा म क या पूजन अनु ान

                                                                                                         िचंतन जोशी
        नवरा      म    ु
                      कमा रका      पूजन- त-अनु ान       को                                       े
                                                                   अथातः जो स व, रज, तम तीन गुण क तीन           प धारण
                                ुं
अिनवाय अंग माना जाता ह। नवरा म कवार क याओं                                    े
                                                                   करती ह, जनक अनेक प ह एवं जो तीन काल म या
                                      े
का विध- वधान से पूजन कर उनको भोजन कराक व -                         ह, उन भगवती     मूित क म पूजा करता हँू ।
द     णा आ द भेट दे कर संतु करना चा हए।             ु
                                                   कमा रका
पूजन हे तु क या दो से दस वष तक ह होनी चा हए।                       चार वष क क या को क याणी माना जाता ह।

                                                                           े
                                                                   क याणी क पूजन से        य    को वजय, व ा, स ा एवं
                 ु
दो वष क क या को कमार माना जाता ह।                                  सुख   क    ाि   होकर    य      क सम त कामनाए पूण
 ु
कमार पूजन से य             े ु
                          क द:ख-द र ता का शमन होता                 होती ह।
ह।                                                                         े
                                                                   क याणी क पूजन का मं -
 ु    े
कमार क पूजन का मं -                                                क याणका रणीिन यंभ ानांपू जतािनशम।
                                                                                                   ्
 ु
कमार यचत वािनया सृ ज य पलीलया।                                     पूजयािमचतांभ    याक याणी सवकामदाम॥
                                                                                                    ्
                   ु
काद न पचदे वां तांकमार ंपूजया यहम॥
                                 ्                                 अथातः िनरं तर सुपू जतहोने पर भ       का क याण करना
          ु        े
अथातः जो कमार काितकय क जननी एवं               ा द दे वताओं         जसका      वभाव ह है , सब मनोरथ पूण करने वाली उन
                             ु
क लीलापूव क रचना करती ह, उन कमार दे वी क म पूजा                    भगवती क याणी क म पूजा करता हंू ।
करता हंू ।
                                                                   पांच वष क क या को रो हणी माना जाता ह।
तीन वष क क या को          मूित माना जाता ह।                                े
                                                                   रो हणी क पूजन से य          को उ म     वा   य क   ाि
    मूित क पूजन से य
          े                   को धम, अथ, काम क          ाि                 े
                                                                   होकर उसक सम त रोग का वनाश होता ह।
             े
होती ह। इसी क साथ घर म धन-धा य म वृ                 होता ह,                े
                                                                   रो हणी क पूजन का मं -
तथा पु -पौ     का लाभ     ा   होता ह।
                                                                   रोहय तीचबीजािन ा ज मसंिचतािनवै।
          े
    मूित क पूजन का मं -
                                                                   या दे वी सवभूतानांरो हणी पूजया यहम॥
                                                                                                     ्
स वा दिभ       मूितयातै हनाना व पणी।
                                                                                     े
                                                                   अथातः जो सब ा णय क संिचत बीज का रोहण करती ह,
    काल या पनीश         मूितपूजया यहम॥
                                     ्
                                                                   उन भगवती रो हणी क म उपासना करता हंू ।


                                        योितष संबंिधत वशेष परामश
     योित व ान, अंक       योितष, वा तु एवं आ या मक            ान स संबंिधत वषय म हमारे 28 वष से अिधक वष के
        े
 अनुभव क साथ                                        े                          े
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                                                                31                                                  ू
                                                                                                                 अ टबर 2010


छ:वष क क या को कािलका माना जाता ह।                                   अथातः वेद जनके                   े
                                                                                                ाक य क वषय म कारण का अभाव

कािलका क पूजन से
        े               य       के    वरोिध तथा श ु का               बतलाते ह तथा सबको सुखी बनाना जनका वाभा वक गुण

शमन हो कर उसपर वजय          ा        होती ह।                         है , उन भगवती शा भवीक म पूजा करता हंू ।

        े
कािलका क पूजन का मं -
                                                                     नौ वष क क या को दगा माना जाता ह।
                                                                                      ु
काली कालयतेसव       ा डं सचराचरम।
                                ्
                                                                     दगा क पूजन से
                                                                      ु   े                 य             े
                                                                                                         क दु   से दु   य    का दमन
क पा तसमयेया तांकािलका पूजया यहम॥                                    होता ह।     य      े
                                                                                       क क ठन से क ठन काय भी सरलता से
अथातः क प क अ त म जो चर-अचर स पूण
           े                                          ा ड को         िस     होते ह।
अपने अंदर वलीन कर लेती ह, उन भगवती कािलका क                               े
                                                                     दगा क पूजन का मं -
                                                                      ु
म पूजा करता हंू ।
                                                                     दगा
                                                                      ु     ायितभ ं या सदा दगाितनािशनी।
                                                                                            ु

सात वष क क या को च डका माना जाता ह।                                  द ु ञेयासवदे वानांतांदुगापूजया यहम॥
                                                                                                       ्

च डका क पूजन से
       े                य       को धन-स प            क     ाि        अथातः जो भ        को सदा संकट से बचाती ह, द:ख दर करना
                                                                                                                ु   ू

होती ह।                                                              जनका       वभाव ह तथा दे वता लोग भी ज ह जानने म
                                                                     असमथ ह, उन भगवती दगा क म पूजा करता हंू ।
                                                                                       ु
       े
च डका क पूजन का मं -

च डकांच ड पांचच ड-मु ड वनािशनीम।
                               ्                                     दस वष क क या को सुभ ा माना जाता ह।

तांच डपापह रणींच डकांपूजया यहम॥
                              ्                                             े
                                                                     सुभ ा क पूजन से            य         को सम त लोक म सुख ा

अथातः जो च ड-मु ड का संहार करने वाली ह तथा जनक                       होता ह।

कृ पा से घोर पाप भी त काल न हो जाता है , उन भगवती                           े
                                                                     सुभ ा क पूजन का मं -
च डका क म पूजा करता हंू ।                                                            ु
                                                                     सुभ ा ण चभ ानांक तेपू जतासदा।

                                                                     अभ नािशनींदेवींसुभ ांपूजया यहम॥
                                                                                                   ्
आठ वष क क या को शा भवी माना जाता ह।
                                                                     अथातः जो सुपू जत होने पर भ                 का क याण करने म सदा
        े
शा भवी क पूजन से        य       क िनधनता दर होती ह,
                                          ू
                                                                     संल न रहती ह, उन अशुभ वनािशनीभगवती सुभ ा क म
वाद- ववाद म वजय ा       होता ह।
                                                                     पूजा करता हंू ।
        े
शा भवी क पूजन का मं -

अकारणा समु प य मयै:प रक ितता।
                                                                     नवरा क अ मी अथवा नवमी के                            ु
                                                                                                                     दन कमा रका-पूजन
य या तांसुखदांदेवींशा भवींपूजया यहम॥
                                   ्                                 करने पर वशेष लाभ                ा     होता ह।


                                               मं     िस        दलभ साम ी
                                                                 ु
  ह था जोड - Rs- 370                       घोडे क नाल- Rs.351                           माया जाल- Rs- 251
  िसयार िसंगी- Rs- 370                     द        णावत शंख- Rs- 550                   इ           जाल- Rs- 251
   ब ली नाल- Rs- 370                       मोित शंख- Rs- 550                            धन वृ             हक क सेट Rs-251
                                                           32                                    ू
                                                                                              अ टबर 2010



                                              ॥दगा चालीसा॥
                                                ु
नमो नमो दग सुख करनी।
         ु                                ी भैरव तारा जग ता रणी।              िनिश दन        यान धरो शंकर को।
नमो नमो दग दःख हरनी ॥१॥
         ु  ु                            िछ नभालभव दःखिनवा रणी॥१६॥
                                                    ु                         काहुकाल न हं सुिमरो तुमको॥३१॥
िनरं कार है    योित तु हार ।              े
                                         कह र वाहन सोह भवानी।                 श        प का मरम न पायो।
           ै
ितहँू लोक फली उ जयार ॥२॥                 लांगुर वीर चलत अगवानी॥१७॥            श       गई तब मन पिछतायो॥३२॥
शिश ललाट मुख महा वशाला।                  कर म ख पर ख ग वराजै।                 शरणागत हई क ित बखानी।
                                                                                      ु
ने             ु
       लाल भृ क ट वकराला ॥३॥             जाको दे ख काल डर भाजै॥१८॥            जय जय जय जगद बभवानी॥३३॥
 प मातु को अिधक सुहावे।                  सोहै अ     और     शूला।              भई      स न आ द जगद बा।
दरशकरत जन अित सुखपावे ॥४॥                जाते उठत श ु हय शूला॥१९॥             दई श          न हं क न वल बा॥३४॥
तुम संसार श           लै क ना।           नगरकोट म तु ह ं वराजत।               मोको मातु क       अित घेरो।
पालन हे तु अ न धन द ना ॥५॥               ितहँु लोक म डं का बाजत॥२०॥           तुम बन कौन हरै दःख मेरो॥३५॥
                                                                                              ु

अ नपूणा हई जग पाला।
         ु                               शु भ िनशु भ दानव तुम मारे ।          आशा तृ णा िनपट सताव।
तुम ह आ द सु दर बाला ॥६॥                 र बीज शंखन संहारे ॥२१॥               मोह मदा दक सब बनशाव॥३६॥
 लयकाल सब नाशन हार ।                     म हषासुर नृ प अित अिभमानी।           श ु नाश क जै महारानी।
तुम गौर िशवशंकर यार ॥७॥                                   ु
                                         जे ह अघ भार मह अकलानी॥२२॥            सुिमर इकिचत तु ह भवानी॥३७॥
िशव योगी तु हरे गुण गाव।                  प कराल कािलका धारा।                 करो कृ पा हे मातु दयाला।
      ा व णु तु ह िनत          याव ॥८॥   सेन स हत तुम ित ह संहारा॥२३॥         ऋ -िस          दै करहु िनहाला।३८॥
 प सर वती को तुम धारा।                   पर गाढ़ स तन पर जब जब।                         ँ          ँ
                                                                              जब लिग जऊ दया फल पाऊ।
दे सुबु    ऋ ष मुिनन उबारा ॥९॥           भईसहाय मातु तुम तब तब॥२४॥                                 ँ
                                                                              तु हरो यश म सदा सुनाऊ॥३९॥
धरयो      प नरिसंह को अ बा।              अमरपुर अ      बासव लोका।              ी दगा चालीसा जो कोई गावै।
                                                                                  ु
परगट भई फाड़कर ख बा ॥१०॥                  तब म हमा सब रह अशोका॥२५॥             सब सुख भोग परमपद पावै॥४०॥

र ा कर             ाद बचायो।              वाला म है      योित तु हार ।        दोहा: दे वीदास शरण िनज जानी।
हर या         को    वग पठायो॥११॥         तु ह सदा पूज नर-नार ॥२६॥             करहु कृ पा जगद ब भवानी॥
ल मी      प धरो जग माह ं।                 ेम भ      से जो यश गाव।
     ी नारायण अंग समाह ं॥१२॥             दःख दा र
                                          ु           िनकट न हं आव॥२७॥                भूिमलाभ यं
     ीरिस धु म करत वलासा।                 यावे तु ह जो नर मन लाई।
                                                                              भूिम     से    संबंिधत    याकलाप
दयािस धु द जै मन आसा॥१३॥                               ु
                                         ज म-मरण ताकौ छ ट जाई॥२८॥
                                                                                  ारा धन लाभ होता ह। भूिम से
हं गलाज म तु ह ं भवानी।                  जोगी सुर मुिन कहत पुकार ।
                                                                              संबंिधत वाद- ववाद म सफलता
म हमा अिमत नजात बखानी॥१४॥                योगन हो बन श           तु हार ॥२९॥
                                                                                  ा   होती ह।
मातंगी अ       धूमावित माता।             शंकर आचारज तप क नो।
भुवने र बगला सुख दाता॥१५॥                कामअ       ोधजीित सब लीनो॥३०॥        मू य मा : Rs-550
                                                                               33                                   ू
                                                                                                                 अ टबर 2010



                                                                शाप वमोचन मं
                                                                                                                   व तक.ऎन.जोशी

च डका शाप वमोचन मं
च डका शाप वमोचन मं                             े
                                              क पाठ को करने से दे वी क पूजा म क गयी कसी भी कार                 ु ट (भूल) से िमला   ाप
ख म हो जाता है ।

शाप- वमोचन संक प
ऊँ     अ य                      ीच डकाया            विस व ािम शाप वमोचन             म     य   विस नारदसंवादसामवेदािधपित   ाण   ऋषय:
सव यका रणी                        ीदगा दे वता च र
                                    ु                यं बीजं    ं श    :     गुणा म व पच डकाशाप वमु ो मम संक पतकायिस यथ जपे
विनयोग:।

शाप वमोचन मं
    ं                      ै
ॐ ( ) र ं रे त: व प यै मधुकटभम द यै                              विस व ािम शापाद वमु ाभव॥१॥
ॐ रं र                     व प यै म हषासुरम द यै,         विस व ािम शापाद वमु ाभव॥२॥
ॐ          ुं             ुधा व प यै दे वव दतायै         विस व ािम शापाद वमु ाभव॥३॥
ॐ छां छाया व प यै दतसंवा द यै
                   ू                                      विस व ािम शापाद वमु ाभव॥४॥
ॐ शं श                       व प यै धू लोचनघाित यै             विस व ािम शापाद वमु ाभव॥५॥
ॐ तं तृ षा व प यै च डमु डवधका र यै                              विस व ािम शापाद वमु ाभव॥६॥
ॐ          ां             ा त व प यै र बीजवधका र यै              विस व ािम शापाद वमु ाभव॥७॥
ॐ जां जाित प यै िनशु भवधका र यै                                विस व ािम शापाद वमु ाभव॥८॥
ॐ लं ल जा व प यै शु भवधका र यै                                 विस व ािम शापाद वमु ाभव॥९॥
ॐ शां शा त व प यै दे व तु यै                             विस व ािम शापाद वमु ाभव॥१०॥
ॐ      ं                   ा व प यै सकलफ़लदा यै            विस व ािम शापाद वमु ाभव॥११॥
ॐ      ीं बु                 व प यै म हषासुरसै यनािश यै           विस व ािम शापाद वमु ाभव॥१२॥
ॐ कां का त व प यै राजवर दायै                               विस व ािम शापाद वमु ाभव॥१३॥
ॐ माँ मातृ व प यै अनगलम हमास हतायै                                    विस व ािम शापाद वमु ाभव॥१४॥
ॐ               ं         ीं दं ु दगायै सं सव यका र यै
                                   ु                       विस व ािम शापाद वमु ाभव॥१५॥
ॐ ऐं                  ं     लीं नम: िशवायै अभे कवच व प यै                  विस व ािम शापाद वमु ाभव॥१६॥
ॐ                   ं का यै कािल       ं फ़ट    वाहायै ऋ वेद व प यै            विस व ािम शापाद वमु ाभव॥१७॥
ॐ ऐं                  ं     लीं महाकालीमहाल मीमहासर वती व प यै                 गुणा मकायै दगादे यै नम:॥१८॥
                                                                                           ु

इ येवं ह महाम                                                           ु
                                   ान प ठ वा परमे र, च ड पाठं दवा रा ौ कयादे व न संशय:॥१९॥
एवं म                     ं न जानाित च ड पाठं करोित य:, आ मानं चैव दातारं                    ु
                                                                                        ीणं कया न संशय:॥२०॥
( ीदगामापणाम तु)
    ु
                                                      34                                    ू
                                                                                         अ टबर 2010



                                         ीकृ ण कृ त दे वी         तुित
        नवरा म      ा और ेमपूव क महाश                                                                  े
                                         भगवती दे वी क पूजा-उपासना करने से यह िनगु ण व पा दे वी पृ वी क सम त
              े
जीव पर दया करक वयं ह सगुणभाव को ा होकर           ा, व णु और महे श प से उ प , पालन और संहार काय करती ह।

 ीकृ ण उवाच
 वमेव सवजननी मूल कृ ितर      र।
 वमेवा ा सृ     वधौ वे छया     गुणा मका॥१॥
कायाथ सगुणा वं च व तुतो िनगु णा वयम ्।
पर     ा व पा वं स या िन या सनातनी॥२॥
तेजः व पा परमा भ ानु ह व हा।
सव व पा सवशा सवाधारा परा पर॥३॥

सवबीज व पा च सवपू या िनरा या।
सव ा सवतोभ ा सवमंगलमंगला॥४॥
अथातः आप व जननी मूल कृ ित ई र हो, आप सृ          क उ प      े
                                                           क समय आ ाश       े
                                                                           क प म वराजमान रहती हो और
 वे छा से     गुणा मका बन जाती हो।

य प व तुतः आप वयं िनगु ण हो तथा प योजनवश सगुण हो जाती हो। आप पर             व प, स य, िन य एवं सनातनी हो।

परम तेज व प और भ        पर अनु ह करने आप शर र धारण करती ह । आप सव व पा, सव र , सवाधार एवं परा पर हो। आप
सवाबीज व प, सवपू या एवं आ यर हत हो। आप सव , सव कार से मंगल करने वाली एवं सव मंगल क भी मंगल हो।




                                   पित-प ी म कलह िनवारण हे तु
                          े                                               े
 य द प रवार म सुख-सु वधा क सम त साधान होते हए भी छोट -छोट बातो म पित-प ी क बच मे
                                            ु
                         े                   े
 कलह होता रहता ह, तो घर क जतने सद य हो उन सबक नाम से गु                         व कायालत       ारा शा ो
     विध- वधान से मं      िस       ाण- ित त पूण चैत य यु          वशीकरण कवच एवं गृ ह कलह नाशक
     ड बी बनवाले एवं उसे अपने घर म बना कसी पूजा, विध- वधान से आप वशेष लाभ                           ा   कर
 सकते ह। य द आप मं                िस   पित वशीकरण या प ी वशीकरण एवं गृ ह कलह नाशक ड बी
 बनवाना चाहते ह, तो संपक आप कर सकते ह।

                                       GURUTVA KARYALAY
              92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                 Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785
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                                                               35                                       ू
                                                                                                     अ टबर 2010



                                        े
                                   मां क चरण िनवास करते सम त ह तीथ

                                                                                                              िचंतन जोशी
           याग और िन: वाथ          ेम क     ित मूित ज म
दे ने वाली मां अपनी संतान को नौ म हने गभ म उसका                               े
                                                                    शतपथ ा ण क वचन
पोषण कर, असहनीय             सव क       सहकर उसे ज म दे ती           मातृ मान पतृ मानाचायवान् पु षो वेद
        े
ह। मां क इस              याग और िन: वाथ          ेम का बदला                  े
                                                                    अथातः जसक पास माता, पता और गु जेसे तीन उ म
चाहकर भी कोई नह ं चुका सकता।                                        िश क ह वह ं मनु य सह अथ म मानव बनता ह।
        सम त         य       क     थन गु         मां होती ह।
                                                                           संसार म मातृ मान वह होता है , जसक माता
 यो क मां से         य              े
                           को जीवन क आदश और सं कार
                                                                                             े
                                                                    गभाधान से लेकर जब तक गभ क शेष विध- वधान पूरे न
आद         ान    ा   होता ह। हमारे धम शा ो म उ लेख
                                                                    हो जाएं, तब तक संयमीत और सुशील यवहार करे ।               यो क
िमलता ह क उपा याओं से दस गुना                े    आचाय होते
                                                                    मातृ गभ म सं का रत होने का सबसे बड़ा आदश उदाहरण
ह, एवं आचाय से सौ गुना             े     पता और       पता से
                                                                    महाभारत म अिभम यु का दे खने को िमलता ह, जसने
हजार गुना        े                            े
                     माता होती है । यो क मां क शर र म
                                                                    अपनी मां से गभ म ह च     यूह तोड़ने का उपाय सीख िलया
सभी दे वताओं और सभी तीथ का वास होता है । इसी
                                                                    था।
िलए    व        क सव े                          े
                             भारतीय सं कृ ित म कवल मां
                                                                           इसी मां क ममता और िन: वाथ                ेम को पाने
          े
को भगवान क समान माना गया ह। इस िलये मां पू य,
                                                                     े
                                                                    क िलये मनु य ह नह ं दे वता भी तरसते ह। इस िलये
 तुित यो य और आ ान करने यो य होती ह।
                                                                                                           े
                                                                    बार-बार अवतार लेकर अपनी लीलाएं बखेरने क िलये
        महाभारत म भी उ लेख िमलता ह क जब य
                                                                    पृ वी पर ज म लेते ह। इ से        ात होता ह क मां के
ने युिध र से सवाल कया क भूिम से भी भार कौन ह? तो
                                                                    चरण म ह सभी तीथ का पु य              ा    हो जाता है ।
युिध र ने उ र दया
                                                                           इस िलये ब चा सबसे पहले जो बोल नीकलते ह,
               े
माता गु तरा भूम:।
                                                                    वह                                  े
                                                                          मां श द होता ह, एक बार म ह झटक से ब चे
अथातः मां इस भूिम से भी कह ं अिधक भार होती ह।
                                                                     े
                                                                    क मुंह से मां िनकल जाता है यािन मां का उ चारण भी
आ द शंकराचाय का कथन ह '                                             सबसे आसान। अ य सभी स दो म उसे थोड क ठनाई
 ु               ु
कपु ो जायेत य प कमाता न भवित।                                       होती ह जस कारण वह उन श दो का उ चराण धीरे -
             ु                            ु
अथातः पु तो कपु हो सकता है , पर माता कभी कमाता                      धीरे िसखता ह। सबसे बडा उदाहरण ह, जो आपने आये
नह ं हो सकती।                                                       दन दे खा सुना और आजमाय होगा,                     य        जब
                                                                    परे शानी म होता ह, क          झेल रहा होता ह, या
भगवान       ी रामका वचन ह।
                                                                    आक मक संकट आने, कसी आघात से शर र पर चोट
जननी ज मभूिम             वगाद प गर यसी।
                                                                    लग जाये तो पर सबसे पेहले मां को याद करता ह।
अथातः जननी और ज मभूिम वग से भी बढ़कर होते ह।
                                                                    इस िलये मां को क      दे ने वाली संतान को दै व आपदा,
                                                                    दःख, क
                                                                     ु         भोगना पडता ह। अपने मां का िनरादर न
तै र योपिनष          म उ लेख कया गया ह।
                                                                    कर और उनक सेवा अव य कर।
मातृ दे वो भव:
                                                               36                                         ू
                                                                                                       अ टबर 2010



                                            मातृ सुख एवं                    योितष

                                                                                                          िचंतन जोशी
      वै दक      योितष शा    े
                            क अनुशार चतुथ भाव से य                      क माता, वाहन, चल-अचल संप        का       थािय व, सुख-
शांित का वचार कया जाता ह। मातृ सुख एवं सांसा रक सुख का वचार एवं माता क                              थती का पता लगा सकता
ह। अथात जस य           को माता का सुख       ा     होता ह, वह        य      संसार म अ य सुख को भोग पाता ह।

          ुं
      ल न कडली म चतुथ भाव अशुभ हो जाता ह। उस जातक को मातृ एवं संसा रक सुख दोनो का अभाव रहता
      ह।

              ुं   े
       जस ज म कडली क चतुथ भाव म िम गत                        वरािश म गु , बुध, चं , शु       आ द सौ य        ह         थत ह , तो
                        े
      जातक को मातृ सुख क साथ ह अ य सुख                  क      ाि       होती ह।

     य द चतुथ भावा पर शुभ      ह   क           ी हो, तो य                       े
                                                                    को मातृ सुख क साथ ह अ य सुख          क       ाि     होती ह।

          य       ुं                      े            े
                क कडली म चतुथ भावा से सास क साथ जाितका क संबध को दशाता ह।

     यद             ुं
                ी क कडली का चतुथ भाव शुभ हो, चतुथ भाव म शुभ                       ह   थत हो या शुभ     ह क            ी हो, तो उसे
      माता और ससुराल दोन जगह मान-स मान                   ा   होता ह।

     यद             ुं
                ी क कडली का चतुथ भाव अशुभ हो, चतुथ भाव म अशुभ                         ह   थत हो या अशुभ          ह क         ी हो,
      तो उसे माता और ससुराल दोन जगह मातृ सुख एवं अ य सुख म कमी रहती ह।

विभ न          हो का चतुथ भाव म       भाव
  
      य द चतुथ भाव म सूय का शुभ                                                     े
                                            भाव हो, तो जातक क माता उ च पद वाली सूय क समान तेज वी होती
      ह।
     य द चतुथ भाव म चं      का शुभ     भाव हो, तो जातक क माता शांत, दयालु                  वभाव क िमलनसार होती ह।
     य द चतुथ भाव म मंगल का शुभ                भाव हो, तो जातक क माता थोड गु से वाली, भूिम-भवन क                           वामी,
      प रवार का पोषण करने वाली होती ह।
     य द चतुथ भाव म बुध का शुभ         भाव हो, तो जातक क माता चतुर, बु मान होती ह।
     य द चतुथ भाव म बृ ह पित का शुभ             भाव हो, तो जातक क माता धािमक               वभाव वाली होती ह।
     य द चतुथ भाव म शु       का शुभ    भाव हो, तो जातक क माता सुंदर, तेज वनी होती ह।
     य द चतुथ भाव म शिन का शुभ         भाव हो, तो जातक क माता धमपरायण होती ह।
     य द चतुथ भाव म राहु का शुभ        भाव हो, तो जातक क माता राजिनित                    होती ह।
                     े
      य द चतुथ भाव म कतु का शुभ         भाव हो, तो जातक क माता सा वक होती ह।

यद    ह अशुभ हो तो        ू
                       ितकल प रणाम      ा        होते दे खे गये ह।
                                                   37                                     ू
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                                        सव काय िस         कवच
जस     य     को लाख     य                      े
                                और प र म करने क बादभी उसे मनोवांिछत सफलताये एवं कये गये काय
म िस       (लाभ)    ा नह ं होती, उस य        को सव काय िस      कवच अव य धारण करना चा हये।

कवच के      मुख लाभ: सव काय िस          कवच के   ारा सुख समृ     और नव          े
                                                                             ह क नकारा मक भाव को
शांत कर धारण करता य               े                े ु
                                 क जीवन से सव कार क द:ख-दा र         का नाश हो कर सुख-सौभा य एवं
उ नित ाि      होकर जीवन मे सिभ               े
                                        कार क शुभ काय िस       होते ह। जसे धारण करने से य            यद
यवसाय करता होतो कारोबार मे वृ            होित ह और य द नौकर करता होतो उसमे उ नित होती ह।


   सव काय िस             े                       े
                     कवच क साथ म सवजन वशीकरण कवच क िमले होने क वजह से धारण करता
       क बात का दसरे
                 ू          य    ओ पर    भाव बना रहता ह।

   सव काय िस              े                  े
                      कवच क साथ म अ ल मी कवच क िमले होने क वजह से य                          पर मां महा
                                                              े
       सदा ल मी क कृ पा एवं आशीवाद बना रहता ह। ज से मां ल मी क अ                            प (१)-आ द
       ल मी, (२)-धा य ल मी, (३)-धैर य ल मी, (४)-गज ल मी, (५)-संतान ल मी, (६)- वजय
       ल मी, (७)- व ा ल मी और (८)-धन ल मी इन सभी                 पो का अशीवाद      ा     होता ह।

   सव काय िस              े
                      कवच क साथ म तं                   े
                                              र ा कवच क िमले होने क वजह से तां क बाधाए दर
                                                                                        ू
       होती ह, साथ ह नकार मन श                        ु
                                           यो का कोइ क भाव धारण कता           य        पर नह ं होता। इस
       कवच के      भाव से इषा- े ष रखने वाले य      ओ    ारा होने वाले द ु   भावो से र ाहोती ह।

   सव काय िस              े                   े
                      कवच क साथ म श ु वजय कवच क िमले होने क वजह से श ु से संबंिधत
       सम त परे शािनओ से                 ु
                                  वतः ह छटकारा िमल जाता ह। कवच के             भाव से श ु धारण कता
       य                ु
              का चाहकर कछ नह          बगड सकते।

         े                     े
अ य कवच क बारे मे अिधक जानकार क िलये कायालय म संपक करे :

कसी य         वशेष को सव काय िस          कवच दे ने नह दे ना का अंितम िनणय हमारे पास सुर            त ह।

                                   GURUTVA KARYALAY
           92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                     Call Us - 9338213418, 9238328785
               Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
                   Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com

                    (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
                                                        38                                  ू
                                                                                         अ टबर 2010



                                                    मातृ भ
        गर ब प रवार म एक पित-प ी व दो ब चे थे। जब कह ं मजदर भी नह ं िमलती थी, तब घर म भोजन क
                                                          ू                                 े
     ु
िलए कछ भी नह ं रह गया, तो पित से अपनी प ी व ब चे का भुख से तड़पना दे खा नह ं गया। वह उ ह छोड़कर कह ं
                              े
चला गया। प रवार का पेट पालने क िलये उस बेचार                     े                         ु
                                                        ी ने घर क बतन और कपड़े बगैरा बेचकर कछ दन काम
चलाया। घरका सामान बेच-बेचकर जब घर खाली हो गया, तो वह दोन ब च को लेकर भीख मांगने िनकल पड । उसे
          ु
भीख म जो कछ िमलता था, उसे पहले ब च को खलाकर तब वह बचा हआ खाती और न बचता तो पानी पीकर ह
                                                       ु
सो जाया करती थी।
                 े
        थोड़े दन क बाद वह                         े               े                             ं
                               ी बीमार हो गई। उसक दस वष य बड़े लड़क को भीख मांगने जाना पड़ता था। कतु
                  ु
वह बालक भीख म जो कछ पाता था, उससे तीन का पेट नह ं भरता था। माता            वर म बेसुध पड़ रहती थी और छोटे
                                               े
ब चे को संभालने वाला घर म और कोई न था। वह भूख क मारे इधर-उधर भटकते हए एक दन वह मर गया।
                                                                    ु
        बड़ा लड़का जो भीख मांगकर लाता वह पहले मां को खला दे ता। एक बार कई दन तक उसे अपने भोजन के
     ु                             े
िलए कछ नह ं िमला। वह एक स जन पु ष क घर पहंु चा, तो उ ह ने कहा- मेरे पास थोड़े सा चावल ह। तुम यह
                े                                  े
बैठकर खा लो। लड़क ने बीमार मां का हवाला दे ते हए उसक िलए दो मु ठ चावल क मांग क । उन स जन ने कहा-
                                              ु
चावल इतना कम है क तु हारा भी पेट नह ं भरे गा। इसिलए तु ह खा लो। तब लड़का बोला मां जब अ छ थी तो
मुझे खलाकर                                       े                              ै
                वयं बना खाए रह जाती थी। अब आज उसक बीमार होने पर म उसे बना खलाए कसे खा सकता हंू ।
   े
लड़क क मातृ भ        दे खकर स जन बहत
                                  ु                                        ं
                                             स न हए और चावल लेने घर म गए। कतु लौटकर आने पर दे खा क
                                                  ु
लड़का भूिम पर िगरकर मृ यु को ा         हो चुका था।

                                                     ***
                                                    े
                                        पु चार कार क होते ह
               े
    ी म भागवत क अनुसार
                े
दे व ष नारद िच कतु को जो उपदे श दे ते ह। वह इस कार ह।
                             े
नारदजी बोले राजन पु चार कार क होते ह।
श ु पु , ऋणानुबंध पु , उदासीन और सेवा पु ।
    श ु पु :श ु पु वह होता ह, जो पु माता- पता को क दे ते ह, कटु वचन बोलते ह और उ ह लाते ह, एवं जो श ुओं जेसा
     काय करते ह वे श ु पु कहलाते ह।
                                        े    े                                          े
     ऋणानुबंध पु :वह होता ह, जो पूव ज म क कम क अनुसार शेष रह गए अपने ऋण आ द को पूण करने क िलए जो पु
     ज म लेता है वे ऋणानुबंध पु कहलाते ह।
                                                      े                              े
     उदासीन पु :वह होता ह, जो पु माता- पता से कसी कार क लेन-दे न क अपे ा न रखते ववाह क बाद उनसे वमुख हो
     जाए, उनका यान ना रखे, वे उदासीन पु कहलाते ह।
    सेवा पु :जो पु माता- पता क सेवा करता है , माता- पता का यान रखते ह, उ ह कसी कार क कोई कमी नह ं होने
         े
     दे त, ऐसे पु सेवा पु अथात धम पु कहलाते ह।
                                                          39                          ू
                                                                                   अ टबर 2010



                                     दे वी आराधना से सुख               ाि
                                                                                      व तक.ऎन.जोशी

             े     ं
दे वी भागवत क आठव कध म दे वी उपासना का व तार से वणन है । दे वी का पूजन-अचन-उपासना-साधना इ या द के
प यात दान दे ने पर लोक और परलोक दोन सुख दे ने वाले होते ह।

                   े                                 े
        ितपदा ितिथ क दन दे वी का षोडशेपचार से पूजन करक नैवे
        े
       क प म दे वी को गाय का घृ त (घी) अपण करना चा हए। मां को
       चरण चढ़ाये गये घृ त को ा हण म बांटने से रोग से मु
       िमलती है ।
                   े
         तीया ितिथ क दन दे वी को चीनी का भोग लगाकर दान
       करना चा हए। चीनी का भोग लागाने से य         द घजीवी होता
       ह।
                    े
       तृ तीया ितिथ क दन दे वी को दध का भोग लगाकर दान करना
                                   ू
       चा हए। दध का भोग लागाने से य
               ू                          को दख से मु
                                              ु
       िमलती ह।
                 े
       चतुथ ितिथ क दन दे वी को मालपुआ भोग लगाकर दान करना
       चा हए। मालपुए का भोग लागाने से य          क वप      का नाश
       होता ह।
                  े             े                                े
       पंचमी ितिथ क दन दे वी को कले का भोग लगाकर दान करना चा हए। कले का भोग लागाने से य      क बु   ,
       ववेक का वकास होता ह। य         े
                                     क प रवार कसुख समृ         म वृ   होती ह।
                े
       ष ी ितिथ क दन दे वी को मधु (शहद, महु, मध) का भोग लगाकर दान करना चा हए। मधु का भोग लागाने से
        य     को सुंदर व प    क    ाि होती ह।
                 े
       स मी ितिथ क दन दे वी को गुड़ का भोग लगाकर दान करना चा हए। गुड़ का भोग लागाने से य       े
                                                                                            क सम त
       शोक दर होते ह।
            ू
                 े
       अ मी ितिथ क दन दे वी को     ीफल (ना रयल) का भोग लगाकर दान करना चा हए। गुड़ का भोग लागाने से
        य      े
              क संताप दर होते ह।
                       ू
                 े                 े                                       े
       नवमी ितिथ क दन दे वी को धान क लावे का भोग लगाकर दान करना चा हए। धान क लावे का भोग लागाने से
        य      े
              क लोक और परलोक का सुख      ा होता ह।


                                            तं       र ा कवच
  तं र ा कवच को धारण करने से य  े                                          े
                               क उपर कगई सम त तां क बाधाएं दर होती ह, उसी क साथ ह
                                                            ू
  धारण कता य                                      ु
                पर कसी भी कार क नकार मन श यो का क भाव नह ं होता। इस कवच क भावे
  से इषा- े ष रखने वाले सभी लोगो     ारा होने वाले द ु    भावो से र ाहोती ह।    मू य मा : Rs.730
                                                             40                                      ू
                                                                                                  अ टबर 2010



                                            ऋ वेदो           दे वी सू म ्
अहिम य च य सू          य वागा भृ णी ऋ ष: स च सुखा मक: सवगत: परमा मा दे वता,
  तीयाया ऋचो जगती, िश ानां        ु प ् छ द:, दे वीमाहा    य पाठे विनयोगः।
 यानम ्
िसंह था शिशशेखरा मरकत        यै तुिभभु जै: श खं च धनु:शरां        दधती ने ै   िभ: शोिभता।
                                                                 ु
आमु ा गदहारक कणरण का चीरण नूपुरा दगा दगितहा रणी भवतु नो र नो लस क डला॥
                                  ु   ु

दे वीसू म ्
अहं     े िभवसुिभ रा यहमा द यै त व दे वैः। अहं िम ाव णोभा बभ यहिम             ा नी अहमिशरवनोभा॥१॥
                                                                                         ्
अहं सोममाहनसं बभ यहं        व ारमुत पूषणं भगम। अहं दधािम
                                             ्                     वणं ह व मते सु ा ये यजमानाय सु वते॥२॥
अहं रा ी संगमनी वसूनां िच कतुषी     थमा य      यानाम। तां मा दे वा यदधु: पु
                                                    ्                           ा भू र था ां भू यावेशय तीम॥३॥
                                                                                                          ्
मयासो अ नम        यो वप यित य:     ा णित यई ृ णो यु         म। अम तवो मां तउप
                                                             ्                    य त       ु िध ु त     वं ते वदािम॥४॥
अहमेव     वयिमदं वदािम जु ं दे वेिभ त मानुषेिभः। यं कामये तं तमु ं कृ णोिम तं      ाणं तमृ षं तं सुमेधाम॥५॥
                                                                                                        ्
अहं     ाय धनुरा तनोिम        षे शरवे ह तवा उ। अहं जनाय समदं कृ णो यहं ावापृ िथवीआ ववेश॥६॥
अहं सुवे पतरम य मूध मम योिनर         व त: समु े । ततो व ित े भुवनानु व ोतामूं        ां व मणोप         पशिम॥७॥
अहमेव वात इव      वा यारभमाणा भुवनािन व ा। परो दवा पर एना पृ िथ यैतावती म हना संबभूव॥८॥
                                                            ***

                          विभ न दे वी क                      े
                                                      स नता क िलये गाय ी मं
दगा गाय ी : ॐ िग रजाये वधमहे , िशव याय धीम ह त नो दगा : चोदयात।
 ु                                                 ु

ल मी गाय ी : ॐ महाला मये वधमहे , व णु                     याय धीम ह त नो ल मी: चोदयात।

राधा गाय ी : ॐ वृ ष भानु: जायै वधमहे ,               याय धीम ह त नो राधा : चोदयात।

तुलसी गाय ी : ॐ ी तु         ये वधमहे , व ु याय धीम ह त नो वृ ंदा: चोदयात।

सीता गाय ी : ॐ जनक नं द ये वधमहे भुिमजाय धीम ह त नो सीता : चोदयात।

हं सा गाय ी : ॐ पर       साय वधमहे , महा हं साय धीम ह त नो हं स: चोदयात।

सर वती गाय ी : ॐ वाग दे यै वधमहे काम रा या धीम ह त नो सर वती : चोदयात।

पृ वी गाय ी : ॐ पृ वी दे यै वधमहे सह           मूरतयै धीम ह त नो पृ वी : चोदयात।
                                                           41                                  ू
                                                                                            अ टबर 2010



                          स त लोक दगा
                                   ु                                              दगा आरती
                                                                                   ु
दे व    वं भ सुलभे सवकाय वधाियनी।                               जय अ बे गौर मैया जय यामा गौर ।
कलौ ह कायिस यथमुपायं               ू ह य तः॥                    तुमको िनस दन     यावत ह र      हा िशवर ॥१॥

दे व उवाच:                                                      मांग िसंदर वराजत ट को मृ गमदको।
                                                                         ू
  ृ णु दे व    व यािम कलौ सव साधनम्।                            उ जवल से दोऊ नैना च      वदन नीको॥२॥

मया तवैव           नेहेना य बा तुितः    का यते॥                 कनक समान कलेवर र ा बर राजे।
                                                                र     पु प गल माला क ठन पर साजे॥३॥
विनयोगः
                                                                 े
                                                                कह र वाहन राजत ख ग ख पर धार ।
ॐ अ य           ी दगास
                   ु        ोक तो म        य
                                                                                        े ु
                                                                सुर नर मुिन जन सेवत ितनक दःख हार ॥४॥
नारायण ऋ षः अनु पछ दः,
                 ्

 ीम काली महाल मी महासर व यो दे वताः,                                  ुं
                                                                कानन कडल शोिभत नासा े मोती।

 ीदगा ी यथ स
   ु                     ोक दगापाठे विनयोगः।
                             ु                                  को टक चं     दवाकर राजत सम        योित॥५॥
                                                                शुंभ िनशंभु वदारे म हषासुरधाती।
ॐ      ािननाम प चेतांिस दे वी भगवती हसा।
                                                                धू    वलोचन नैना िनश दन मदमाती॥६॥
बलादाकृ य मोहाय महामाया                य छित॥
                                                                च ड मु ड संहारे शो णत बीज हरे ।
दग
 ु     मृ ता हरिस भीितमशेषज तोः                                      ै
                                                                मधु कटभ दोउ मारे सुर भयह न करे ॥७॥
 व थैः        मृ ता मितमतीव शुभां ददािस।                             हाणी   ाणी तुम कमलारानी।
                                                                आगम िनगम बखानी तुम िशव पटरानी॥८॥
दा र यदःखभयहा र ण वद या
       ु
सव पकारकरणाय सदा िच ा॥                                          चौसंठ योिगनी गावत नृ य करत भै ँ ।
                                                                बाजत ताल मृ दंगा अ    डम ँ ॥९॥
                           े
सवमंगलमंग ये िशवे सवाथसािधक।
                                                                तुम ह जग क माता तुम ह हो भरता।
          े
शर ये य बक गौ र नाराय ण नमोऽ तुते॥
                                                                भ न क दःखहता सुख स प
                                                                       ु                         कता॥१०॥
शरणागतद नातप र ाणपरायणे।                                        भुजा चार अित शोिभत वर मु ा धार ।
सव याितहरे दे व नाराय ण नमोऽ तुते॥                              मनवां छत फल पावे सेवत नर नार ॥११॥

सव व पे सवशे सवश              सम वते।                            ं
                                                                कचन थाल वराजत अगर कपुर बा ी।

भये य ा ह नो दे व दग दे व नमोऽ तुते॥                                       े
                                                                    ी माल कतु म राजत को ट रतन       योती॥१२॥
                   ु

रोगानशोषानपहं िस तु ा           ा तु कामान ् सकलानभी ान।
                                                       ्        माँ अ बे जी क आरती जो कोई नर गाये।
 वामाि तानां न वप नराणां वामाि ता ा यतां या त॥                  कहत िशवानंद     वामी सुख संप      पाये॥१३॥

सवाबाधा शमनं            ैलो य या खले व र।
एवमेव         वया कायम य ै र वनाशनम॥
                                   ्

॥ इित         ीस     ोक दगा संपूण म ् ॥
                         ु
                                                                42                                                    ू
                                                                                                                   अ टबर 2010



                                                  ुं
                                            ॥ िस क जका तो म ् ॥
िशव उवाच                                                             जा तं ह महादे व जपं िस ं कु                   व मे॥२॥
शृ णु दे व            ुं
              व यािम क जका तो मु मम।
                                   ्                                 ऐंकार सृ              पायै    ं
                                                                                                   कार     ितपािलका।
येन म         भावेण च ड जापः शुभो भवेत॥१॥
                                      ्                               लींकार काम प यै बीज पे नमोऽ तु ते॥३॥
                      ं
न कवचं नागला तो ं क लक न रह यकम।
                               ्                                     चामु डा च डघाती च यैकार वरदाियनी॥४॥
न सू ं ना प         यानं च न   यासो न च वाचनम॥२॥
                                             ्                       व चे चाभयदा िन यं नम ते मं                       प ण।
 ुं
क जकापाठमा ेण दगापाठफलं लभेत।
               ु            ्                                        धां धीं धूं धूज टे ः प ी वां वीं वूं वागधी र ॥५॥
अित गु तरं दे व दे वानाम प दलभम॥३॥
                            ु  ्                                       ां        ं                                       ु
                                                                                     ूं कािलका दे व शां शीं शूं मे शुभं क ॥६॥
गोपनीयं       य ेन    वयोिन रव पावित।                                हंु हंु हंु कार प यै जं जं जं ज भना दनी।
मारणं मोहनं व यं        त भनो चाटना दकम।
                                       ्                               ां   ीं       ूं भैरवी भ े भवा यै ते नमो नमः
                     ुं
पाठमा ेण संिस येत ् क जका तो मु मम॥४॥
                                  ्                                      ं
                                                                     अं क चं टं तं पं यं शं वीं दं ु ऐं वीं हं           ं॥७॥
                                                                     िधजा ं िधजा ं                ोटय    ोटय द ं कु    कु    वाहा॥
अथ मं
                                                                     पां पीं पूं पावती पूणा खां खीं खूं खेचर तथा ॥८॥
ॐ ऐं      ं   लीं चामु डायै व चे। ॐ ल हंु         लीं जूं सः
                                                                     सां सीं सूं स शती दे या मं िस ं कु                 व मे॥
 वालय         वालय वल       वल      वल     वल ऐं      ं   लीं
                                                                             ुं
                                                                     इदं तु क जका तो ं मं जागितहे तवे।
चामु डायै व चे        वल हं सं लं    ंफ    वाहा
                                                                     अभ े नैव दात यं गो पतं र                 पावित॥
                                                                           ुं
                                                                     य तु क जकया दे व ह नां स शतीं पठे त।
                                                                                                        ्
इित मं ः
                                                                     न त य जायते िस                 रर ये रोदनं यथा॥
नम ते           प यै नम ते मधुम दिन।
     ै
नमः कटभहा र यै नम ते म हषा दिन॥१॥
                                                                     । इित              ुं
                                                                                     ी क जका तो म ् संपूण म ् ।
नम ते शु भह यै च िनशु भासुरघाितिन।



                                    या आप कसी सम या से                                            त ह?
      े                     ु
   आपक पास अपनी सम याओं से छटकारा पाने हे तु पूजा-अचना, साधना, मं                                 जाप इ या द करने का समय नह ं
   ह? अब आप अपनी सम याओं से बीना                    कसी     वशेष पूजा-अचना,                           े
                                                                                           विध- वधान क आपको अपने काय म
   सफलता        ा         े                    े
                     कर सक एवं आपको अपने जीवन क सम त सुखो को                           ा     करने का माग       ा         े
                                                                                                                    हो सक इस िलये
   गु   व कायालत         ारा हमारा उ े य शा ो      विध- वधान से विश तेज वी मं ो ारा िस                        ाण- ित त पूण चैत य
   यु                े
          विभ न कार क य                                              े
                                 - कवच एवं शुभ फलदायी ह र एवं उपर आपक घर तक पहोचाने का है ।
                                                     गु     व कायालय:
                                         Bhubaneswar- 751 018, (ORISSA) INDIA,
                                        Call Us : 91+ 9338213418, 91+ 9238328785,
                        E-mail Us:- gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
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                                                                   43                                        ू
                                                                                                          अ टबर 2010



                                                             दगा कम ्
                                                              ु
दग परे िश शुभदे िश परा परे िश।
 ु                                            प े दग ब र महे              र काननेिश।        माहे    र    नयने     बले मखेिश।
व        े महे शदियतेक णाणवेिश।               र येधरे सकलदे वनुते गयेिश।                    तृ णे तरं िग ण बले गितदे          ुवेिश।
 तु ये        वधे सकलतापहरे सुरेिश।           कृ ण तुते कु       कृ पा                      कृ ण तुते कु     कृ पां
कृ ण तुते कु       कृ पां                     लिलतेऽ खलेिश॥४॥                               लिलतेऽ खलेिश॥७॥
लिलतेऽ खलेिश॥१॥
                                                 े सुराऽसुरनुते सकले जलेिश।                 व      भरे सकलदे व दते जयेिश।
द ये नुते        ु ितशतै वमले भवेिश।                                े
                                              गंगे िगर शदियते गणनायकिश।                     व      य थते शिशमु ख            णदे
क दपदारशतयु द र माधवेिश।                      द े                    े
                                                    मशानिनलये सुरनायकिश।                    दयेिश।
मेधे िगर शतनये िनयते िशवेिश।                  कृ ण तुते कु       कृ पां                     मातः सरोजनयने रिसके             मरे िश।
कृ ण तुते कु       कृ पां                     लिलतेऽ खलेिश॥५॥                               कृ ण तुते कु     कृ पां
लिलतेऽ खलेिश॥२॥                                                                             लिलतेऽ खलेिश॥८॥
                                                                  ै
                                              तारे कृ पा नयने मधुकटभेिश।
रासे      र              ु
               णततापहरे कलेिश।                 व े रे        र यमे िनखला रे िश।                  ं
                                                                                            दगा क पठित यः
                                                                                             ु                        यतः    भाते
धम ये भयहरे वरदा गेिश।                        ऊज चतुः तिन सनातिन                            सवाथदं ह रहरा दनुतां वरे याम्।
वा दे वते विधनुते कमलासनेिश।                      े
                                              मु किश।                                       दगा सुपू य म हतां व वधोपचारै ः
                                                                                             ु
कृ ण तुतेकु       कृ पां                      कृ ण तुते कु       कृ पां                      ा नोित वांिछतफलं न
लिलतेऽ खलेिश॥३॥                               लिलतऽ खलेिश॥६॥                                िचरा मनु यः॥९॥

पू ये महावृ षभवा हिन मंगलेिश।                 मो ेऽ थरे         पुरसु द रपाटलेिश।           ॥ इित              ं
                                                                                                        ी दगा क स पूण म ् ॥
                                                                                                           ु



                                                        मं िस यं
    गु                             े
           व कायालय ारा विभ न कार क यं कोपर ता                            प , िसलवर (चांद ) ओर गो ड (सोने) मे विभ न
                    े             े
       कार क सम या क अनुसार बनवा क मं िस                         पूण       ाण ित त एवं चैत य यु          कये जाते है . जसे
    साधारण (जो पूजा-पाठ नह जानते या नह कसकते) य                                बना कसी पूजा अचना- विध वधान वशेष
                                                     े
    लाभ ा कर सकते है . जस मे िचन यं ो स हत हमारे वष क अनुसंधान ारा बनाए गये यं भी समा हत
            े
    है . इसक अलवा आपक आव यकता अनुशार यं बनवाए जाते है . गु                             व कायालय ारा उपल ध कराये गये
    सभी यं       अखं डत एवं २२ गेज शु         कोपर(ता          प )- 99.99 टच शु                              े
                                                                                       िसलवर (चांद ) एवं 22 करे ट गो ड
                                  े                    े
    (सोने) मे बनवाए जाते है . यं क वषय मे अिधक जानकार क िलये हे तु स पक करे
                                                        गु     व कायालय:
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                                                         44                                               ू
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                                              ॥ भवा य कम ् ॥
न तातो न माता न ब धुन दाता                                     ु   ु     ु
                                                              ककम कसंगी कबु            ु
                                                                                      कदासः
न पु ो न पु ी न भृ यो न भता।                                   ु
                                                              कलाचारह नः कदाचारलीनः।
न जाया न व ा न वृ ममैव                                        कु       ु
                                                                    ः कवा य बंधः सदाऽह
गित    वं गित   वं वमेका भवािन॥१॥                             गित     व गित    वं वमेका भवािन॥५॥

भवा धावपारे महादःखभी ः
                ु                                              जेशं रमेशं महे शं सुरेशं
पपात   कामी     लोभी     म ः।                                 दनेशं िनशीथे रं वा कदािचत।
                                                                                       ्
 ु
कसंसार-पाश- ब ः सदाऽहं                                        न जानािम चाऽ यत ् सदाऽहं शर ये
गित    वं गित   वं वमेका भवािन॥२॥                             गित     वं गित   वं वमेका भवािन॥६॥

न जानािम दानं न च        यान-योगं                             ववादे वषादे      मादे   वासे
न जानािम तं     न च      तो -म     म।
                                    ्                         जले चाऽनले पवते श ुम ये।
न जानािम पूजां न च       यासयोगं                              अर ये शर ये सदा मां          पा ह
गित    वं गित   वं वमेका भवािन॥३॥                             गित     वं गित   वं वमेका भवािन॥७॥

न जानािम पु यं न जानािन तीथ                                   अनाथो द र ो जरा-रोगयु ो
न जानािम मु ं लयं वा कदािचत।
                           ्                                  महा ीणद नः सदा जा यव                ः।
न जानािम भ        तं वाऽ प मात-                               वप ौ      व ः    ण ः सदाऽहं
गित    वं गित   वं वमेका भवािन॥४॥                             गित     वं गित   वं वमेका भवािन॥८॥

                                                              ॥ इित             ं
                                                                        ीभवा य क संपूण म ् ॥



                                                     मा- ाथना
          अपराधसह ा ण               य तेऽहिनशं मया। दासोऽयिमित मां म वा                   म व परमे        र॥१॥
        आवाहनं न जानािम न जानािम वसजनम। पूजां चैव न जानािम
                                      ्                                                     यतां परमे      र॥२॥
            म     ह नं      याह नं भ     ह नं सुरे   र। य पू जतं मया दे व प रपूण तद तु मे॥३॥
         अपराधशतं कृ वा जगद बेित चो चरे त। यां गितं समवापनेित न तां
                                         ्                                                        ादय: सुराः॥४॥
        सापराधोऽ म शरणं              ा             े
                                         वां जगद बक। इदानीमनुक                               ु
                                                                          योऽहं यथे छिस तथा क ॥५॥
        अ ाना          मृ ते रा                ं
                                   या य यूनमिधक कृ तम। त सव
                                                     ्                    यतां दे व         सीद परमे       र॥६॥
           कामे    र जग मात: स चदान द व हे । गृ हाणाचािममां                    ी या सीद परमे             र॥७॥
         गु ाितगु गो        ी     वं गृ हाणा म कृ तं जपम। िस भवतु मे दे व
                                                        ्                             व      सादा सुरे     र॥८॥
                                                               45                              ू
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                          दे व      ितमा
दे व पूजन मे कछ वा तुशा ी घर मे प थरक मूित का अथवा
              ु                                                           मं        िस              ा
म दर का िनषेध करते है ।
वा तवमे मूित का िनषेध नह है, पर एक बतेसे/१२ अंगुल अिधक              एकमुखी          ा -Rs- 1250,2800
 ं
ऊची मूित का िनषेध है ।*
                                                                    दो मुखी         ा -Rs- 100,151
अगु     पवादार य वत तयावदे व तु।
गृ हेषु ितमा काया नािधका श यते बुधैः॥                               तीन मुखी          ा -Rs- 100,151
                             (म      यपुराण २५८।५२)
                                                                    चार मुखी         ा -Rs- 55,100
                े
अथात:घरमे अंगूठक पवसे लेकर एक ब ा प रमाणक ह मूित होनी
चा हये। इ से बड मूित को व ानलोग घर मे शुभ नह बताते।                 पंच मुखी         ा -Rs- 28,55

शैलीं द मयीं है मीं धा वाघाकारस भवाम।
                                                                    छह मुखी          ा -Rs- 55,100
            ु
 ित ां वै पकव त सादे वा गृ हे नृ प॥                                 सात मुखी          ा -Rs- 120,190
                                 (वृ पाराशर)
अथात:प थर, का , सोना या अ य धातुओंक मूितक             ित ा घर या    आठ मुखी           ा -Rs- 820,1250
घर म दर म करनी चा हये।
                                                                    नौ मुखी         ा -Rs- 820,1250
घर या घर म दर म एक ब े से अिधक बड प थर क मूितक                      दसमुखी          ा -Rs- ........
 थापना से गृ ह वामीक स तान नह ं होती। उसक         थापना दे व
म दर मे ह करनी चा हये।                                               यारहमुखी         ा -Rs- 2800

गृ हे िलंग यं ना यं गणेश तयं तथा।
                                                                    बारह मुखी         ा -Rs- 3600
शंख यं तथा सूय ना य श             यं तथा।।                          तेरह मुखी         ा -Rs- 6400
 ेच े    ारकाया तु शाल ामिशला यम।
                                                                    चौदह मुखी          ा -Rs- 19000
तषां तु पूजनेनैव उ े गं ा ुयाद गृ ह ॥
                     (आचार काश:आचारे द)
                                      ु                             गौर षंकर         ा -Rs- .....
अथात: घर मे दो िशव िलंग, तीन गणेश, दो शंख, दो सूय- ितमा,
तीन दे वी ितमा, दो ारकाकच
                        े          (गोमित च ) और दो शाल ामका                   गु   व कायालय:
पूजन करनेसे गृ ह वामीको उ े ग (अशांित) ा होती है ।"                  Bhubaneswar- 751 018, (ORISSA) INDIA
                                                                    Call Us: 91+ 9338213418, 91+ 9238328785,
                                                                    E-mail Us:- gurutva.karyalay@gmail.com,
        े                    े
*अंगूठेक िसरे से लेकर किन ा क छोरतक एक ब ा होता                                 gurutva_karyalay@yahoo.in,
है । एवं एक ब ेम १२ अंगुल होते है ।
                                                46                                       ू
                                                                                      अ टबर 2010



                                   दगा ो र शतनाम
                                    ु                   तो म ्
       शतनाम   व यािम शृ णु व कमलानने।                  अनेकश ह ता च अनेका             य धा रणी।
  य य     सादमा ेण दगा
                    ु      ीता भवेत ् सती॥१॥           ु              ै
                                                      कमार चैकक या च कशोर युवती यितः॥१२॥

   सती सा वी भव ीता भवानी भवमोचनी।                       अ ौढा चैव      ौढा च वृ माता बल दा।
 आया दगा जया चा ा
      ु                    ने ा शूलधा रणी॥२॥            महोदर मु      े
                                                                     कशी घोर पा महाबला॥१३॥

   पनाकधा रणी िच ा च डघ टा महातपाः।                    अ न वाला रौ मुखी कालरा           तप वनी।
  मनो बु रहं कारा िच      पा िचता िचितः॥३॥            नारायणी भ काली व णुमाया जलोदर ॥१४॥

   सवम      मयी स ा स यान द व पणी।                       िशवदती कराली च अन ता परमे र ।
                                                             ू
अन ता भा वनी भा या भ याभ या सदागितः॥४॥               का यायनी च सा व ी         य ा      वा दनी॥१५॥

  शा भवी दे वमाता च िच ता र न या सदा।                    य इदं   पठे न यं दगानामशता कम।
                                                                           ु          ्
   सव व ा द क या द य           वनािशनी॥५॥             नासा यं व ते दे व             े
                                                                              षु लोकषु पावित॥१६॥

       अपणानेकवणा च पाटला पाटलावती।                     धनं धा यं सुतं जायां हयं ह तनमेव च।
   प टा बरपर धाना कलम जीरर जनी॥६॥                    चतुव ग तथा चा ते लभे मु ं च शा तीम॥१७॥
                                                                                       ्

       अमेय व मा     ू रा सु दर सुरसु दर ।             ु
                                                      कमार ं पूजिय वा तु     या वा दे वीं सुरे र म।
                                                                                                  ्
  वनदगा च मात गी मत गमुिनपू जता॥७॥
     ु                                                पूजयेत ् परया भ    या पठे नामशता कम॥१८॥
                                                                                         ्

   ा     माहे र चै       कौमार वै णवी तथा।               त य िस भवे        दे व सव: सुरवरै र प।
 चामु डा चैव वाराह ल मी        पु षाकृ ितः॥८॥        राजानो दासतां या त रा यि यमवापनुयात॥१९॥
                                                                                        ्

 वमलो क षणी        ाना    या िन या च बु दा।           गोरोचनाल       ु ु
                                                                   कक कमेन िस दरकपू रमधु येण।
                                                                               ू
       बहला बहल ेमा सववाहनवाहना॥९॥
         ु    ु                                      विल य य     ं विधना विध ो भवेत ् सदा धारयते
                                                                        पुरा रः॥२०॥
       िनशु भशु भहननी म हषासुरम दनी।
      ै
  मधुकटभह      ी च च डमु ड वनािशनी॥१०॥                  भौमावा यािनशाम े च        े शतिभषां गते।
                                                     विल य   पठे त ् तो ं स भवेत ् स पदां पदम॥२१॥
                                                                                             ्
       सवासुर वनाशा च सवदानवघाितनी।
  सवशा मयी स या सवा धा रणी तथा॥११॥



                            सवजन वशीकरण कवच
                                       मू य मा : Rs.1050
                                                       47                                              ू
                                                                                                    अ टबर 2010



                                               व ंभर         तुित
      व ंभर      तुित मूल    पसे गुजराती म व लभ भ ट   ारा िलखी गई ह।                             व तक.ऎन.जोशी

व ंभर अ खल व तणी जनेता।                                     रे रे भवानी बहु भूल थई ज मार ।
व ा धर वदनमां वसजो वधाता॥                                   आ जंदगी थई मने अितशे अकार ॥
दबु
 ु      दर कर स बु
         ु                  आपो।                            दोषो     जािळ सधळा तव छाप छापो।
माम ् पा ह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥१॥
                       ु                                    माम ् पा ह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥७॥
                                                                                   ु

                  ुं
भूलो प ड भवरने भटक भवानी।                                   खाली न कोइ        थळ छे वण आप धारो।
सुझे न ह लगीर कोइ दशा जवानी॥                                      ांडमां अणु-अणु मह ं वास तारो॥
भासे भयंकर वळ मनना उतापो।                                   श       न माप गणवा अग णत मापो।
माम ् पा ह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥२॥
                       ु                                    माम ् पा ह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥८॥
                                                                                   ु

आ रं कने उगरवा नथी कोइ आरो।                                 पापो     पंच करवा बधी र ते पूरो।
        ु
ज मांध छ जननी हु            ह हाथ तारो॥                     खोटो खरो भगवती पण हंु तमारो॥
ना शुं सुणो भगवती िशशुना वलापो।                             जाडयांधकार कर दर सुबु
                                                                           ू                 थापो।
माम ् पा ह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥३॥
                       ु                                    माम ् पा ह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥९॥
                                                                                   ु

मा कम ज म कथनी करतां वचा ।                                  शीखे सुणे रिसक छं द ज एक िच े।
आ सृ मां तुज वना नथी कोइ मा ॥                               तेना थक         वध ताप टळे खिचते॥
कोने कहंु कठण काळ तणो बळापो।                                बु      वशेष जगदं ब तणा       तापो।
माम ् पा ह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥४॥
                       ु                                    माम ् पा ह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥१०॥
                                                                                   ु

हंु काम        ोध मध मोह थक भरे लो।                              ी सदगु   शरनमां रह ने यजुं छंु ।
                       े
आडं बरे अित धणो म थी छकलो॥                                  रा                            ु
                                                                    दने भगवती तुजने भजुं छ॥
दोषो बधा दर कर माफ पापो।
          ू                                                 सदभ       सेवक तणा प रताप चापो।
माम ् पा ह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥५॥
                       ु                                    माम ् पा ह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥११॥
                                                                                   ु

ना शा ना         वणनु पयःपान पीधु।                          अंतर वषे अिधक उिम थतां भवानी।
ना मं     के    तुित कथा नथी काइ क धु॥                      गाऊ      तुित तव बळे नमीने मृ डानी॥
      ा धर नथी कया तव नाम जापो।                             संसारना सकळ रोग समूळ कापो।
माम ् पा ह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥६॥
                       ु                                    माम ् पा ह ॐ भगवती भव दःख कापो ॥१२॥
                                                                                   ु


                                          अ      ल मी कवच
                                            मू य मा : Rs.1050
                                                                  48                                      ू
                                                                                                       अ टबर 2010



                                            पित-प ी म कलह िनवारण हे तु
                                    े                                               े
           य द प रवार म सुख सु वधा क सम त साधान होते हए भी छोट -छोट बातो म पित-प ी क बच मे कलह
                                                      ु
होता रहता ह, तो िन न मं                                        े
                                       का जाप करने से पित-प ी क बचम शांित का वातावरण बनेगा
मं     -
धं िधं धुम धुज ते प ी वां वीं बूम वा ध            र। ं    ं                                      ु
                                                              ूं कािलका दे वी शं षीम शूं म शुभम क ॥

य द प ी यह          योग कर रह ह तो प ी क जगह पित श द का उ चारण करे
 योग विध –

           ातः    नान इ याद से िनवृ                 े ू                     े
                                              हो कर क दगा या मां काली दे वी क िच पर लाल पु प भेटा कर धूप-द प जला
            े
           क िस         फ टक माला से 21 दन तक 108 बार जाप करे लाभा             ा   होता ह।
          शी     लाभ    ाि   हे तु    योग करने से पूव मां क मं दर म अपनी समथता क अनुशार अथ या व
                                                            े                    े                             भेट कर।
                  े
           लाभ ाि क प यात माला को जल वाह कर द।

                 य द आप इस            योग विध करने म असमथ ह?, तो आप हमसे संपक कर अ य उपाय जान सकते ह।



                                                               ी यं
     " ी यं " सबसे मह वपूण एवं श           शाली यं है । " ी यं " को यं राज कहा जाता है यो क यह अ य त शुभ फ़लदयी यं
            े
 है । जो न कवल दसरे य
                ू                                                               े
                               ो से अिधक से अिधक लाभ दे ने मे समथ है एवं संसार क हर य         े
                                                                                             क िलए फायदे मंद सा बत होता
 है । पूण ाण- ित त एवं पूण चैत य यु              " ी यं " जस य         े                 े
                                                                      क घर मे होता है उसक िलये " ी यं " अ य त फ़लदायी
               े
 िस होता है उसक दशन मा से अन-िगनत लाभ एवं सुख क                    ाि होित है । " ी यं " मे समाई अ ितय एवं अ    यश
 मनु य क सम त शुभ इ छाओं को पूरा करने मे समथ होित है । ज से उसका जीवन से हताशा और िनराशा दर होकर वह
                                                                                          ू
 मनु य असफ़लता से सफ़लता क और िनर तर गित करने लगता है एवं उसे जीवन मे सम त भौितक सुखो क ाि होित
 है । " ी यं " मनु य जीवन म उ प न होने वाली सम या-बाधा एवं नकारा मक उजा को दर कर सकार मक उजा का
                                                                            ू
 िनमाण करने मे समथ है । " ी यं " क                                   े
                                                थापन से घर या यापार क थान पर था पत करने से वा तु दोष य वा तु से
 स ब धत परे शािन मे युनता आित है व सुख-समृ , शांित एवं ऐ य क ि होती है ।

 गु        व कायालय मे " ी यं " 12 ाम से 75 ाम तक क साइज मे उ ल ध है
                                                         मू य:- ित             ाम Rs. 8.20 से Rs.28.00
                                             GURUTVA KARYALAY
                92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                   Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785
                        Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
                                                                       49                                                  ू
                                                                                                                        अ टबर 2010



                                                म हषासुरम दिन तो म ्
||भगवतीप पु पांजिल तो          म हषासुरम दिन तो म ् ||
  ी      पुरसु दय नमः ||
भगवती भगव पदप कजं              मरभूतसुरासुरसे वतम ् | सुजनमानसहं सप र तुतं कमलयाऽमलया िनभृ तं भजे ||१|| ते उभे
अिभव दे ऽहं           ु
                व नेशकलदै वते      |     नरनागानन            वेको     नरिसंह        नमोऽ तुते        ||२||     ह रगु पदप ं         शु प ेऽनुरागा
वगतपरमभागे स नधायादरे ण | तदनुच र करोिम                             ीतये भ                                              े
                                                                               भाजां भगवित पदप े प पु पा जिलं ते ||३|| कनैते
        ु                            े
रिचताः कतो न िन हताः शु भादयो दमदाः कनैते तव पािलता इित ह तत ्
                               ु                                                                      े कमाच महे |           ा ा अ प शं कताः
 व वषये     य याः     सादाविध          ीता    सा     म हषासुर मिथनी                 ादव ािन     मे    ||४||     पातु     ी तु      चतुभु जा       कमु
चतुबाहोमहौजा भुजान ् ध ेऽ ादशधा ह कारणगुणा काय गुणार भकाः | स यं द पितद तसं यभुजभृ छ भुः                                                      व   भूः
 वयं धामैक ितप ये कमथवा पातुं दशा ौ दशः ||५||                           ी याऽ ादशसंिमतेषु युगप                 पेषु दातुं वरान ्    ातुं वा भयतो
बभ ष भगव य ादशैतान ् भुजान ् | य ाऽ ादशधा भुजां तु बभृ तः काली सर व युभे मीिल वैकिमहानयोः                                               थियतुं सा
 वं रमे र माम ् ||६|| अिय िग रनं दिन नं दतमे दिन                          व     वनो दिन नंदनुते िग रवर                 वं य िशरोिधिनवािसिन
व णु वलािसिन        ज णुनुते | भगवित हे िशितक ठकटंु बिन भू र कटंु बिन भू र कृ ते जय जय हे म हषासुरम दिन
                                                ु             ु
र यकप दिन       शैलसुते    ||१||||७||        सुरवरव ष ण        दधरध ष ण
                                                                ु                   दमु खम ष ण
                                                                                     ु                हषरते        भुवनपो ष ण        शंकरतो ष ण
क बषमो ष ण घोषरते | दनुज िनरो ष ण दितसुत रो ष ण दमद शो ष ण िस धुसुते जय जय हे म हषासुरम दिन
                                                 ु
र यकप दिन शैलसुते ||२||||८|| अिय जगदं ब मदं ब कदं ब वन य वािसिन हासरते िशख र िशरोम ण तु ग हमालय
                                     ै          ै
शृ ंग िनजालय म यगते | मधु मधुरे मधु कटभ गं जिन कटभ भं जिन रासरते जय जय हे म हषासुरम दिन
र यकप दिन शैलसुते ||३||||९|| अिय शतख ड वख डत                                  ड वतु डत शु ड गजािधपते रपु गज ग ड वदारण
च ड परा म शु ड मृ गािधपते | िनज भुज द ड िनपाितत ख ड वपाितत मु ड भटािधपते जय जय हे म हषासुरम दिन
र यकप दिन शैलसुते ||४||||१०|| अिय रण दमद श ु वधो दत दधर िनजर श
                                      ु              ु                                                       भृ ते चतुर वचार धुर ण महािशव
दतकृ त
 ू         मथािधपते | द ु रत दर ह दराशय दमित दानवदत कृ तांतमते जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन
                              ु    ु     ु        ू
शैलसुते ||५||||११|| अिय शरणागत वै र वधूवर वीर वराभय दायकरे                                भुवन म तक शूल वरोिध िशरोिध कृ तामल
शूलकरे | दिमदिम तामर दं दिभनाद महो मुखर कृ त ित मकरे जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते
          ु  ु          ु ु
||६||||१२|| अिय िनज हँु कृित मा          िनराकृ त धू         वलोचन धू          शते समर वशो षत शो णत बीज समु व शो णत बीज
लते | िशव िशव शुंभ िनशुंभ महाहव त पत भूत                             पशाचरते जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते
                                    ु            े                                     ु े
||७||||१३|| धनुरनु संग रण णसंग प र फर दं ग नट कटक कनक पशंग पृ ष क िनषंग रस ट शृ ंग हतावटक | कृ त
चतुर ग     बल    ित    र ग     घट हर ग
                                   ु                   ु े
                                                   रट टक      जय       जय      हे     म हषासुरम दिन           र यकप दिन         शैलसुते       ||१४||
सुरललनाततथेियतथेियतथािभनयो रनृ यरते                             हास वलासहलासमिय
                                                                         ु                                   णतातजनेऽिमत ेमभरे                      |
िधिम कटिध कटिधकटिधिम विनघोरमृ दंगिननादरते जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते ||८||||१५||
जय जय ज य जयेजय श द पर तुित त पर व नुते झण झण झ जिम झंकृत नूपुर िसं जत मो हत भूतपते |
न टत नटाध नट नट नायक ना टत ना य सुगानरते जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते ||९||||१६||
अिय सुमनः सुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहर कांितयुते ि त रजनी रजनी रजनी रजनी रजनीकर व                                                     वृ ते | सुनयन
व मर       मर    मर       मर   मरािधपते जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते ||१०||||१७|| स हत महाहव
                                                                      50                                          ू
                                                                                                               अ टबर 2010


म लम त लक म लत र लक म लरते वरिचत व लक प लक म लक झ लक िभ लक वग वृ ते | िसतकृ त
 ु
फ लसमु ल िसता ण त लज प लव स लिलते जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शै लसुते ||११||||१८||
अ वरल ग ड गल मद मेदर म
                   ु                    मत गज राजपते             भुवन भूषण भूत कलािनिध              प पयोिनिध राजसुते | अिय सुद
तीजन लालसमानस मोहन म मथ राजसुते जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते ||१२||||१९|| कमल
दलामल कोमल कांित कलाकिलतामल भाललते सकल                                              े             ु        ु
                                                                    वलास कलािनलय म किल चल कल हंस कले | अिलकल
   ु  ु                 ु     ु
स कल कवलय म डल मौिलिमल कलािल कले जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते ||१३||||२०|| कर
                ू                                                           ु
मुरली रव वी जत क जत ल जत को कल म जुमते िमिलत पुिल द मनोहर गु जत रं जतशैल िनक जगते | िनजगुण
                           े
भूत महाशबर गण स ण संभ ृ त किलतले जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते ||१४||||२१|| क टतट पीत
                ु
 ु ू
दकल      विच     मयूखितर कृ त चं            चे                          ु
                                                    णत सुरासुर मौिलम ण फर दं शुल स नख चं                       चे |   जत कनकाचल
                 ुं  ुं ु
मौिलपदो जत िनभर कजर कभकचे जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते ||१५||||२२||                                                   व जत
सह करै क सह करै क सह करै कनुते कृ त सुरतारक स गरतारक स गरतारक सूनुसुते | सुरथ समािध समानसमािध
समािधसमािध सुजातरते जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते ||१६||||२३|| पदकमलं क णािनलये
व रव यित       योऽनु दनं    स    िशवे    अिय       कमले     कमलािनलये       कमलािनलयः       स       कथं    न   भवेत ् |    तव     पदमेव
                       ं
परं पदिम यनुशीलयतो मम क न िशवे जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते ||१७||||२४|| कनकलस कल
                                          ं      ु  ुं
िस धु जलैरनु िस चनुते गुण र गभुवं भजित स क न शचीकच कभ तट प ररं भ सुखानुभवम ् | तव चरणं शरणं
                                                                                            ु ु
करवा ण नतामरवा ण िनवािस िशवं जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते ||१८||||२५|| तव वमले दकलं
                    ू
वदने दमलं सकलं ननु कलयते कमु पु हत पुर दमुखी सुमुखीिभरसौ वमुखी
      ु                          ू      ु                                                   यते | मम तु मतं िशवनामधने भवती
कृ पया कमुत        यते जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते ||१९||||२६|| अिय मिय द नदयालुतया कृ पयैव
 वया     भ वत यमुमे        अिय      जगतो          जननी     कृ पयािस    यथािस      तथाऽनुिमतािसरते          |   यदिचतम
                                                                                                                 ु          भव युर र
 ु             ु
क ताद ु तापमपाक ते जय जय हे म हषासुरम दिन र यकप दिन शैलसुते ||२०||||२७||                                  तुितिमत तिमतः सुसमािधना
िनयमतोऽयमतोऽनु दनं पठे त ् | परमया रमया प िनषे यते प रजनोऽ रजनोऽ प च तं भजेत ् ||२८|| रमयित                                         कल
कष तेषु िच ं नराणामवरजवर य मा ामकृ णः कवीनाम ् | अकृ त सुकृितग यं र यप ै कह य                                    तवनमवनहे तुं       ीतये
व मातुः ||२९|| इ दर यो मुहु ब दर यो मुहु ब दर यो यतः सोऽनव ः
                  ु            ु            ु                                            मृ तः |      ीपतेः सूनूना का रतो योऽधुना
व मातुः पदे प पु पा जिलः ||३०||
|| इित    ीभगवतीप पु पा जिल तो म ् ||


                                                              ी दगा म
                                                                 ु
 ॐ ऐं    ं लीं चामु डायै व चे ॥
 ॐ ल हंु लीं जूं सः वालय वालय वल वल                          वल        वल ऐं   ं लीं चामु डायै व चे वल हं सं लं       ंफ        वाहा ॥
 नम ते                                    ै
               प यै नम ते मधुम दनी । नमः कटभहा र यै नम ते म हषा दनी ॥1॥
 नम ते शु भह        यै च िनशु भासुरघाितनी । जा तं ह महादे व जपं िस ं कु             व मे ॥2॥
 ऐंकार सृ      पायै ंकार      ितपािलका । लींकार काम प यै बीज पे नमोऽ तु ते ॥3॥
 चामु डा च डघाती च यैकार वरदाियनी । व चे चाभयदा िन यं नम ते म                        पणी ॥4॥
 धां धीं धूं धूज टे ः प ी वां वीं वूं वागधी र ।    ां                                        ु
                                                        ं ूं कािलकादे व शां शीं शूं मे शुभं क ॥5॥
                                                           51                                             ू
                                                                                                       अ टबर 2010



                              तुलसी सेवन करते समय रखे सावधानी

                                                                                                          िचंतन जोशी
                             े
           ह द ू धम म तुलसी क पौधे को प व माना जाता है ।        इसिलए यान रहे क व णु या क आराधना कर धम लाभ
                      े
माना जाता है क जस घर क आंगन म तुलसी का पौधा                     तो पाएं ले कन उसका सेवन सावधानी से कर वा            य लाभ
लगा होता ह उस घर से कलह और द र ता दर होजाते
                                   ू                            भी पाएं।
ह। धम ंथ म तुलसी को ह र         या कहा गया ह। पुराण म
                                                                तुलसी के         कार:
                        े
भी भगवान व णु और तुलसी क ववाह का वणन िमलता ह।
                                                                तुलसी दो तरह क होती है । काली तुलसी व कपूर तुलसी (बेल
           आयुवद शा       े
                         क अनुशार तुलसी को                             तुलसी)
संजीवनी बूट भी कहा जाता है ।        यो क
       े
तुलसी क पौधे म अनेको औषधीय गुण
पाये जाते ह। तुलसी का सेवन कफ                                                                  े
                                                                                   तुलसी सेवन क लाभ
 ारा पैदा होने वाले रोग से बचाने                                                            तुलसी भोजन को शु करने वाला
वाला और शर र क रोग ितरोधक                                                                    माना जाता ह, इसी कारण हण
  मता को बढ़ाने वाला माना गया                                                                       े
                                                                                             लगने क पूव भोजन म डाला
                े
ह। इसिलए तुलसी क प        का सेवन                                                            जाता ह जससे सूय या चं     क
करना लाभकार होता ह।                                                                                        ु
                                                                                             वकृ त करण का क भाव भोजन
      हमारे शा        म तुलसी क प
                               े                                                         पर न पडे ।
            े
का उिचत तर क से सेवन करने का वणन                                                        े
                                                                                  तुलसी क प ो को मृ त य          े
                                                                                                                क मुख म
कया गया ह। जसका पालन न करने पर यह                                                                 े
                                                                           डाला जाता ह, धािमक मत क अनुसार उस य
       े
तुलसी क प े का सेवन हािनकारक भी हो सकते ह।                           को मो        क     ाि   होती ह।
      तुलसी सेवन का शा ो            तर का ह क जब भी                 तुलसी र                 े
                                                                                      क कमी क िलए रामबाण ह। तुलसी के
       े
तुलसी क प े मुंह म रख, उ ह दांत से न चबाकर सीधे ह                    िनयिमत सेवन से ह मो लोबीन तेजी से बढ़ता ह,
िनगल लेने चा हये।                                                    शार र क           ू
                                                                                      फित बनी रहती ह।
                                 े
      इसका व ान कारण ह, क तुलसी क प              म पारा                    े                 ू
                                                                     तुलसी क सेवन से अ थ भंग(टट ह डयां) शी ता
        े
(धातु) क अंश होते ह। जस कारण तुलसी चबाने पर बाहर                     से जुड़ जाती ह।
िनकलकर दांत        क सुर ा परत को नुकसान पहंु चाते ह।
                                                                                े
                                                                     गृ ह िनमाण क समय नींव म घड़े म ह द से रं गे
जससे दं त और मुख रोग होने का खतरा बढ़ जाता है ।
                                                                     कपड़े म तुलसी क जड़ रखने से भवन पर बजली
 यद               े
           तुलसी क प े चबाकर खाने          क आ यािधक                 िगरने का डर नह ं होता।
                          े             ु
आव यकता होतो, तुलसी सेवन क प यात तुरंत क ला
                                                                    तुलसी क सेवा करने वाले             य   को कभी चम
                          े
कर ल। यो क इसका अ ल दांत क एनेमल को खराब कर
                                                                            ं
                                                                     रोग नह , चम रोग ह तो उसम सुधार होता ह।
दे ता ह।
                                                               52                                          ू
                                                                                                        अ टबर 2010


उपयोग म सावधानी बरत-                                                    ी रोग- मािसक धम,          ेत    दर य द मािसक धम
                                                                        ठ क से नह ं आता तो एक लास पानी म तुलसी बीज
      तुलसी क कृ ित गम ह, शर र से गम िनकालने के
                                                                        को उबाले, आधा रह जाए तो इस काढ़े को पी जाएं,
                                 े
       िलये। तुलसी को दह या छाछ क साथ सेवन करने
                                                                        मािसक धम खुलकर होगा।
                      े
       से, उ ण गुण ह क हो जाते ह।
                                                                                 े
                                                                        मािसक धम क दौरान य द कमर म दद भी हो रहा हो
      तुलसी सं या एवं रा ी म नह ं तोड़, एका करने से
                                                                        तो एक च मच तुलसी का रस सेवन कर।
       शर र म वकार उ प न होते ह।              यो क अंधेरे म
       तुलसी से उठने वाली व ुत तरं गे ती          हो जाती ह।           तुलसी का रस 10                 े           े
                                                                                              ाम चावल क उबले पानी क साथ
                                                                        सात दन पीने से दर रोग ठ क होगा। इस दौरान दध
                                                                                                                  ू
             े      े
       तुलसी क सेवन क बाद दध पीने से चम रोग होता ह।
                           ू
                                                                        भात ह सेवन कर।
             े
       तुलसी क साथ दध, नमक, याज, लहसुन,
                    ू
                                                                                         े
                                                                                   तुलसी क बीज पानी म रातभर िभगो द।
       मूली, मांसाहार, ख टे पदाथ           सेवन
                                                                                      सुबह मसलकर छानकर िम ी के
       करना हािनकारक होता ह।
                                                                                              िमलाकर सेवन कर।          दर रोग
             े
       तुलसी क प े दांतो से चबाकर ना
                                                                                               ठ क होता ह।
       खाय, अगर खाय ह तो तुरंत
                                                                                                     े
                                                                                               तुलसी क रस म शहद िमलाकर
        ु
       क लाकर ल। कारण इसका
                                                                                                       ु
                                                                                               िनयिमत कछ दन तक सेवन
                 े
       अ ल दांत क एनेमल को खराब
                                                                                               करने से मरण श       बढ़ती ह।
       कर दे ता है ।
                                                                                                    े
                                                                                              तुलसी क प       का दो तीन
तुलसी सेवन का तर का
                                                                                          च मच रस         ातःकाल खाली पेट
      तुलसी के        ातः खाली पेट सेवन से                                          सेवन करने से मरण श            बढ़ती है ।
       अ यािधक लाभ         ा   होता है ।
                                                                             तुलसी क पसी प य म एक च मच शहद
             े
       तुलसी क प        को या कसी भी अंग को सुखाना हो तो                िमलाकर िन य एक बार सेवन कर ने से शर र
        े
       कवल छाया म सुखाएं। धुप म सुखाने से तुलसी के                      िनरोगी रहता ह, चहरे पर चमक आती ह।पानी म
       गुण म कमी आती ह।                                                        े
                                                                        तुलसी क प े डालकर िभगोकर रखने से एवं यह पानी
             े
       तुलसी क फायदे को दे खते हए एक साथ अिधक मा ा
                                ु                                       का सेवन करने से यह टॉिनक का काम करता ह।
       म सेवन करना हािनकारक होता ह।

अ य लाभ                                                                                   ***
      तुलसी क माला धारण करने वाले                 य     को
       टांिसल म लाभ होता।


नोट: कृ या तु लसी का             योग या सेवन करने पूव यो य जानकार से उिचत परामश अव य                               ा     कर।
उपरो                                        े
         व णत सभी जनकार अनुभव एवं अनुशंधान क आधार पर िलखी गई ह, जनकार                          ारा कये जाने वाले       योग या
उपाय क        ामा णकता एवं लाभ-हानी क ज मेदार कायालय या संपादक क नह ं ह।
                                                        53                                         ू
                                                                                                अ टबर 2010



                                              करवा चौथ त

                                                                                                    िचंतन जोशी
                           े
         काितक मास क चतुथ क दन ववा हत म हलाओं ारा करवा चौथ का त कया जाता है । करवा का अथात िम ट के
जल-पा      क पूजा कर चं मा को अ य दे ने का मह व ह। इसीिलए यह त करवा चौथ नाम से जाना जाता ह। इस दन प ी
                   े
अपने पित क द घायु क िलये मंगलकामना और                े                                           े
                                                वयं क अखंड सौभा य रहने क कामना करती ह। करवा चौथ क पूरे
दन प ी      ारा उपवास रखा जाता ह। इस दन रा      को जब आकाश म चं य उदय से पूव सोलह सृ ंगार कर चं              िनकलने
क     ित ा करती ह।                                      े                                   े         े
                         त का समापन चं मा को अ य दे ने क साथ ह उसे छलनी से दे खा जाता ह, उसक बाद पित क चरण
 पश कर उनसे आशीवाद ा करती ह। ऐसी मा यता है क इस त को करने से म हलाएं अखंड सौभा यवती होती ह, उसका
पित द घायु होता ह।

         य द इस                                        े                             े
                     त को पालन करने वाली प ी अपने पित क ित मयादा से, वन ता से, समपण क भाव से रहे और
पित भी अपने सम त कत य एवं धम का पालन सुचा                प से पालन कर, तो एसे दं प             े
                                                                                              क जीवन म सभी सुख-
समृ      से भरा जाता ह।



                                                                          े       े
कथा : एसी मा यता ह, क भगवान ीकृ ण ने ोपद को यह त का मह व बताया था। पांडव क वनवास क दौरान अजु न
         े                                           े
तप करने क िलए इं नील पवत पर चले गए। बहत दन बीत जाने क बाद भी जब अजु न नह ं लौटे तो ोपद को िचंता होने लगी।
                                      ु
जब    ीकृ ण ने ोपद को िचंितत दे खा तो फौरन िचंता का कारण समझ गए। फर भी                  ीकृ ण ने ोपद से कारण पूछा तो
उसने यह िचंता का कारण               े
                             ीकृ ण क सामने   कट कर दया। तब           ीकृ ण ने ोपद को करवाचौथ       त करने का वधान
बताया।     ोपद ने     ीकृ ण से   त का विध- वधान जान कर       त कय और उसे                                   ु
                                                                                     त का फल िमला, अजु न सकशल पवत
पर तप या पूर कर शी        लौट आए।


                     े
पूजन- विध: करवा चौथ क दन              मुहू त म उठ कर    नान के      व छ कपडे पहन कर करवा क पूजा-आराधना कर
   े
उसक साथ िशव-पावती क पूजा का वधान ह।                                             े
                                               यो क माता पावती न क ठन तप या कर क िशवजी को ा कर अखंड
सौभा य ा      कया था। इस िलये िशव-पावती क पूजा क जाती ह।


          े
करवा चौथ क दन चं मा क पूजा का धािमक और योितष दोन ह                  से मह व है ।

               े
छांदो य उपिनष क अनुशार जो चं मा म पु ष पी                                 े
                                                  ा क उपासना करता है , उसक सारे पाप न हो जाते ह, उसे जीवन म
कसी कार का क नह ं होता। उसे लंबी और पूण आयु क          ाि होती ह।

 योितष       से चं मा मन का कारक दे वता ह। अतः चं मा चं मा क पूजा करने से मन क चंचलता पर िनयं त रहता ह।

       े
चं मा क शुभ होने पर से मन स नता रहता ह और मन से अशु                 वचार दर होकर मन म शुभ वचार उ प न होते ह।
                                                                          ू

 यो क शुभ वचार ह मनु य को अ छे कम करने हे तु       े रत करते ह।        वयं के      ारा कये गई गलती या एवं अपने दोष
                                  े                े
का मरण कर पित, सास-ससुर और बुजुग क चरण पश इसी भाव क साथ कर क इस साल ये गलितयां फर नह ं ह ।
                                                        54                                   ू
                                                                                          अ टबर 2010



                                    ू
                                 अ टबर 2010 मािसक पंचांग
                                                                                                चं
द माह     प      ितिथ     समाि       न           समाि        योग     समाि       करण    समाि                समाि
                                                                                                रािश

1   आ   न कृ ण   अ मी     20:48:35 आ ा           20:12:57 व रयान     13:08:16 बालव     09:22:20 िमथुन

2   आ   न कृ ण   नवमी     19:10:40 पुनवसु        19:20:02 प र ह      10:53:47 तैितल    08:04:06 िमथुन 13:37:00

3   आ   न कृ ण   दशमी     16:57:08 पु य          17:49:38 िशव        08:08:23   व ी    16:57:08 कक

4   आ   न कृ ण   एकादशी   14:10:48 अ ेषा         15:47:22 सा य       25:18:18 बालव     14:10:48 कक         15:47:00

                  ादशी-   10:58:13 मघा           13:19:47 शुभ        21:23:32 तैितल    10:58:13 िसंह
5   आ   न कृ ण
                  योदशी

6   आ   न कृ ण   चतुदशी   07:27:49 पूवाफा गुनी   10:35:19 शु ल       17:16:34 व णज     07:27:49 िसंह       15:52:00

7   आ   न कृ ण   अमाव या 24:14:19 उ राफा गुनी 07:43:22               13:08:41 चतु पाद 14:01:11 क या

8   आ   न शु ल एकम        20:54:14 िच ा          26:27:59 इ          09:06:26   क तु न 10:31:44 क या 15:40:00

9   आ   न शु ल    तीया    17:57:37   वाती        24:26:41       ुं
                                                             वषकभ    25:57:37 बालव     07:21:59 तुला

10 आ    न शु ल तृतीया     15:37:34   वशाखा       23:03:49     ीित    23:07:34 गर       15:37:34 तुला       17:21:00

11 आ    न शु ल चतुथ       14:00:38 अनुराधा       22:25:57 आयु मान 20:54:04      व ी    14:00:38 वृ     क

12 आ    न शु ल पंचमी      13:13:24 जे ा          22:38:43 सौभा य     19:19:58 बालव     13:13:24 वृ     क 22:38:00

13 आ    न शु ल ष ी        13:18:40 मूल           23:41:10 सोभन       18:28:03 तैितल    13:18:40 धनु

14 आ    न शु ल स मी       14:13:38 पूवाषाढ़       25:29:34 अितगंड     18:12:42 व णज     14:13:38 धनु

15 आ    न शु ल अ मी       15:50:48 उ राषाढ़       27:54:33 सुकमा      18:29:14 बव       15:50:48 धनु        08:02:00

16 आ    न शु ल नवमी       18:00:46       वण      30:43:54 धृ ित      19:07:20 कौलव     18:00:46 मकर

17 आ    न शु ल दशमी       20:28:34       वण      06:43:34 शूल        20:00:26 तैितल    07:13:34 मकर        20:13:00

18 आ    न शु ल एकादशी     23:02:00 धिन ा         09:45:07 गंड        20:57:18 व णज               ुं
                                                                                       09:46:03 कभ

19 आ    न शु ल    ादशी    25:29:48 शतिभषा        12:44:48 वृ         21:49:29 बव                 ुं
                                                                                       12:16:41 कभ

20 आ    न शु ल    योदशी   27:42:37 पूवाभा पद     15:34:11      ुव    22:32:18 कौलव     14:37:56 कभ
                                                                                                 ुं        08:54:00

21 आ    न शु ल चतुदशी     29:35:45 उ राभा पद     18:07:38    याघात   23:00:08 गर       16:42:19 मीन

22 आ    न शु ल पू णमा     31:06:24 रे वित        20:20:27 हषण        23:11:05   व ी    18:24:12 मीन        20:21:00
                                                                 55                                      ू
                                                                                                      अ टबर 2010



23 आ    न शु ल पू णमा        07:07:02 अ      नी             22:11:44 व          23:06:06 बव        07:07:02 मेष

24 काितक कृ ण    एकम         08:16:08 भरणी                  23:41:27 िस         22:44:16 कौलव      08:16:08 मेष     30:00:00

25 काितक कृ ण      तीया      09:02:44 कृ ितका               24:49:37   यितपात 22:03:40 गर          09:02:44 वृष

26 काितक कृ ण    तृतीया      09:25:54 रो ह ण                25:35:17 व रयान     21:06:13   व ी     09:25:54 वृष

27 काितक कृ ण    चतुथ        09:27:31 मृगिशरा               25:58:27 प र ह      19:50:01 बालव      09:27:31 वृष     13:50:00

                 पंचमी-      09:05:42 आ ा                   25:57:16 िशव        18:15:05 तैितल     09:05:42 िमथुन
28 काितक कृ ण
                 ष ी

29 काितक कृ ण    स मी        08:17:39 पुनवसु                25:30:46 िस         16:20:27 व णज      08:17:39 िमथुन 19:40:00

30 काितक कृ ण    अ मी        07:04:17 पु य                  24:38:02 सा य       14:03:21 बव        07:04:17 कक

31 काितक कृ ण    नवमी        27:15:18 अ ेषा                 23:19:03 शुभ        11:24:41 तैितल     16:21:52 कक



                                          मं           िस       प ना गणेश
                       भगवान    ी गणेश बु                  े
                                                  और िश ा क कारक                    े
                                                                             ह बुध क अिधपित दे वता ह। प ना गणेश बुध के
                       सकारा मक    भाव को बठाता ह एवं नकारा मक                भाव को कम करता ह।. प न गणेश के          भाव से
                        यापार और धन म वृ          म वृ       होती ह। ब चो क पढाई हे तु भी वशेष फल        द ह प ना गणेश इस
                       के   भाव से ब चे क बु             ू
                                                        कशा              े
                                                                 होकर उसक आ म व ास म भी वशेष वृ            होती ह। मानिसक
                       अशांित को कम करने म मदद करता ह, य                    ारा अवशो षत हर व करण शांती   दान करती ह, य
                        े       े                           े
                       क शार र क तं को िनयं त करती ह। जगर, फफड़े , जीभ, म त क और तं का तं इ या द रोग म
                                                      े
                       सहायक होते ह। क मती प थर मरगज क बने होते ह।

                                                                                                 Rs.550 से Rs.8200 तक


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                                                                                            अ टबर 2010



                         ू
                      अ टबर -2010 मािसक त-पव- यौहार
द    माह       प      ितिथ      समाि        मुख योहार

1    आ     न   कृ ण   अ मी      20:48:35   अ मी        ा , काला मी,जी व पु का त,

2    आ     न   कृ ण   नवमी      19:10:40   मातृनवमी ा , सुहािगन का ा ,

3    आ     न   कृ ण   दशमी      16:57:08   दशमी,

4    आ     न   कृ ण   एकादशी    14:10:48   एकादशी       ा , इं दरा एकादशी त, ादशी ा

                       ादशी-    10:58:13
5    आ     न   कृ ण                         योदशी ा , भौम        दोष त (ऋणमोचन हे तु उ म)
                       योदशी

                                07:27:49   चतुदशी       ा , दमरण ा - अथात: श , वष, अ न, जल, दघ टना से मृत
                                                             ु                               ु
6    आ     न   कृ ण   चतुदशी
                                           का ा , मािसक िशवरा        त

                                24:14:19   पतृ वसजनी अमावस अ ात मरणितिथवाल का ा , नान-दान- ा
7    आ     न   कृ ण   अमाव या
                                           क अमाव या,

                                20:54:14   शारद य नवरा        ारं भ, थम नवरा , बैठक , कलश (घट) थापना
8    आ     न   शु ल   एकम
                                           म या कालीन अिभ जत ् मुहू म शुभ,

9    आ     न   शु ल     तीया    17:57:37     तीय नवरा , नवीन च       -दशन

10   आ     न   शु ल   तृतीया    15:37:34   तृतीय नवरा , िस दर तृतीया
                                                            ू

                                14:00:38   चतुथ नवरा , चतुथ       त वरद वनायक चतुथ         त, रथो सव चतुथ , (चं
11   आ     न   शु ल   चतुथ
                                           .रा.8.48)

12   आ     न   शु ल   पंचमी     13:13:24                                          ु
                                           पंचम नवरा , उपांग लिलता पंचमी त, क द (कमार) ष ी त,

13   आ     न   शु ल   ष ी       13:18:40   छठा नवरा , माँ सर वती आ ान, गजगौर          त,

14   आ     न   शु ल   स मी      14:13:38   स म नवरा , महा मी, महािनशा पूजा

15   आ     न   शु ल   अ मी      15:50:48   अ म नवरा , दगा अ मी त, महा मी त, अ नपूणा मी त
                                                       ु

16   आ     न   शु ल   नवमी      18:00:46   नवम नवरा , महानवमी, दगा नवमी, सर वती वसजन
                                                                ु

17   आ     न   शु ल   दशमी      20:28:34   वजया दशमी, दशहरा

18   आ     न   शु ल   एकादशी    23:02:00       ुं
                                           पापकशा एकादशी, भरत िमलाप

19   आ     न   शु ल    ादशी     25:29:48   प नाभ ादशी, सौर मास काितक ारं भ

20   आ     न   शु ल    योदशी    27:42:37    दोष त
                                                           57                                       ू
                                                                                                 अ टबर 2010



 21       आ      न   शु ल      चतुदशी    29:35:45   वाराह चतुदशी,

                                         31:06:24   शरद पू णमा, व ासागर ज म., कोजािगर ल मी पूजा, महारास पू णमा,
 22       आ      न   शु ल      पू णमा
                                                    वा मी क जयंती,

 23       आ      न   शु ल      पू णमा    07:07:02    नान-दान हे तु उ म आ       नीपू णमा, हे म त ऋतु ारं भ, काितक नान

 24       काितक      कृ ण      एकम       08:16:08   प व काितक मास ारं भ, अशू य शयन त

 25       काितक      कृ ण        तीया    09:02:44

                                         09:25:54   संक ी गणेश चतुथ , करवाचौथ, अंगारक चतुथ , कृ ण पंगा     चतुथ ,
 26       काितक      कृ ण      तृतीया
                                                    (चं ो. रा    7.56)

 27       काितक      कृ ण      चतुथ      09:27:31   दशरथ चतुथ

 28       काितक      कृ ण      पंचमी-ष ी 09:05:42   को कला पंचमी

 29       काितक      कृ ण      स मी      08:17:39

 30       काितक      कृ ण      अ मी      07:04:17     ी राधा अ मी, पु य न     , काला मी त, अहोई अ मी, दा प या मी,

 31       काितक      कृ ण      नवमी      27:15:18   सरदार व लभ भाई पटे ल जयंती,




                                            मं िस मूंगा गणेश
                        मूंगा गणेश को व ने र और िस                     े
                                                                वनायक क प म जाना जाता ह। इस िलये मूंगा गणेश पूजन
                         े
                        क िलए अ यंत लाभकार ह। गणेश जो व न नाश एवं शी फल क ाि हे तु वशेष लाभदायी ह।
                        मूंगा गणेश घर एवं यवसाय म पूजन हे तु था पत करने से गणेशजी का आशीवाद शी               ा होता ह।
                            यो क लाल रं ग और लाल मूंगे को प व माना गया ह। लाल मूंगा शार रक और
                        मानिसक श        य का वकास करने हे तु वशेष सहायक ह।           हं सक वृ    और गु से को िनयं त
                        करने हे तु भी मूंगा गणेश क पूजा लाभ द ह। एसी लोकमा यता ह क मंगल गणेश को था पत
                        करने से भगवान गणेश क कृ पा श              चोर , लूट, आग, अक मात से वशेष सुर ा        ा   होती ह,
                            ज से घर म या दकान म उ नती एवं सुर ा हे तु मूंगा गणेश था पत कया जासकता ह।
                                          ु
                            ाण ित त मूंगा गणेश क थापना से भा योदय, शर र म खून क कमी, गभपात से बचाव, बुखार,
चेचक, पागलपन, सूजन और घाव, यौन श                                  े
                                           म वृ , श ु वजय, तं मं क द ु          भा, भूत- ेत भय, वाहन दघटनाओं, हमला,
                                                                                                      ु
                                              ुं
चोर, तूफान, आग, बजली से बचाव होता ह। एवं ज म कडली म मंगल                    े
                                                                         ह क पी ड़त होने पर िमलने वाले हािनकर भाव से
मु    िमलती ह।
जो य     उपरो                          े
                 लाभ ा करना चाहते ह उनक िलये मं िस मूंगा गणेश अ यिधक फायदे मंद ह।
                                                                      े
मूंगा गणेश क िनयिमत प से पूजा करने से यह अ यिधक भावशाली होता ह एवं इसक शुभ भाव से सुख सौभा य क ाि
होकर जीवन क सारे संकटो का वतः िनवारण होजाता ह।
           े                                                                              Rs.550 से Rs.8200 तक
                                                       58                                    ू
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        ू
     अ टबर           २०१० वशेष योग
     काय िस       योग
         दनांक          योग अविध                         अमृ त योग
     3                  सूय दय से सं या 5:48 तक             दनांक        योग अविध
     9                  सूय दय से रा   12:26 तक          22              सूय दय से रा   8:19 तक
     11                 सूय दय से रा   10:25 तक          र व-पु यामृ त योग
     16                 स पूण दन-रात                     3               सूय दय से सं या 5:48 तक
     21                 सं या 6:07 से रातभर                  पु कर योग
     22                 स पूण दन-रात                        दनांक        योग अविध
     27                 सूय दय से रा   1:57 तक           19/20           म यरा    12:44 से 1:28 तक
     29/30              29 रात 1:30 से 30 रात तक         24              रा   11:40 से रातभर
                        12:38


     सवदोषनाशक र व योग
      दनांक             योग अविध
     9                  रा                  ू
                             12:26 से 10 अ टबर को रा     11:03 तक
     10                 रा                  ू
                             11:52 से 11 अ टबर को रा     10:25 तक
     12                 रा                  ू
                             10:37 से 13 अ टबर को रा     11:40 तक
     15/16              रा                 ू
                             3:53 से 18 अ टबर को ात: 9:43 तक
     20                                     ू
                        दोपहर 3:34 से 21 अ टबर को सं या 6:07 तक
     28/29              रा                    ू
                             1:56 से 29/30 अ टबर को रा       1:30 तक


योग फल :
काय िस     योग मे कये गये शुभ काय मे िन       त सफलता ा होती ह, एसा शा ो                वचन ह।
अमृ त योग म कये गये काय म शुभ फल क ाि होती ह। एसा शा ो
 पु कर योग म कये गये शुभ काय का लाभ दोगुना होता ह। एसा शा ो                   वचन ह।
 पु कर योग म कये गये शुभ काय का लाभ तीन गुना होता ह। एसा शा ो                    वचन ह।
                                                              59                                             ू
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                                             ह चलन अ टबर-2010
द    Sun        Mon       Ma       Me         Jup       Ven          Sat       Rah       Ket      Ua         Nep     Plu
1    13:42      11:41     16:51    01:20      03:07     18:14        13:43     13:12     13:12    04:13      02:16   08:51
2    14:41      25:18     17:32    03:06      02:59     18:28        13:51     13:11     13:11    04:11      02:15   08:51
3    15:40      09:19     18:13    04:52      02:51     18:41        13:58     13:10     13:10    04:08      02:14   08:52
4    16:39      23:43     18:54    06:39      02:44     18:52        14:05     13:07     13:07    04:06      02:13   08:52
5    17:38      08:28     19:36    08:26      02:36     19:00        14:13     13:01     13:01    04:04      02:11   08:53
6    18:37      23:28     20:17    10:13      02:29     19:07        14:20     12:52     12:52    04:01      02:10   08:54
7    19:36      08:35     20:59    12:00      02:22     19:11        14:28     12:41     12:41    03:59      02:09   08:54
8    20:35      23:40     21:41    13:47      02:14     19:13        14:35     12:30     12:30    03:57      02:09   08:55
9    21:35      08:31     22:22    15:34      02:07     19:12        14:42     12:19     12:19    03:54      02:08   08:56
10   22:34      23:01     23:04    17:20      02:00     19:09        14:50     12:10     12:10    03:52      02:07   08:57
11   23:33      07:03     23:46    19:06      01:53     19:04        14:57     12:03     12:03    03:50      02:06   08:57
12   24:33      20:36     24:28    20:51      01:46     18:56        15:04     11:59     11:59    03:48      02:05   08:58
13   25:32      03:41     25:10    22:36      01:40     18:46        15:12     11:58     11:58    03:46      02:04   08:59
14   26:31      16:22     25:52    24:20      01:33     18:34        15:19     11:58     11:58    03:43      02:03   09:00
15   27:31      28:42     26:34    26:03      01:27     18:19        15:26     11:58     11:58    03:41      02:03   09:01
16   28:30      10:48     27:16    27:46      01:20     18:02        15:34     11:57     11:57    03:39      02:02   09:02
17   29:30      22:43     27:58    29:28      01:14     17:42        15:41     11:55     11:55    03:37      02:01   09:03
18   00:29      04:34     28:40    01:09      01:08     17:20        15:48     11:50     11:50    03:35      02:00   09:04
19   01:29      16:25     29:23    02:50      01:02     16:56        15:55     11:42     11:42    03:33      02:00   09:05
20   02:29      28:18     00:05    04:30      00:56     16:30        16:03     11:32     11:32    03:31      01:59   09:06
21   03:28      10:18     00:48    06:10      00:51     16:02        16:10     11:20     11:20    03:29      01:59   09:07
22   04:28      22:25     01:30    07:49      00:45     15:33        16:17     11:07     11:07    03:27      01:58   09:08
23   05:27      04:42     02:13    09:27      00:40     15:01        16:24     10:55     10:55    03:25      01:58   09:09
24   06:27      17:08     02:55    11:05      00:35     14:29        16:31     10:44     10:44    03:23      01:57   09:11
25   07:27      29:44     03:38    12:42      00:30     13:55        16:38     10:35     10:35    03:21      01:57   09:12
26   08:27      12:30     04:21    14:18      00:25     13:20        16:45     10:29     10:29    03:19      01:56   09:13
27   09:27      25:27     05:04    15:54      00:21     12:44        16:53     10:25     10:25    03:18      01:56   09:14
28   10:26      08:36     05:47    17:30      00:16     12:08        17:00     10:24     10:24    03:16      01:55   09:16
29   11:26      21:59     06:30    19:05      00:12     11:31        17:07     10:25     10:25    03:14      01:55   09:17
30   12:26      05:37     07:13    20:39      00:08     10:54        17:13     10:25     10:25    03:12      01:55   09:18
31   13:26      19:30     07:56    22:13      00:04     10:18        17:20     10:25     10:25    03:11      01:54   09:20



                                            नवर          ज ड़त                ी यं
शा          े
       वचन क अनुसार शु         सुवण या रजत म िनिमत              ी यं      े
                                                                         क चार और य द नवर             जड़वा ने पर यह नवर
ज ड़त     ी यं                            े
                 कहलाता ह। सभी र ो को उसक िन                  त                      े
                                                                     थान पर जड़ कर लॉकट के              प म धारण करने से
 य     को अनंत ए य एवं ल मी क                ाि     होती ह। य                                              े
                                                                       को एसा आभास होता ह जैसे मां ल मी उसक साथ
ह। नव ह को         ी यं    े
                          क साथ लगाने से           ह क अशुभ दशा का धारण करने वाले                 य     पर    भाव नह ं होता
               े
ह। गले म होने क कारण यं           पव       रहता ह एवं       नान करते समय इस यं            पर     पश कर जो जल बंदु शर र
                       े
को लगते ह, वह गंगा जल क समान प व                   होता ह। इस िलये इसे सबसे तेज वी एवं फलदािय कहजाता ह। जैसे
                         ं
अमृ त से उ म कोई औषिध नह , उसी                    कार ल मी    ाि     क िलये
                                                                      े         ी यं   से उ म कोई यं         संसार म नह ं ह
एसा शा ो        वचन ह। इस              े
                                  कार क नवर          ज ड़त     ी यं      गु    व कायालय     ारा शुभ मुहू त म     ाण   ित त
   े
करक बनावाए जाते ह।
                                                               60                                                   ू
                                                                                                                 अ टबर 2010



                                             मािसक रािश फल
                                                                                                                     िचंतन जोशी
मेष : काय म संतोष द साधारण सफलता               ा       होगी।           े
                                                                    आपक काय म                  व न बाधा उ प न होती हई
                                                                                                                    ु                 ितत
आिथक मामले म पीछले माह              क तुलना म सुधार                                 े
                                                                    होगी जस कारण आपक उ साह म कमी हो सकती ह।
होगा। आपक बकाया धन             ाि   म वलंब होगा। लेन-               कानूिन     ववादो से बच रह।                   यापार-नौकर      म भी
दे न म अित र       सावधानी बत। पा रवा रक सुख म वृ                   सावधान रह नुकशान हो सकता ह।
होगी।    यापार-नौकर       े
                         क काय      म शुभ अवसर            ा
ह गे। काय आपके           अनुकल ह गे।
                             ू           फरभी मानिसक                िसंह : आिथक                थती म सुधार होगा। पा रवा रक सुख

परे शािनयाँ, िचंता रह सकती ह। इसली ये मनको शांत                     म वृ       होगी,          जससे आप अिधक समय                 स नता

रखने का        यास कर।                                              अनुभव करगे। कामकाज म                       य तता रहे गी।     यापार-
                                                                    नौकर म वृ                 एवं पदोऊ नित हो सकती ह। आपके
वृ ष : आिथक        थती म पूव क अपे ा सुधार होगा।                    उ साह म वृ                 होगी। उधार       दया हवा पैसे
                                                                                                                     ु           ा      हो
ल ब समय से          े ु
                   क हएं मह व पूण काय म सफलता            ा          सकते ह। आक मक धन                      ाि     े
                                                                                                                क अवसर िमलगेभूिम-
होगी।    श ु एवं वरोिध प        पर आपका     भाव रहगा।                               े
                                                                    भवन-वाहना खर द क योग बन रह है । घर-प रवार म
पा रवार म उ साह का माहोल रहगा। यापार-नौकर म                          स नता रहे गी।            वा    य उ म रहगा।
              े
 गित होगी, आपक उ साह म वृ                होगी, नौकर म
पदौ नित होगी। िम -प रवार वग से मान-स मान क                          क या : कायकार                  य तता एवं भागदौड़ रहगी। नय-

 ाि     होगी। श ु एवं वरोधी प        पर वजय        ा     कर         नय अनुभव             ा     होग। दसर क अनु प काय करने क
                                                                                                     ू   े

सकते ह।                                                             उपे ा अपने                    े
                                                                                             वयं क िनणयो पर काये करने से लाभ
                                                                     ा     होग। ज दबाजी म िनणय लेने से बच अ छतरह
िमथुन : पूव      क तरह मानिसक अशांित बनी रहे गी।                    सोच समझ कर काय करने का                        यास कर लाभ           ा
आ म व ास क कमी रहे गी, असंतोष एवं               े
                                            ोध क कारण               होगा। काय म समझौतावाद                       कोण रख, संभव होतो
छोट -छोट बात म िचड़ जाने वाला           वाभाव रहगा। अतः                                       े
                                                                    ववा दत काय को टाल दना आपक िलये उपयु                              होगा।
मन को संयिमत रखे। आपसी वाद- ववाद करने से बच।                        ह। सावधानी बत िगरवी रखकर कज लेना पड सकता
श ु और वरोिध प           से परे शानी होसकती ह, सावधान               ह। मानिसक अशांित होगी। सावधान रह।
सह।        यापार-नौकर      म   त काल     िनणय लेने से
सम याओं से मु            िमलेगी। िम -पा रवार का पूण                 तुला :     वा        य का वशेष यान रख। पुरानी दद, बीमार

सहयोग      ा    होगा।                                                                                       े
                                                                    से परे शानी संभव ह। तनाव से बचे। काय आपक अनु प
                                                                    नह ं ह गे, थोडे से मानिसक और शार रक प र म से
कक : पूव         क अपे ा समय थोडा            ू
                                          ितकल रहगा।                     थती म सुधार हो सकता ह। कज लेना पड सकता ह।
कामकाज म                          े
                 य तता रहे गी। जसक कारण मानिसक                      श ु    प        से       परे शानी   होसकती     ह,   सावधान        सह।
                े
अशांित होगी। जसक फल            व प िचड़िचड़ापन रहे गा।                 यापार-नौकर               े
                                                                                             क काय      म अ थरता रहे सकती ह।
 यापार-नौकर        े
                  क काय     म अ थरता रहे सकती ह।                     यापार-नौकर म भी सावधान रह नुकशान हो सकता
                                                                         61                                                   ू
                                                                                                                           अ टबर 2010


ह। प रवार म अशांित का माहोल रहगा। शांित कायम                                  सफलता           ा    होगी। आिथक मामलो म सुधार होगा।
करने का      यास कर।                                                          पुराना भुगतान             ा                         े
                                                                                                             हो सकता ह। कोट-कचहर क ववाद
                                                                              सुलझगे। कायकार                     य तता एवं भागदौड़ बनी रहगी
वृ   क : आक मक धन                        ाि      े
                                                क अवसर िमलगे।                 एतः   वा        य का वशेष यान रख।
आिथक         थती म सुधार होगा।                 यास प र म से नये
काय से लाभ         ा       कर सकते ह। पा रवा रक छोटे -छोटे                     ुं
                                                                              कभ : आ म व ास एवं उ साह म वृ                        होगी। श ु एवं
ववाद-मतभेद को मौका िमलते                      ह सुधार ले अ यथा                  वरोिध प           से वाव- ववाद म उलझने से बच। काय म
परे शानी बढसकती ह।                 वा    य का वशेष        यान रख।             सफलता       ा        होगी। अ प           यास एवं प र म से अिधक
                         े
ववा दत काय को टाल दना आपक िलये उपयु                            होगा।          लाभ     ा           होगाह। आिथक             थती म सुधार होगा।
पूंजी िनवेश और बड़ खर द- ब                     इ या द से बच।                     यापार-नौकर                         े
                                                                                                       म पदोउ नित क अवसर              ा    ह गे।
                                                                              पूरान वाद- ववाद सुलझगे। िम                  एवं पा रवा रक का सुख
         े
धनु : आपक सोचे हवे
                ु                 ायः सभी काय म सफलता            ा            सामा य रह गा।                 वा    य उ म रहगा।
ह गी।   आिथक               थती     म    सुधार होगा।       िम     एवं
पा रवा रक सहयोग से लाभ                   ा              े
                                               होगा। आपक मान-                 मीन : लंबे समय से चली आरह ं सम यां से राहत                      ा
स मान- ित ा            म     वृ     होगी।       यापा रक    योजनाएं            होगी। आिथक                थती मजबूत होगी। काय म सफलता
सफल होगी। यापार-नौकर म वृ                       एवं पदोऊ नित हो                 ा    होगी              जससे        आपका     आ म व ास      बढ़े गा।
                  े
सकती ह। भूिम-भवन क मामलो म शुभ समाचार                            ा                                               े
                                                                              पा रवा रक मतभेद दर ह गे और प रवार क सहयोग से
                                                                                               ू
होगा।   वा    य उ म रहगा।                                                       वशेष लाभ           ा        होग। नये                  े
                                                                                                                          यापार-नौकर क अवसर
                                                                                ा   ह गे।              का हवा धन से
                                                                                                           ु                 ा   हो सकता ह।
मकर :        यापार-नौकर             े
                                   क काय         म    सुधार होगा।             आक मक धन                      ाि      े               े
                                                                                                                   क अवसर िमलगे। मौक का
आ म व ास एवं उ साह म वृ                        होगी। प रवार वालो              फायदा उठाये।             वा        य उ म रहगा।
का सहयोग       ा       होगा। आिथक              थती म सुधार होगा।
घर प रवार म सुख साधनो म वृ                            होगी। काय म                                                 ***
                            दै िनक शुभ एवं अशुभ समय                                 ान तािलका
                                          गुिलक काल                  यम काल                        राहु काल
                                              (शुभ)                    (अशुभ)                      (अशुभ)
                       वार               समय अविध                 समय अविध                        समय अविध
                       र ववार           03:00 से 04:30          12:00 से 01:30            04:30 से 06:00
                       सोमवार           01:30 से 03:00          10:30 से 12:00            07:30 से 09:00
                       मंगलवार          12:00 से 01:30          09:00 से 10:30            03:00 से 04:30
                       बुधवार           10:30 से 12:00          07:30 से 09:00            12:00 से 01:30
                       गु वार           09:00 से 10:30          06:00 से 07:30            01:30 से 03:00
                       शु वार           07:30 से 09:00         03:00 से 04:30             10:30 से 12:00
                       शिनवार           06:00 से 07:30         01:30 से 03:00             09:00 से 10:30
                                      62                                   ू
                                                                        अ टबर 2010


                                        े
                                    दन क चौघ डये
 समय              र ववार   सोमवार     मंगलवार बुधवार गु वार    शु वार    शिनवार
 06.00 से 07.30   उ ेग     अमृ त      रोग      लाभ     शुभ     चल        काल
 07.30 से 09.00   चल       काल        उ ेग     अमृ त   रोग     लाभ       शुभ
 09.00 से 10.30   लाभ      शुभ        चल       काल     उ ेग    अमृ त     रोग
 10.30 से 12.00   अमृ त    रोग        लाभ      शुभ     चल      काल       उ ेग
 12.00 से 01.30   काल      उ ेग       अमृ त    रोग     लाभ     शुभ       चल
 01.30 से 03.00   शुभ      चल         काल      उ ेग    अमृ त   रोग       लाभ
 03.00 से 04.30   रोग      लाभ        शुभ      चल      काल     उ ेग      अमृ त
 04.30 से 06.00   उ ेग     अमृ त      रोग      लाभ     शुभ     चल        काल



                                        े
                                   रात क चौघ डये
 समय              र ववार   सोमवार     मंगलवार बुधवार गु वार    शु वार    शिनवार
 06.00 से 07.30   शुभ      चल         काल      उ ेग    अमृ त   रोग       लाभ
 07.30 से 09.00   अमृ त    रोग        लाभ      शुभ     चल      काल       उ ेग
 09.00 से 10.30   चल       काल        उ ेग     अमृ त   रोग     लाभ       शुभ
 10.30 से 12.00   रोग      लाभ        शुभ      चल      काल     उ ेग      अमृ त
 12.00 से 01.30   काल      उ ेग       अमृ त    रोग     लाभ     शुभ       चल
 01.30 से 03.00   लाभ      शुभ        चल       काल     उ ेग    अमृ त     रोग
 03.00 से 04.30   उ ेग     अमृ त      रोग      लाभ     शुभ     चल        काल
 04.30 से 06.00   शुभ      चल         काल      उ ेग    अमृ त   रोग       लाभ


             े
   * हर काय क िलये शुभ/अमृ त/लाभ का चौघ ड़या उ म माना जाता ह।
          े
* हर काय क िलये चल/काल/रोग/उ े ग का चौघ ड़या उिचत नह ं माना जाता।
                                                        63                                       ू
                                                                                              अ टबर 2010



                                                वा तु परामश
         गु   व               े       े
                  योितष प का क पाठको क सुझाव एवं अनुरोध पर गु            व कायालय     ारा नव बर-2010 से वा तु से
संबंिधत िनःशु क सेवा       ारं भ क जारह ह।

        य द आपका घर, दकान, कायालय, उ ोग इ या द
                       ु                                थान य द वा तु दोष यु     ह,

        आप शार रक, मानिसक एवं आिथक सम याओं से परे शान ह।

        आपको उिचत महे नत करने पर भी उिचत फल क               ाि   नह ं हो रह
         हो, आप बार-बार लाभ के       थान पर हानीं उठा रह हो,      तो संभ वत
         आपका भवन वा तु दोष से यु         ह।

                   े                   े        े
         वा तु दोष क बार मे जानने और उसक समाधान क िलये गु                  व
                      े                   ु
          योितष प का क मा यम से आप हमारे कशल एवं अनुभवी वा तु
          वशेष    से िनःशु क परामश    ा    कर सकते ह।

        िनिमत भवन क                                        े    ू
                             थित उसक बाहर एवं भीतर सजावट आपक अनुकल ह या नह ं। जससे आप भवन म
                             े              े   े         े
          बना तोड-फोड कये इनक सरल उपायो से कवल फर-बदल कर क वशेष लाभ                       ा   कर सकते ह। वा तु
         परामश हे तु फाम भर।


नोट: जो       य   ई मेल से िनजी   प म परामश     ा   करना चाहते ह वह कृ या हमार भुगतान परामश सेवा का लाभ
उठाने का क        कर। गु   व कायालय म फोन से संपक करने पर आपको ई मेल से िनजी              प म परामश     ा   होगा।
                       े
अ यथा आपको परामश प का क मा यम से ह                  ा   होगा। कृ या य द आप कसी सम या से            त हो, तो इस
                                          े                         े
िनःशु क परामश सेवा का लाभ उठाये। नये भवन क िनमाण एवं बना कसी सम या क परामश नह ं दया जायेगा।

                                     गु    व    योितष वा तु परामश
 नाम:

 पता:

 ई-मेल पता
 फोन नंबर


 सम या:
                   * साथ म भवन का दशा िलखा कर न शा भेजे ।
 वा तु परामश फम इस पत पर भेजे या ई-मेल कर या हमारे                 लोग    http://gurutvajyotish.blogspot.com/ पर
 जाकर ओनलाईन फाम जमा करवा सकते ह। भवन का न शा इस ई-मेल पर भेज:-     े
             Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com,

गु       व कायालय                       े
                           ारा नये भवन क िनमाण एवं संपूण वा तु परामश सु वधा उ ल ध ह।
                                                        64                                    ू
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                                             योितष परामश
 योितष से संबंिधत कसी भी        कार क सम यओ का गु            व               े
                                                                 योितष प का क मा यम से आप अपने               का
िन:शु क उ र एवं समाधान      ा   कर सकते ह।

              े
नोट: जो बंधु कवल अपना भ व य, वषफल या रािशफल इ या द जानना चाहते ह। जो य                     कसी सम या से       त
नह ं ह, वह कृ या भुगतान कर हमार     वशेष सेवाये   ा    करने का क    कर।

                                             योितष परामश
नाम:
पता का नाम
माता का नाम
पता:

ई-मेल पता:
फोन नंबर:
ज म दनांक:
ज म समय:
ज म    थान( जला):

एक     /सम या:

 योितष परामश फम इस पत पर भेजे या ई-मेल कर या हमारे                 लोग    http://gurutvajyotish.blogspot.com/ पर
जाकर ओनलाईन फाम जमा करवा सकते ह।

                                   GURUTVA KARYALAY
             92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785
                 Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
                     Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com




                                                      सूचना
 गु व कायालय से जुडे बंधुगण हो, िनयिमत पाठक हो, या जो य      आिथक       से धन दे कर
 सेवा ा करने म असमथ हो एसे य         चाहे वह कायालय म आते हो, फ़ोन पर हो, ई-मेल ारा
                            े
 हो या ऑन लाइन हो, उन बंधु क िलये हमार यादातर सेवा िन:शु क ह।
       िन:शु क सेवा दान करने का अथ यह कतई नह ं ह क हमारे पास कोई काय नह ं ह। तो
 कृ या वह लोग िनःशु क सेवा का लाभ उठाये जो य वा तव म परे शान ह ।
                                                        65                                      ू
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            Ask Your Questions: Specific Consultation
 In our vast experience while practicing on Astrology, Numerology, Vastu And Spritual Knowlage.
 we are yet to come across a question that cannot be answered with the help of Astrology.
 You too can ask any One question close to your mind or anything too personal that you would not like to
 speak to anybody or discuss with anybody.
 We are sure our experience will have just the advise you might have been looking for !


                                        Specific Consultation
                    Type                             Time Limit                        Charges
              ► Genral               Reply With in 25-30 Day                         Rs. 640
              ► Special              Reply With in 12-15 Day                         Rs. 1050
              ► Express              Reply With in 1- 3 Day                          Rs. 1450


                                       5 Year Prediction Report
                       5 Year prediction Report ( With Easy Remedy) Rs : 1050

                              A Detailed prediction of life over 5 years covering:
             1.    General events
             2.    Career
             3.    Health
             4.    Finances
             5.    Advice on investments
             6.    Marriage
             7.    Children
             8.    Suggestion of remedies and gemstones
             9.    A detailed casting of the horoscope
             10.   A detailed interpretation of planet in your birth chart and their significance.

                                               Declaration Notice
 We do not accept liability for any out of date or incorrect information.
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 If you will cancel your order for any article we can not any amount will be refunded or Exchange.
 We are keepers of secrets. We honour our clients' rights to privacy and will release no information about
  our any other clients' transactions with us.
 Our ability lies in having learned to read the subtle spiritual energy, Yantra, mantra and promptings of the
  natural and spiritual world.
 Our skill lies in communicating clearly and honestly with each client.
 Our all kawach, yantra and any other article are prepared on the Principle of Positiv energy, our Article
  dose not produce any bad energy.
                                                      Our Goal
 Here Our goal has The classical Method-Legislation with Proved by specific with fiery chants prestigious
  full consciousness (Puarn Praan Pratisthit) Give miraculous powers & Good effect All types of Yantra,
  Kavach, Rudraksh, preciouse and semi preciouse Gems stone deliver on your door step.
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                       YANTRA LIST                                     EFFECTS
                    Our Splecial Yantra
 1   12 – YANTRA SET                                 For all Family Troubles
 2   VYAPAR VRUDDHI YANTRA                           For Business Development
 3   BHOOMI LABHA YANTRA                             For Farming Benefits
 4   TANTRA RAKSHA YANTRA                            For Protection Evil Sprite
 5   AAKASMIK DHAN PRAPTI YANTRA                     For Unexpected Wealth Benefits
 6   PADOUNNATI YANTRA                               For Getting Promotion
 7   RATNE SHWARI YANTRA                             For Benefits of Gems & Jewellery
 8   BHUMI PRAPTI YANTRA                             For Land Obtained
 9   GRUH PRAPTI YANTRA                              For Ready Made House
10   KAILASH DHAN RAKSHA YANTRA                                                -

                     Shastrokt Yantra

11   AADHYA SHAKTI AMBAJEE(DURGA) YANTRA             Blessing of Durga
12   BAGALA MUKHI YANTRA (PITTAL)                    Win over Enemies
13   BAGALA MUKHI POOJAN YANTRA (PITTAL)             Blessing of Bagala Mukhi
14   BHAGYA VARDHAK YANTRA                           For Good Luck
15   BHAY NASHAK YANTRA                              For Fear Ending
16   CHAMUNDA BISHA YANTRA (Navgraha Yukta)          Blessing of Chamunda & Navgraha
17   CHHINNAMASTA POOJAN YANTRA                      Blessing of Chhinnamasta
18   DARIDRA VINASHAK YANTRA                         For Poverty Ending
19   DHANDA POOJAN YANTRA                            For Good Wealth
20   DHANDA YAKSHANI YANTRA                          For Good Wealth
21   GANESH YANTRA (Sampurna Beej Mantra)            Blessing of Lord Ganesh
22   GARBHA STAMBHAN YANTRA                          For Pregnancy Protection
23   GAYATRI BISHA YANTRA                            Blessing of Gayatri
24   HANUMAN YANTRA                                  Blessing of Lord Hanuman
25   JWAR NIVARAN YANTRA                             For Fewer Ending
     JYOTISH TANTRA GYAN VIGYAN PRAD SHIDDHA BISHA
26   YANTRA
                                                     For Astrology & Spritual Knowlage
27   KALI YANTRA                                     Blessing of Kali
28   KALPVRUKSHA YANTRA                              For Fullfill your all Ambition
29   KALSARP YANTRA (NAGPASH YANTRA)                 Destroyed negative effect of Kalsarp Yoga
30   KANAK DHARA YANTRA                              Blessing of Maha Lakshami
31   KARTVIRYAJUN POOJAN YANTRA                                                  -
32   KARYA SHIDDHI YANTRA                            For Successes in work
33       SARVA KARYA SHIDDHI YANTRA                 For Successes in all work
34   KRISHNA BISHA YANTRA                            Blessing of Lord Krishna
35   KUBER YANTRA                                    Blessing of Kuber (Good wealth)
36   LAGNA BADHA NIVARAN YANTRA                      For Obstaele Of marriage
37   LAKSHAMI GANESH YANTRA                          Blessing of Lakshami & Ganesh
38   MAHA MRUTYUNJAY YANTRA                          For Good Health
39   MAHA MRUTYUNJAY POOJAN YANTRA                   Blessing of Shiva
40   MANGAL YANTRA ( TRIKON 21 BEEJ MANTRA)          For Fullfill your all Ambition
41   MANO VANCHHIT KANYA PRAPTI YANTRA               For Marriage with choice able Girl
42   NAVDURGA YANTRA                                 Blessing of Durga
                                                                67                                           ू
                                                                                                          अ टबर 2010


                               YANTRA LIST                                                     EFFECTS


43    NAVGRAHA SHANTI YANTRA                                          For good effect of 9 Planets
44    NAVGRAHA YUKTA BISHA YANTRA                                     For good effect of 9 Planets
45        SURYA YANTRA                                               Good effect of Sun
46        CHANDRA YANTRA                                             Good effect of Moon
47        MANGAL YANTRA                                              Good effect of Mars
48        BUDHA YANTRA                                               Good effect of Mercury
49        GURU YANTRA (BRUHASPATI YANTRA)                            Good effect of Jyupiter
50        SUKRA YANTRA                                               Good effect of Venus
51        SHANI YANTRA (COPER & STEEL)                               Good effect of Saturn
52        RAHU YANTRA                                                Good effect of Rahu
53        KETU YANTRA                                                Good effect of Ketu
54    PITRU DOSH NIVARAN YANTRA                                       For Ancestor Fault Ending
55    PRASAW KASHT NIVARAN YANTRA                                     For Pregnancy Pain Ending
56    RAJ RAJESHWARI VANCHA KALPLATA YANTRA                           For Benefits of State & Central Gov
57    RAM YANTRA                                                      Blessing of Ram
58    RIDDHI SHIDDHI DATA YANTRA                                      Blessing of Riddhi-Siddhi
59    ROG-KASHT DARIDRATA NASHAK YANTRA                               For Disease- Pain- Poverty Ending
60    SANKAT MOCHAN YANTRA                                            For Trouble Ending
61    SANTAN GOPAL YANTRA                                             Blessing Lorg Krishana For child acquisition
62    SANTAN PRAPTI YANTRA                                            For child acquisition
63    SARASWATI YANTRA                                                Blessing of Sawaswati (For Study & Education)
64    SHIV YANTRA                                                     Blessing of Shiv
                                                                      Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth &
 65 SHREE YANTRA (SAMPURNA BEEJ MANTRA)                               Peace
 66 SHREE YANTRA SHREE SUKTA YANTRA                                   Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth
 67  SWAPNA BHAY NIVARAN YANTRA                                       For Bad Dreams Ending
 68 VAHAN DURGHATNA NASHAK YANTRA                                     For Vehicle Accident Ending
     VAIBHAV LAKSHMI YANTRA (MAHA SHIDDHI DAYAK SHREE                 Blessing of Maa Lakshami for Good Wealth & All
 69 MAHALAKSHAMI YANTRA)                                              Successes
 70  VASTU YANTRA                                                     For Bulding Defect Ending
 71 VIDHYA YASH VIBHUTI RAJ SAMMAN PRAD BISHA YANTRA                  For Education- Fame- state Award Winning
 72  VISHNU BISHA YANTRA                                              Blessing of Lord Vishnu (Narayan)
 73 VASI KARAN YANTRA                                                 Attraction For office Purpose
 74      MOHINI VASI KARAN YANTRA                                    Attraction For Female
 75      PATI VASI KARAN YANTRA                                      Attraction For Husband
 76      PATNI VASI KARAN YANTRA                                     Attraction For Wife
 77      VIVAH VASHI KARAN YANTRA                                    Attraction For Marriage Purpose
Yantra Available @:- Rs- 190, 280, 370, 460, 550, 640, 730, 820, 910, 1250, 1850, 2300, 2800 and Above…..


                                               GURUTVA KARYALAY
                    92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
                                            Call Us - 09338213418, 09238328785
                             Our Website:- http://gk.yolasite.com/ and http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
                  Email Us:- chintan_n_joshi@yahoo.co.in, gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
                                    (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
                                                      68                                ू
                                                                                     अ टबर 2010




                                          मं िस कवच
                                         े
मं िस कवच को वशेष योजन म उपयोग क िलए और शी                          े
                                                    भाव शाली बनाने क िलए तेज वी मं ो ारा
                                                                े
शुभ महत म शुभ दन को तैयार कये जाते है . अलग-अलग कवच तैयार करने किलए अलग-अलग तरह क
       ू                                                                             े
मं ो का योग कया जाता है .           .


        य चुने मं िस कवच?
    उपयोग म आसान कोई ितब ध नह ं
    कोई वशेष िनित-िनयम नह ं
    कोई बुरा भाव नह ं
          े
    कवच क बारे म अिधक जानकार हे तु

                                              कवच सूिच
सव काय िस       कवच - 3700-/     ऋण मु    कवच – 730/-              वरोध नाशक कवचा- 550-/
सवजन वशीकरण कवच - 1050-/* नव ह शांित कवच – 730/-                  वशीकरण कवच – 460/-* )2-3 य       े
                                                                                                  क िलए(
अ ल मी कवच – 1050/-              तं र ा कवच – 730/-               प ी वशीकरण कवच – 460/-*
आक मक धन ाि कवच –                श ु वजय कवच – 640/-*             नज़र र ा कवच – 460/-
910/-
भूिम लाभ कवच – 910/-             पद उ नित कवच – 640/-              यापर वृ   कवच- 370-/
संतान ाि कवच – 910/-             धन ाि कवच – 640/-                पित वशीकरण कवच – 370/-*
काय िस    कवच – 910/-            ववाह बाधा िनवारण कवच – 640/-     दभा य नाशक कवच – 370/-
                                                                   ु
काम दे व कवच – 820/-             म त क पृ    वधक कवच – 640/-                                  े
                                                                  सर वती कवक – 370/- क ा+ 10 क िलए
जगत मोहन कवच -730/-*             कामना पूित कवच – 550/-                                          े
                                                                  सर वती कवक -280 / - क ा 10 तक क िलए

 पे - यापर वृ    कवच – 730/-     व न बाधा िनवारण कवच – 550/-      वशीकरण कवच – 280/-* 1 य         े
                                                                                                 क िलए

*कवच मा                           े
                शुभ काय या उ े य क िलये
                                  GURUTVA KARYALAY
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                       (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)

                           (ALL DISPUTES SUBJECT TO BHUBANESWAR JURISDICTION)
                                                                     69                                              ू
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                                              GURUTVA KARYALAY
           NAME OF GEM STONE                    GENERAL         MEDIUM FINE         FINE        SUPER FINE             SPECIAL

  Emerald                          (iUuk)          100.00          500.00          1200.00 1900.00                 2800.00 & above
  Yellow Sapphire              (iq[kjkt)           370.00          900.00          1500.00 2800.00                 4600.00 & above
  Blue Sapphire                  (uhye)            370.00          900.00          1500.00 2800.00                 4600.00 & above
  White Sapphire       (lQsn iq[kjkt)              370.00          900.00          1500.00 2400.00                 4600.00 & above
  Bangkok Black Blue(cSadkd uhye)                   80.00          150.00           200.00   500.00                1000.00 & above
  Ruby                          (ekf.kd)            55.00          190.00           370.00   730.00                1900.00 & above
  Ruby Berma               (cekZ ekf.kd)          2800.00         3700.00          4500.00 10000.00               21000.00 & above
  Speenal         (uje ekf.kd ykyMh)               300.00          600.00          1200.00 2100.00                 3200.00 & above
  Pearl                            (eksrh)          30.00           60.00            90.00   120.00                 280.00 & above
  Red Coral (4 jrh rd)       (yky ewaxk)            55.00           75.00            90.00   120.00                 180.00 & above
  Red Coral (4 jrh ls mij) (yky ewaxk)              90.00          120.00           140.00   180.00                 280.00 & above
  White Coral               (lQsn ewaxk)            15.00           24.00            33.00    42.00                   51.00 & above
  Cat’s Eye                  (yglqfu;k)             18.00           27.00            60.00    90.00                 120.00 & above
  Cat’s Eye Orissa (mfM+lk yglqfu;k)               210.00          410.00           640.00 1800.00                 2800.00 & above
  Gomed                           (xksesn)          15.00           27.00            60.00    90.00                 120.00 & above
  Gomed CLN            (flyksuh xksesn )           300.00          410.00           640.00 1800.00                 2800.00 & above
  Zarakan                       (tjdu)             150.00          230.00           330.00   410.00                 550.00 & above
  Aquamarine                      (cs:t)           190.00          280.00           370.00   550.00                 730.00 & above
  Lolite                           (uhyh)           50.00          120.00           230.00   390.00                 500.00 & above
  Turquoise                    (fQjkstk)            15.00           20.00            30.00    45.00                   55.00 & above
  Golden Topaz                 (lqugyk)             15.00           20.00            30.00    45.00                   55.00 & above
  Real Topaz (mfM+lk iq[kjkt@Vksikt)                60.00           90.00           120.00   280.00                 460.00 & above
  Blue Topaz              (uhyk Vksikt)             60.00           90.00           120.00   280.00                 460.00 & above
  White Topaz            (lQsn Vksikt)              50.00           90.00           120.00   240.00                  410.00& above
  Amethyst                       (dVsyk)            15.00           20.00            30.00    45.00                   55.00 & above
  Opal                             (miy)            30.00           45.00            90.00   120.00                 190.00 & above
  Garnet                        (xkjusV)            30.00           45.00            90.00   120.00                 190.00 & above
  Tourmaline                   (rqeZyhu)           120.00          140.00           190.00   300.00                 730.00 & above
  Star Ruby             (lw;ZdkUr e.kh)             45.00           75.00            90.00   120.00                 190.00 & above
  Black Star               (dkyk LVkj)              10.00           20.00            30.00    40.00                   50.00 & above
  Green Onyx                   (vksusDl)            09.00           12.00            15.00    19.00                   25.00 & above
  Real Onyx                    (vksusDl)            60.00           90.00           120.00   190.00                 280.00 & above
  Lapis                        (yktoZr)             15.00           25.00            30.00    45.00                   55.00 & above
  Moon Stone            (panzdkUr e.kh)             12.00           21.00            30.00    45.00                 100.00 & above
  Rock Crystal                 (LQfVd)              09.00           12.00            15.00    30.00                   45.00 & above
  Kidney Stone            (nkuk fQjaxh)             09.00           11.00            15.00    19.00                   21.00 & above
  Tiger Eye              (Vkbxj LVksu)              03.00           05.00            10.00    15.00                   21.00 & above
  Jade                           (ejxp)             12.00           19.00            23.00    27.00                   45.00 & above
  Sun Stone                 (luflrkjk)              12.00           19.00            23.00    27.00                   45.00 & above
  Diamond                           (ghjk)          50.00          100.00            200.00   370.00                460.00 & above
  (.05 to .20 Cent )                             (Per Cent )     (Per Cent )       (PerCent )     (Per Cent)                  (Per Cent )

Note : Bangkok (Black) Blue for Shani, not good in looking but mor effective, Blue Topaz not Sapphire This Color of Sky Blue, For Venus
                    *** Super fine & Special Quality Not Available Easily. We can try only after getting order
                fortunately one or two pieces may be available if possible you can tack corres pondence about
                                                         70                                      ू
                                                                                              अ टबर 2010



                      BOOK PHONE/ CHAT CONSULTATION
      We are mostly engaged in spreading the ancient knowledge of Astrology, Numerology, Vastu and Spiritual
Science in the modern context, across the world.
      Our research and experiments on the basic principals of various ancient sciences for the use of common man.
exhaustive guide lines exhibited in the original Sanskrit texts

BOOK APPOINTMENT PHONE/ CHAT CONSULTATION
        Please book an appointment with Our expert Astrologers for an internet chart . We would require your birth
details and basic area of questions so that our expert can be ready and give you rapid replied. You can indicate the
area of question in the special comments box. In case you want more than one person reading, then please mention
in the special comment box . We shall confirm before we set the appointment. Please choose from :

                                    PHONE/ CHAT CONSULTATION
                       Consultation 30 Min.:               RS. 1250/-*
                       Consultation 45 Min.:               RS. 1900/-*
                       Consultation 60 Min.:               RS. 2500/-*
*While booking the appointment in Addvance

How Does it work Phone/Chat Consultation
This is a unique service of GURUATVA KARYALAY where we offer you the option of having a personalized
discussion with our expert astrologers. There is no limit on the number of question although time is of
consideration.
Once you request for the consultation, with a suggestion as to your convenient time we get back with a
confirmation whether the time is available for consultation or not.
    We send you a Phone Number at the designated time of the appointment
    We send you a Chat URL / ID to visit at the designated time of the appointment
    You would need to refer your Booking number before the chat is initiated
    Please remember it takes about 1-2 minutes before the chat process is initiated.
    Once the chat is initiated you can commence asking your questions and clarifications
    We recommend 25 minutes when you need to consult for one persona Only and usually the time is
       sufficient for 3-5 questions depending on the timing questions that are put.
    For more than these questions or one birth charts we would recommend 60/45 minutes Phone/chat
       is recommended
    Our expert is assisted by our technician and so chatting & typing is not a bottle neck

In special cases we don't have the time available about your Specific Questions We will taken some time for
properly Analysis your birth chart and we get back with an alternate or ask you for an alternate.
All the time mentioned is Indian Standard Time which is + 5.30 hr ahead of G.M.T.
Many clients prefer the chat so that many questions that come up during a personal discussion can be
answered right away.
BOOKING FOR PHONE/ CHAT CONSULTATION PLEASE CONTECT

                                      GURUTVA KARYALAY
                              Call Us:- 91+9338213418, 91+9238328785.
   Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com, chintan_n_joshi@yahoo.co.in,
                                                        71                                        ू
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                                                    सूचना
                             े        े
 प का म कािशत सभी लेख प का क अिधकार क साथ ह आर                     त ह।

 लेख कािशत होना का मतलब यह कतई नह ं क कायालय या संपादक भी इन वचारो से सहमत ह ।

 ना तक/ अ व ासु य                  मा पठन साम ी समझ सकते ह।

 प का म         कािशत कसी भी नाम, थान या घटना का उ लेख यहां कसी भी य                   वशेष या कसी भी थान या
    घटना से कोई संबंध नह ं है .

    कािशत लेख        योितष, अंक        योितष, वा तु, मं , यं , तं , आ या मक                         े
                                                                                  ान पर आधा रत होने क कारण
             े                                     े
    य द कसी क लेख, कसी भी नाम, थान या घटना का कसी क वा त वक जीवन से मेल होता ह तो यह मा
    एक संयोग ह।

    कािशत सभी लेख भारितय आ या मक शा                    से     े रत होकर िलये जाते ह। इस कारण इन वषयो क
    स यता अथवा        ामा णकता पर कसी भी         कार क ज मेदार कायालय या संपादक क नह ं ह।

 अ य लेखको         ारा       दान कये गये लेख/ योग क         ामा णकता एवं   भाव क ज मेदार कायालय या संपादक
                             े           े
    क नह ं ह। और नाह ं लेखक क पते ठकाने क बारे म जानकार दे ने हे तु कायालय या संपादक कसी भी
     कार से बा य ह।

    योितष, अंक       योितष, वा तु, मं , यं , तं , आ या मक             ान पर आधा रत लेखो म पाठक का अपना
    व ास होना आव यक ह। कसी भी य                   वशेष को कसी भी       कार से इन वषयो म व ास करने ना करने
    का अंितम िनणय             वयं का होगा।

 पाठक      ारा कसी भी           कार क आप ी    वीकाय नह ं होगी।

                                           े                    े
 हमारे ारा पो ट कये गये सभी लेख हमारे वष क अनुभव एवं अनुशंधान क आधार पर िलखे होते ह। हम कसी भी य
    वशेष ारा योग कये जाने वाले मं - यं या अ य योग या उपायोक ज मेदार न हं लेते ह।

 यह ज मेदार मं -यं या अ य योग या उपायोको करने वाले य                  क वयं क होगी। यो क इन वषयो म नैितक
                                     े
    मानदं ड , सामा जक , कानूनी िनयम क खलाफ कोई                य    य द नीजी   वाथ पूित हे तु    योग कता ह अथवा
          े                       ू
     योग क करने मे ु ट होने पर ितकल प रणाम संभव ह।

 हमारे ारा पो ट कये गये सभी मं -यं या उपाय हमने सैकडोबार वयं पर एवं अ य हमारे बंधुगण पर योग कये ह
    ज से हमे हर योग या मं -यं या उपायो ारा िन         त सफलता ा हई ह।
                                                                 ु

 पाठक       क मांग पर एक ह लेखका पूनः                                                        े
                                                  काशन करने का अिधकार रखता ह। पाठक को एक लेख क पूनः
     काशन से लाभ          ा     हो सकता ह।

 अिधक जानकार हे तु आप कायालय म संपक कर सकते ह।

                                            े     े
                                (सभी ववादो किलये कवल भुवने र यायालय ह मा य होगा।)
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                         गु    व                   ू
                                     योितष प का अ टबर -2010
संपादक

िचंतन जोशी
संपक
गु    व   योितष वभाग

गु     व कायालय
92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA)
INDIA

फोन


91+9338213418, 91+9238328785
ईमेल
gurutva.karyalay@gmail.com,
 gurutva_karyalay@yahoo.in,

वेब
http://gk.yolasite.com/
http://www.gurutvakaryalay.blogspot.com/
                                                         73                                 ू
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                                                हमारा उ े य
  य आ मय

             ु
          बंध/ ब हन

                      जय गु दे व

      जहाँ आधुिनक व ान समा हो जाता है । वहां आ या मक           ान ारं भ हो जाता है , भौितकता का आवरण ओढे य
                                                                       े
जीवन म हताशा और िनराशा म बंध जाता है , और उसे अपने जीवन म गितशील होने क िलए माग ा नह ं हो पाता यो क
भावनाए ह भवसागर है , जसमे मनु य क सफलता और असफलता िन हत है । उसे पाने और समजने का साथक यास ह            े कर
                                                                                           े
सफलता है । सफलता को ा करना आप का भा य ह नह ं अिधकार है । ईसी िलये हमार शुभ कामना सदै व आप क साथ है । आप
                       ू
अपने काय-उ े य एवं अनुकलता हे तु यं ,    हर    एवं उपर   और दलभ मं श
                                                             ु           से पूण ाण- ित त िचज व तु का हमशा
 योग करे जो १००% फलदायक हो। ईसी िलये हमारा उ े य यह ं हे क शा ो        विध- वधान से विश तेज वी मं ो ारा िस
 ाण- ित त पूण चैत य यु                े
                             सभी कार क य                                          े
                                              - कवच एवं शुभ फलदायी ह र एवं उपर आपक घर तक पहोचाने का है ।


                                   सूय क      करणे उस घर म वेश करापाती है ।
                                                े
                                        जीस घर क खड़क दरवाजे खुले ह ।




                                     GURUTVA KARYALAY
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       अ टबर 2010




Oct
2010

								
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