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14 Feb.. 2013_तत्त्वका अनुभव कैसे हो

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14 Feb.. 2013_तत्त्वका अनुभव कैसे हो Powered By Docstoc
					                        आजकी शुभ तिति–
          माघ शुक्ल चिुिी, तव.सं.–२०६९, गुरुवार

             ित्त्वका अनुभव कै से हो ?

                                            ककसीसे अनुभवकी
                                  बाि           पूछना    और
                                  अनुभवकी बाि कहना‒ये
                                  दोनों ही बकिया चीज
                                  नहीं हैं । दूसरी बाि,
                                  कोई भी व्याख्यानदािा
                                  अपनी दृतिसे बकिया-से-
                                  बकिया बाि ही कहेगा;
                                  क्योंकक       अपनी    इज्जि
सभी चाहिे हैं । वह भी िो अपनी इज्जि चाहिा है,
इसतलये वह घटिया बाि क्यों कहेगा ? वह अपना अनुभव
तछपायेगा ही कै से ?

      सन्िोंकी वाणीमें आया है कक साधु-सन्िकी परीक्षा
शब्दसे होिी है‒‘साधु तपछातनये शबद सुनािा ।’ वह क्या
बोलिा है‒इससे भावोंका पिा लग जािा है । ककसी भी
आदमीसे आप ठीक िरहसे बाि करो, उसकी बािोंपर


                स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज
ध्यान दो िो उसके भीिरके भावोंका पिा लग जायगा कक
वह कै सा है ? कहााँिक पहाँचा हआ है ?

       गीिको देखनेसे पिा लगिा है कक भगवान्का क्या
भाव है । गीिा पिनेपर हमारी समझमें यह बाि आयी कक
भगवान्ने दो बािोंपर तवशेष जोर कदया है‒एक िो
जीवन-पययन्ि साधन करना और दूसरा अन्िकालमें
सावधान रहना । इन दो तवषयोंपर भगवान् तजिना बोले
हैं, उिना दूसरे ककसी तवषयपर नहीं बोले ।

       श्रोिा‒उस ित्त्वका अनुभव कै से हो महाराजजी ?

       स्वामीजी‒पहले यह बाि मान लो कक सब कु छ
परमात्मा ही है; हमारे को दीखे, चाहे न दीखे; हमारी
समझमें आये, चाहे न आये । गीिाका खास तसद्धान्ि है‒
      े                       ु य
‘वासुदवः सवयतमति स महात्मा सुदलभः’ (७/१९) । अिायि्
सब कु छ परमात्मा ही है‒ऐसा अनुभव करनेवाला महात्मा
       य           ाँ
बहि दुलभ है । ऐसे ऊचे दजेंके महात्माओंकी बािें हमने
सुनी हैं, पुस्िकोंसे पिी हैं कक वे ककसीको कोई बाि
समझािे हैं या प्रश्नका उत्तर देिे हैं, िो भी उनके मनमें यह
बाि नहीं आिी कक मैं िो समझदार हाँ और ये बेसमझ हैं,
अनजान हैं । इनको मैं जना दूाँ; यह सीखिा है िो मैं तसखा
 ाँ
दू‒ऐसा भाव नहीं रहिा । िो क्या भाव रहिा है ? कक
                स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज
हमारे प्रभु ही व्यापकरूपसे होकर पूछ रहे हैं । उनकी जो
धारणा है, उसके अनुसार मैं कह रहा हाँ‒इस िरह प्रभुकी
मैं सेवा कर रहा हाँ । मेरे भीिर जो बोलनेकी एक आसति
है, कामना है, उसको पूरी करनेके तलये प्रभु अनजान
बनाकर पूछिे हैं । के वल मेरेपर कृ पा करनेके तलये ही
पूछिे हैं । मेरी बोलनेकी आसतिको तमिानेके तलये ही
प्रभुने यह सब संयोग रचा है, यह उनकी ही लीला है ।
संसारका जो स्वरूप कदखिा है, वह िो प्रभुका स्वरूप है
और संसारकी जो चेिा है, वह सब प्रभुकी लीला है । प्रभु
ही मेरेपर कृ पा करनेके तलये तवलक्षण रीतिसे लीला कर
रहे हैं । उनका ककसीसे कोई मिलब नहीं है, कोई प्रयोजन
नहीं है; उनको न िो ककसीसे कु छ लेना है, न कु छ तसखना
है, वे िो के वल कृ पा करके ऐसा कर रहे हैं । अिः उनकी
कृ पा-ही-कृ पा है‒यह बाि हमलोगोंको मान लेनी चातहये ।
जो महापुरुषोंका अनुभव है, उसको हम पहले ही मान लें
िो किर वह दीखने लग जायगा ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘वास्ितवक सुख’ पुस्िकसे




                  स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज

				
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posted:2/14/2013
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