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13 Feb.. 2013_दृढ़ निश्चयकी महिमा by sadhakdas

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									                       आजकी शुभ तिति–
         माघ शुक्ल िृिीया, तव.सं.–२०६९, बुधवार

               दृढ़ तिश्चयकी मतहमा
                                     (गि ब्लॉगसे आगेका)

                                          परमात्माको माि
                                     लें और संसारको जाि
                                     लें । परमात्माको कै से
                                     जािें ? कक परमात्मा
                                     िो हैं; और संसारको
                                     कै से जािें ? कक संसार
                                     िहीं है । संसारको
ठीक जाि लेिे पर परमात्मा प्रकट हो जािे हैं । ‘यह बाि
ठीक दीखिी है, िो किर जँचिी क्यों िहीं ?’ इसमें कारण
यह है कक संसारसे सुख लेिे हो । जबिक सांसाररक सुखका
लोभ रहेगा, िबिक ‘यह           संसार िाशवाि् है, असत्य
है’‒ऐसा कहिेपर भी दीखेगा िहीं ।

      काला भौंरा बाँसमें छेद करके रहिा है । बाँस
ककििा कड़ा होिा है, पर भौरे के दाँि इििे कठोर होिे हैं
कक उसमें भी गोल-गोल छेद कर देिा है ! परन्िु वह
कमलके भीिर बैठिा है, िब रािमें कमलके बन्द होिेपर
               स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज
भी वह उसे काटकर बाहर िहीं आिा । वह सोचिा है कक
राि चली जायेगी, प्रभाि हो जायगा, सूययका उदय हो
जायगा, िब कमल तखल जायगा और उस समय मैं उड़
   ँ
जाऊगा । वह बाँसमें छेद कर देिा है, पर कमलकी पंखुड़ी
उससे िहीं कटिी । क्या वह इििा कमजोर है ? वह उस
कमलसे सुख लेिा है, इसतलये कमजोर हो जािा है ! ऐसे
ही मिुष्य संसारसे सुख लेिा है, इसतलये कमजोर हो जािा
है । बीकािेरकी बोली में एक बाि आिी है‒‘रांडरा काचा’
अिायि् स्त्रीके आगे तबलकु ल कच्चा, स्त्रीका गुलाम । इस
संसाररूपी स्त्रीके आगे यह मिुष्य कच्चा, कमजोर हो जािा
है । कच्चापि क्या है ? संसारसे सुख लेिा है, यही कच्चापि
है । इस कच्चापि को दूर करिा है ।

       ‘परमात्मा है’‒यह िो मान्यिा है और ‘संसार
िाशवाि् है’‒यह प्रत्यक्ष है । संसारको ठीक जाि लो िो
परमात्मा प्रकट हो जायँगे, इििी-सी बाि है । िोड़ी देर
बैठकर इस बािको जमा लो कक बाहर-भीिर, ऊपर-िीचे
सब जगह परमात्मा ही हैं । जैसे समुद्रमें गोिा लगािेपर
चारों िरि जल-ही-जल है, ऐसे ही सब जगह परमात्मा-
ही-परमात्मा हैं । संसार िो बेचारा यों ही िष्ट हो रहा है !

       श्रोिा‒संसारका सुख लेिा कै से तमटे ?

                स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज
           स्वामीजी‒इसको अपिी कच्चाई समझें िो यह तमट
जायगा । इसको िो आप तमटायेंगे, िभी तमटेगा । दूसरा
िहीं तमटा सकिा । अिः आप अपिा पूरा बल लगायें ।
किर भी ि तमटे िो ‘हे िाि ! हे िाि !’ कहकर भगवाि्को
पुकारें । यह तियम है कक जब आदमी तिबयल हो जािा है,
िब वह सबलका सहारा लेिा ही है । एक िो सांसाररक
सुखासतिको तमटािेकी चाहिा िहीं है और एक हम
उसको तमटािे िहीं हैं, ये दो बाधाएँ हैं । ये दोिों बाधाएँ
हट जायँ, किर भी सुखाति ि तमटे िो उस समय आप
स्विः परमात्माको पुकार उठोगे । बालककी भी मिचाही
िहीं होिी िो वह रो पड़िा है और रोिेसे सब काम हो
जािा है । ऐसे ही सज्जिो ! उस प्रभुके आगे रो पड़ो िो सब
काम हो जायगा । वे प्रभु सवयिा सबल हैं । उिके रहिे हम
दुःख क्यों पायें ? भगवाि् हमारे हैं । बालक कहिा है कक
माँ मेरी है, िो माँको उसे गोदमें लेिा पड़ेगा । वह िो
के वल एक जन्मकी माँ है; परन्िु वे प्रभु सदाकी और सबकी
माँ है ।

              िारायण !      िारायण !!    िारायण !!!

‒ ‘वास्ितवक सुख’ पुस्िकसे



                  स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज

								
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