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Hindi Presentaion

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Hindi Presentaion Powered By Docstoc
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                                    Created By Harimangal Pandey
Created By Harimangal Pandey
मीराबाई




          Created By Harimangal Pandey
               जीवन पररचय

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इनका वववाह उदयपुर क महाराणा कमार भोजराज जी क साथ   े
हुआ था। ये बचपन से ही कृ ष्णभवि में रुचच ले ने लगी थीीं
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वववाह क थोडे ही ददन क बाद उनक पचि का स्वगगवास हो गया
था।

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 पचि क परलोकवास क बाद इनकी भवि ददन- प्रचि- ददन
                                                        े
बढ़िी गई। ये मीं ददरों में जाकर वहााँ मौजूद कृ ष्णभिों क सामने
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कृ ष्णजी की मू चिग क आगे नाचिी रहिी थीीं।




                                         Created By Harimangal Pandey
मीराबाई का घर से चनकाला जाना
  मीराबाई का कृ ष्णभवि में नाचना और गाना राज
   पररवार को अच्छा नहीीं लगा।
  उन्होंने कई बार मीराबाई को ववष दे कर मारने की
   कोचिि की।
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  घर वालों क इस प्रकार क व्यवहार से परे िान होकर
                     ीं
   वह द्वारका और वृदावन गईं।
  वह जहााँ जािी थीीं, वहााँ लोगों का सम्मान चमलिा
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   था। लोग आपको दे ववयों क जैसा प्यार और सम्मान
   दे िे थे। इसी दौरान उन्होंने िुलसीदास को पत्र चलखा
   था।


                                      Created By Harimangal Pandey
   िुलसीदास को पत्र
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• स्वस्स्ि श्री िु लसी कलभूषण दषन- हरन गोसाई।
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 बारदहीं बार प्रनाम करहूाँ अब हरहूाँ सोक- समुदाई।।
          े
 • घर क स्वजन हमारे जेिे सबन्ह उपाचि बढ़ाई।
सािु- सग अरु भजन करि मादहीं दे ि कलेस महाई।।
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 • मेरे मािा- वपिा क समहौ, हररभिन्ह सुखदाई।
हमको कहा उचचि कररबो है , सो चलस्खए समझाई।।




                               Created By Harimangal Pandey
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     मीराबाई क पत्र का जबाव
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           जाक वप्रय न राम बैदेही।

सो नर िस्जए कोदि बैरी सम जद्यवप परम सनेहा।।

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नािे सबै राम क मचनयि सुह्मद सुसींख्य जहााँ लौ।

                     ू
अींजन कहा आाँस्ख जो फिे , बहुिक कहो कहाीं लौ।।


                            Created By Harimangal Pandey
            मीरा रचचि ग्रींथ

मीराबाई ने चार ग्रींथों की रचना की:-
1.बरसी का मायरा
2.गीि गोववींद िीका
3.राग गोववींद
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4.राग सोरठ क पद
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    इसक अलावा मीराबाई क गीिों का सीं कलन "मीराबाई की
    पदावली' नामक ग्रन्थ में दकया गया है ।




                                   Created By Harimangal Pandey
    मीराबाई की भवि
                        ग
मीरा की भवि में मािुय-भाव काफी हद िक पाया
                                ृ
  जािा था। वह अपने इष्टदे व कष्ण की भावना
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  वप्रयिम या पचि क रुप में करिी थी। उनका
                                  ृ े
  मानना था दक इस सींसार में कष्ण क अलावा
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 कोई पुरुष है ही नहीीं। कष्ण क रुप की दीवानी
                       थी l



                          Created By Harimangal Pandey
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     मीराबाई क गुरु और अन्य
 मीराबाई रै दास को अपना गुरु मानिे हुए कहिी हैं -
     गु रु चमचलया रै दास दीन्ही ज्ञान की गुिकी।
 इन्होंने अपने बहुि से पदों की रचना राजस्थानी चमचश्रि
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  भाषा में की है इसक अलावा कछ वविु द्ध सादहस्ययक
  ब्रजभाषा में भी चलखा है ।
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 इन्होंने जन्मजाि कववचयत्री न होने क बावजूद भवि की
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  भावना में कववचयत्री क रुप में प्रचसवद्ध प्रदान की।
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 मीरा क ववरह गीिों में समकालीन कववयों की अपेक्षा
  अचिक स्वाभाववकिा पाई जािी है ।
 इन्होंने अपने पदों में श्रृींगार और िाींि रस का प्रयोग
  वविे ष रुप से दकया है ।




                                       Created By Harimangal Pandey
िुलसीदास




           Created By Harimangal Pandey
                    जीवन पररचय
   गोस्वामी िु लसीदास [१४९७ - १६२३] एक महान कवव थे । उनका जन्म राजापु र गााँव (विगमान
    बााँ दा स्जला) उत्तर प्रदे ि में हुआ था।
                                                                     ृ              े
    अपने जीवनकाल में िु लसीदास जी ने १२ ग्रन्थ चलखे और उन्हें सींस् कि ववद्वान होने क साथ ही
                 े
    दहन्दी भाषा क प्रचसद्ध और सवगश्रेष्ठ कववयों में एक माना जािा है ।
      िुलसीदास जी को महवषग वाल्मीदक का अविार भी माना जािा है जो मू ल आदद काव्य रामायण
       े
    क रचचयिा थे । श्रीराम जी को समवपगि ग्रन्थ श्रीरामचररिमानस वाल्मीदक रामायण का
                                                             ृ
    प्रकारान्िर से ऐसा अविी भाषान्िर है स्जसमें अन्य भी कई कचियों से महयवपू ण ग सामग्री
    समादहि की गयी थी।
                                                                           े
    श्रीरामचररिमानस को समस्ि उत्तर भारि में बडे भविभाव से पढ़ा जािा है । इसक बाद ववनय
                      ृ
    पवत्रका िुल सीदासकि एक अन्य महयवपू ण ग काव्य है ।




                                                        Created By Harimangal Pandey
                                 जन्म
                  े      ू           ु
    उत्तर प्रदे ि क चचत्रकि स्जले से कछ दरी पर राजापु र नामक एक ग्राम है , वहााँ आयमाराम दबे
                                         ू                                                ु
             े
    नाम क एक प्रचिवष्ठि सरयूपारीण ब्राह्मण रहिे थे ।
                                                      े            े
     उनकी िमगपत्नी का नाम हुलसी था। सींवि ् १५५४ क श्रावण मास क िुक् लपक्ष की सप्तमी चिचथ
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    क ददन अभुि मू ल नक्षत्र में इन्हीीं भाग्यवान दम्पचि क यहााँ इस महान आयमा ने मनु ष्य योचन
    में जन्म चलया।
                       े                                        े                े
    प्रचचलि जनश्रुचि क अनु सार चििु पू रे बारह महीने िक मााँ क गभग में रहने क कारण अययचिक
                          े                                             े
    हृष्ट पु ष्ट था और उसक मुख में दााँि ददखायी दे रहे थे । जन्म ले ने क बाद प्राय: सभी चििु रोया
    ही करिे हैं दकन्िु इस बालक ने जो पहला िब्द बोला वह राम था। अिएव उनका घर का नाम
    ही रामबोला पड गया।
                        े                                                        े
     मााँ िो जन्म दे ने क बाद द ूसरे ही ददन चल बसी बाप ने दकसी और अचनष्ट से बचने क चलये
    बालक को चु चनयााँ नाम की एक दासी को सौंप ददया और स्वयीं ववरि हो गये।
   जब रामबोला साढे पााँच वषग का हुआ िो चु चनयााँ भी नहीीं रही। वह गली-गली भिकिा हुआ
    अनाथों की िरह जीवन जीने को वववि हो गया।




                                                            Created By Harimangal Pandey
                                बचपन
                                                                       े
    भगवान िींकरजी की प्रेरणा से रामिैल पर रहने वाले श्री अनन्िानन्द जी क वप्रय
    चिष्य श्रीनरहयागनन्द जी (नरहरर बाबा) ने इस रामबोला क नाम से बहुचचचगि हो
                                                          े
    चुक इस बालक को ढू ाँ ढ चनकाला और ववचिवि उसका नाम िुलसीराम रखा।
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   िदपरान्ि वे उसे अयोध्या ( उत्तर प्रदे ि) ले गये और वहााँ सींवि ् १५६१ माघ
        ु
    िुक्ला पञ्चमी (िुक्रवार) को उसका यज्ञोपवीि-सींस्कार सम्पन्न कराया। सींस्कार
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    क समय भी वबना चसखाये ही बालक रामबोला ने गायत्री-मन्त्र का स्पष्ठ उच्चारण
    दकया, स्जसे दे खकर सब लोग चदकि हो गये।
   इसक बाद नरहरर बाबा ने वैष्णवों क पााँच सींस्कार करक बालक को राम-मन्त्र
          े                            े                े
    की दीक्षा दी और अयोध्या में ही रहकर उसे ववद्याध्ययन कराया ।
   बालक रामबोला की बुवद्ध बडी प्रखर थी। वह एक ही बार में गुरु-मुख से जो सुन
                       ीं                          ु        े
    लेिा, उसे वह कठस्थ हो जािा। वहााँ से कछ काल क बाद गुरु-चिष्य दोनों
    िूकरक्षेत्र (सोरों) पहाँु चे। वहााँ नरहरर बाबा ने बालक को राम-कथा सुनायी दकन्िु
    वह उसे भली-भााँचि समझ न आयी।




                                                     Created By Harimangal Pandey
                        श्रीराम से भेंि
     ु                           े
    कछ काल राजापुर रहने क बाद वे पुन: कािी चले गये और वहााँ की जनिा को राम-
                                े                            े
    कथा सुनाने लगे। कथा क दौरान उन्हें एक ददन मनुष्य क वेष में एक प्रेि चमला,
    स्जसने उन्हें हनुमान जी का पिा बिलाया। हनुमान जी से चमलकर िुलसीदास ने
                                                               ्
    उनसे श्रीरघु नाथजी का दिगन कराने की प्राथगना की। हनुमानजी ने कहा- "िुम्हें
           ू                                                       ू
    चचत्रकि में रघुन ाथजी दिगन होंगें।" इस पर िुलसीदास जी चचत्रकि की ओर चल पडे ।
            ू
    चचत्रकि पहुाँच कर उन्होंने रामघाि पर अपना आसन जमाया। एक ददन वे प्रदस्क्षणा
                                                         े
    करने चनकले ही थे दक यकायक मागग में उन्हें श्रीराम क दिगन हुए। उन्होंने दे खा दक
                            ु
    दो बडे ही सुन्दर राजकमार घोडों पर सवार होकर िनुष-बाण चलये जा रहे हैं ।
    िुलसीदास उन्हें दे खकर आकवषगि िो हुए, परन्िु उन्हें पहचान न सक। िभी पीछे से
                                                                     े
               ्
    हनुमानजी ने आकर जब उन्हें सारा भेद बिाया िो वे पश्चािाप करने लगे। इस पर
                 ्
    हनुमानजी ने उन्हें सायवना दी और कहा प्रािःकाल दफर दिगन होंगे।
                                                े         े
    सींवि ् १६०७ की मौनी अमावस्या को बुिवार क ददन उनक सामने भगवान श्रीराम
    पुनः प्रकि हुए। उन्होंने बालक रूप में आकर िुलसीदास से कहा-"बाबा! हमें चन्दन
    चादहये क्या आप हमें चन्दन दे सकिे हैं ?" हनुमान जी ने सोचा,कहीीं वे इस बार भी
                                                                 े
    िोखा न खा जायें, इसचलये उन्होंने िोिे का रूप िारण करक यह दोहा कहा:
                              ू     े
                        चचत्रकि क घाि पर, भइ सन्िन की भीर।
                         िुलचसदास चन्दन चघसें, चिलक दे ि रघुबीर॥




                                                   Created By Harimangal Pandey
                       मृययु
                               े
  िुलसीदास जी जब कािी क ववख्याि ् घाि असीघाि
  पर रहने लगे िो एक राि कचलयुग मूि ग रूप िारण
            े
  कर उनक पास आया और उन्हें पीडा पहाँु चाने लगा।
 िुलसीदास जी ने उसी समय हनुमान जी का ध्यान
  दकया। हनु मान जी ने साक्षाि ् प्रकि होकर उन्हें
              े                        े
  प्राथगना क पद रचने को कहा, इसक पश्चाि ् उन्होंने
  अपनी अस्न्िम कृ चि ववनय-पवत्रका चलखी और उसे
                े
  भगवान क चरणों में समवपगि कर ददया।
 श्रीराम जी ने उस पर स्वयीं अपने हस्िाक्षर कर ददये
  और िुलसीदास जी को चनभगय कर ददया।
 सींवि ् १६८० में श्रावण कृ ष्ण िृिीया िचनवार को
  िुलसीदास जी ने "राम-राम" कहिे हुए अपना िरीर
  पररययाग दकया।



                                   Created By Harimangal Pandey
                        िुलसीदास की रचनाएाँ
   रामचररिमानस िुलसीदास जी का सवागचिक लोकवप्रय ग्रन्थ रहा है । उन्होंने अपनी रचनाओीं
     े                                                                         े
    क सम्बन्ि में कहीीं कोई उल्लेख नहीीं दकया है , इसचलए प्रामास्णक रचनाओीं क सम्बन्ि में
    अन्ि:साक्ष्य का अभाव ददखायी दे िा है । नागरी प्रचाररणी सभा कािी द्वारा प्रकाचिि ग्रन्थ
    इस प्रकार हैं :
   रामचररिमानस
    रामललानहछू
   वैराग्य-सींदीपनी
   बरवै रामायण
   पावगिी-मींगल
   जानकी-मींगल
    रामाज्ञाप्रश्न
   दोहावली
   कवविावली
   गीिावली
        ृ
    श्रीकष्ण-गीिावली
   ववनय-पवत्रका



                                                                 Created By Harimangal Pandey
सूरदास




         Created By Harimangal Pandey
                     जीवन पररचय
   सूरदास का जन्म १४७८ ईस्वी में रुनकिा नामक गाींव में हु आ।
                                     े
    यह गााँव मथुरा-आगरा मागग क दकनारे स्स्थि है ।
    ु
    कछ ववद्वानों का मि है दक सूर का जन्म सीही नामक ग्राम में एक
    चनिगन सारस्वि ब्राह्मण पररवार में हुआ था। बाद में ये आगरा और
            े
    मथुरा क बीच गऊघाि पर आकर रहने लगे थे।
             े                                    े
    सूरदास क वपिा रामदास गायक थे। सूरदास क जन्माींि होने क         े
                                                     े
    ववषय में मिभेद है । प्रारीं भ में सूरदास आगरा क समीप गऊघाि
    पर रहिे थे। वहीीं उनकी भेंि श्री वल्लभाचायग से हुई और वे उनक     े
    चिष्य बन गए।
                                                      े         े
    वल्लभाचायग ने उनको पुव ष्टमागग में दीस्क्षि कर क कृ ष्णलीला क पद
    गाने का आदे ि ददया। सूरदास की मृययु गोविगन क चनकि    े
    पारसौली ग्राम में १५८० ईस्वी में हुई।




                                             Created By Harimangal Pandey
                   े
         जन्मचिचथ क ववषय में मिभेद
                                    े
 सूरदास का जन्म सीं० १५३५ वव० क लगभग ठहरिा
 है , क्योंदक बल्लभ सम्प्रदाय में ऐसी मान्यिा है दक
 बल्लभाचायग सूरदास से दस ददन बडे थे और
 बल्लभाचायग का जन्म उि सींवि ् की वैिाख ् कृ ष्ण
 एकादिी को हुआ था।
 इसचलए सूरदास की जन्म-चिचथ वैिाख िुक्ला पींचमी,
 सींवि ् १५३५ वव० समीचीन जान पडिी है । अनेक
             े
 प्रमाणों क आिार पर उनका मृययु सींवि ् १६२० से
                 े
 १६४८ वव० क मध्य स्वीकार दकया जािा है । रामचन्र
               े
 िुक्ल जी क मिानुसार सूरदास का जन्म सींवि ् १५४०
         े
 वव० क सस्न्नकि और मृययु सींवि ् १६२० वव० क      े
 आसपास माना जािा है ।


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     जन्मस्थान क ववषय में मिभेद
                                 े
  सूरदास की आयु "सूरसारावली' क अनुसार उस
  समय ६७ वषग थी। 'चौरासी वैष्णव की वािाग' क    े
  आिार पर उनका जन्म रुनकिा अथवा रे णु का
  क्षेत्र (विगमान स्जला आगरान्िगगि) में हुआ था।
                        े
 मथुरा और आगरा क बीच गऊघाि पर ये चनवास
  करिे थे। बल्लभाचायग से इनकी भेंि वहीीं पर हुई
  थी। "भावप्रकाि' में सूर का जन्म स्थान सीही
  नामक ग्राम बिाया गया है ।
                                    े
 वे सारस्वि ब्राह्मण थे और जन्म क अींिे थे।
  "आइने अकबरी' में (सींवि ् १६५३ वव०) िथा
                          े
  "मुिखबुि-िवारीख' क अनुसार सूरदास को
              े
  अकबर क दरबारी सींगीिज्ञों में माना है ।

                                  Created By Harimangal Pandey
             क्या सूरदास जन्माींि थे ?
                            ृ
  सूर दास श्रीनाथ की "सींस्किवािाग मस्णपाला', श्री हररराय कि    ृ
                           ु
  "भाव-प्रकाि", श्री गोकलनाथ की "चनजवािाग' आदद ग्रन्थों क         े
                       े
  आिार पर, जन्म क अन्िे माने गए हैं । लेदकन रािा-कष्ण क      ृ      े
  रुप सौन्दयग का सजीव चचत्रण, नाना रीं गों का वणगन, सूक्ष्म
                                     े
  पयगवेक्षणिीलिा आदद गुणों क कारण अचिकिर विगमान ववद्वान
  सूर को जन्मान्ि स्वीकार नहीीं करिे।
 श्यामसुन्दर दास ने इस सम्बन्ि में चलखा है - "सूर वास्िव में
  जन्मान्ि नहीीं थे , क्योंदक श्रृींगार िथा रीं ग-रुपादद का जो वणगन
  उन्होंने दकया है वैसा कोई जन्मान्ि नहीीं कर सकिा।" डॉक्िर
                                                      े ु
  हजारीप्रसाद दद्ववेदी ने चलखा है - "सूर सागर क कछ पदों से यह
  ध्वचन अवश्य चनकलिी है दक सूरदास अपने को जन्म का अन्िा
  और कमग का अभागा कहिे हैं , पर सब समय इसक अक्षराथग को    े
  ही प्रिान नहीीं मानना चादहए।"


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                         रचनाएाँ
 सूरदास जी द्वारा चलस्खि पााँच ग्रन्थ बिाए जािे
  हैं -
१ सूरसागर - जो सूरदास की प्रचसद्ध रचना है ।
    स्जसमें सवा लाख पद सींग्रदहि थे।
        ीं
      दकिु अब साि-आठ हजार पद ही चमलिे हैं ।
    २ सूरसारावली
                               े ू
    ३ सादहयय-लहरी - स्जसमें उनक कि पद
    सींकचलि हैं ।
    ४ नल-दमयन्िी
    ५ ब्याहलो
    उपरोि में अस्न्िम दो अप्राप्य हैं ।


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         सूर-काव्य की वविेषिाएाँ
        े                        ृ     े
  सूर क अनुसार भगवान श्रीकष्ण क अनुग्रह से मनुष्य को सद्गचि
                                      े
  चमल सकिी है । अिल भवि कमगभद , जाचिभेद, ज्ञान, योग से श्रेष्ठ
  है ।
                      ीं
 सूर ने वायसल्य, श्रृगार और िाींि रसों को मुख्य रूप से अपनाया
                                          े       ृ    े
  है । सूर ने अपनी कल्पना और प्रचिभा क सहारे कष्ण क बाल्य-रूप
  का अचि सुींदर, सरस, सजीव और मनोवैज्ञाचनक वणगन दकया है ।
  बालकों की चपलिा, स्पिाग, अचभलाषा, आकाींक्षा का वणगन करने में
                                                    ृ
  ववश्व व्यापी बाल-स्वरूप का चचत्रण दकया है । बाल-कष्ण की एक-
                  े
  एक चेष्टाओीं क चचत्रण में कवव कमाल की होचियारी एवम ् सूक्ष्म
  चनरीक्षण का पररचय दे िे हैं -
             मैया कबदहीं बढै गी चौिी?
             दकिी बार मोदहीं दि वपयि भई, यह अजहाँू है छोिी।
                                ू
           े ृ
 सूर क कष्ण प्रेम और मािुयग प्रचिमूचिग है । स्जसकी अचभव्यवि बडी
  ही स्वाभाववक और सजीव रूप में हुई है ।



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