गजेन्द्र स्तुति

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					                  गजेन्द्र स्तुतत

                                    तजसके ऊपर
                                    बहुत भारी
                                    आर्थिक संकट
                                    आ गया है, जो
                                    कजे में डू बा
                                    हुआ है, कोई
                                    रास्ता नहीं
                                    सूझ रहा है,
                                    उसके तिये एक
                                    अचूक उपाय है
                                    “गजेन्द्र-स्तुतत”.
मैंने भाई जी श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार द्वारा
तितित एक संस्मरण पढ़ा िा जो महामना
मदनमोहन मािवीय जी से सम्बंतित है.
महामना के एक पुत्र बड़े अिथसंकट ( पैसे की कमी )
में िे. उनको महामना ने तार में तििा- “तुम आतथ
होकर तवश्वास से गजेन्द्र-स्तुतत का पाठ करो, इससे



                  गजेन्द्र-स्तुतत
                   गजेन्द्र स्तुतत

तुम्हारा संकट दूर हो जायेगा.” फिर एक पत्र में
उनको तििा- “भगवान पर तवश्वास रिो, िैयथ मत
छोडो और गजेन्द्र-स्तुतत का आतथ भाव से तवश्वास
पूवथक पाठ करो. मैं एक बार नाक तक कर्थ में डू ब
गया िा, गजेन्द्र-स्तुतत के पाठ से मैं ऋणमुक्त हो
गया िा, तुम भी इसका आश्रय िो.”


श्रीमद्भागवतके अष्टम स्कन्द्ि का तीसरा अध्याय
यह स्तुतत है. इसे मैं नीचे दे रहा हूँ-


श्रीमद्भागवतान्द्तगथत
गजेन्द्र कृ त भगवान का स्तवन


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                   गजेन्द्र-स्तुतत
                   गजेन्द्र स्तुतत

श्री शुक उवाच – श्री शुकदेव जी ने कहा


एवं व्यवतसतो बुद्धध्या समािाय मनो हृफद ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्द्मन्द्यनुतशतितम ॥१॥


बुति के द्वारा तपछिे अध्याय में वर्थणत रीतत से
तनश्चय करके तिा मन को हृदय देश में तस्िर करके
वह गजराज अपने पूवथ जन्द्म में सीिकर कण्ठस्ि
फकये हुए सवथश्रेष्ठ एवं बार बार दोहराने योग्य
तनम्नतितित स्तोत्र का मन ही मन पाठ करने िगा
॥१॥
गजेन्द्र उवाच गजराज ने (मन ही मन) कहा -


 ं
ऊ नमो भगवते तस्मै यत एततिदात्मकम ।
पुरुषायाफदबीजाय परे शायातभिीमतह ॥१॥


तजनके प्रवेश करने पर (तजनकी चेतना को पाकर)
ये जड शरीर और मन आफद भी चेतन बन जाते हैं
(चेतन की भांतत व्यवहार करने िगते हैं), ‘ओम’

                   गजेन्द्र-स्तुतत
                   गजेन्द्र स्तुतत

शब्द के द्वारा ितित तिा सम्पूणथ शरीर में प्रकृ तत
एवं पुरुष रूप से प्रतवष्ट हुए उन सवथ समिथ परमेश्वर
को हम मन ही मन नमन करते हैं ॥२॥


यतस्मतिदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
योस्मात्परस्माि परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ॥३॥


तजनके सहारे यह तवश्व टटका है, तजनसे यह
तनकिा है , तजन्द्होने इसकी रचना की है और जो
स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं – फिर भी जो इस
दृश्य जगत से एवं इसकी कारणभूता प्रकृ तत से
सवथिा परे (तवििण ) एवं श्रेष्ठ हैं – उन अपने आप
– तबना फकसी कारण के – बने हुए भगवान की मैं
शरण िेता हं ॥३॥


यः स्वात्मनीदं तनजमाययार्थपतं
क्कतचतद्वभातं क्क च ततिरोतहतम ।


                  गजेन्द्र-स्तुतत
                    गजेन्द्र स्तुतत

अतविदृक साक्ष्युभयं तदीिते
स आत्ममूिोवतु मां परात्परः ॥४॥


अपने संकल्प शतक्त के द्वार अपने ही स्वरूप में रचे
हुए और इसीतिये सृतष्टकाि में प्रकट और
प्रियकाि में उसी प्रकार अप्रकट रहने वािे इस
शास्त्र प्रतसि कायथ कारण रूप जगत को जो
अकु तण्ठत दृतष्ट होने के कारण सािी रूप से देिते
रहते हैं उनसे तिप्त नही होते, वे चिु आफद
प्रकाशकों के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रिा करें
॥४॥


कािेन पंचत्वतमतेषु कृ त्नशो
िोके षु पािेषु च सवथ हेतुषु ।


तमस्तदाsssसीद गहनं गभीरं
यस्तस्य पारे sतभतवराजते तवभुः ॥५॥
समय के प्रवाह से सम्पूणथ िोकों के एवं ब्रह्माफद
िोकपािों के पंचभूत में प्रवेश कर जाने पर तिा
                   गजेन्द्र-स्तुतत
                     गजेन्द्र स्तुतत

पंचभूतों से िेकर महत्वपयंत सम्पूणथ कारणों के
उनकी परमकरुणारूप प्रकृ तत में िीन हो जाने पर
उस समय दुर्ज्ञेय तिा अपार अंिकाररूप प्रकृ तत ही
बच रही िी। उस अंिकार के परे अपने परम िाम
में जो सवथव्यापक भगवान सब ओर प्रकातशत रहते
हैं वे प्रभु मेरी रिा करें ॥५॥


न यस्य देवा ऋषयः पदं तवदु-
जथन्द्तुः पुनः कोsहथतत गन्द्तुमीटरतुम ।
यिा नटस्याकृ तततभर्थवचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥
तभि तभि रूपों में नाट्य करने वािे अतभनेता के
वास्ततवक स्वरूप को तजस प्रकार सािारण दशथक
नही जान पाते , उसी प्रकार सत्त्व प्रिान देवता
तिा ऋतष भी तजनके स्वरूप को नही जानते , फिर
दूसरा सािारण जीव तो कौन जान अिवा वणथन
कर सकता है – वे दुगथम चटरत्र वािे प्रभु मेरी रिा
करें ॥६॥


                     गजेन्द्र-स्तुतत
                    गजेन्द्र स्तुतत

फददृिवो यस्य पदं सुमंगिम
तवमुक्त संगा मुनयः सुसािवः ।
चरन्द्त्यिोकव्रतमव्रणं वने
भूतत्मभूता सुहृदः स मे गततः ॥७॥
आसतक्त से सवथदा छू टे हुए , सम्पूणथ प्रातणयों में
आत्मबुति रिने वािे , सबके अकारण तहतू एवं
अततशय सािु स्वभाव मुतनगण तजनके परम
मंगिमय स्वरूप का सािात्कार करने की इच्छा से
वन में रह कर अिण्ड ब्रह्मचायथ आफद अिौफकक
व्रतों का पािन करते हैं , वे प्रभु ही मेरी गतत हैं
॥७॥


न तवद्यते यस्य न जन्द्म कमथ वा
न नाम रूपे गुणदोष एव वा ।
तिातप िोकाप्ययाम्भवाय यः
स्वमायया तान्द्युिाकमृच्छतत ॥८॥
तजनका हमारी तरह कमथवश ना तो जन्द्म होता है
और न तजनके द्वारा अहंकार प्रेटरत कमथ ही होते हैं,
तजनके तनगुथण स्वरूप का न तो कोई नाम है न रूप

                    गजेन्द्र-स्तुतत
                    गजेन्द्र स्तुतत

ही, फिर भी समयानुसार जगत की सृतष्ट एवं प्रिय
(संहार) के तिये स्वेच्छा से जन्द्म आफद को स्वीकार
करते हैं ॥८॥


तस्मै नमः परे शाय ब्राह्मणेsनन्द्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चयथ कमथणे ॥९॥
उन अितशतक्त संपि परं ब्रह्म परमेश्वर को
नमस्कार है । उन प्राकृ त आकाररतहत एवं अनेको
आकारवािे अद्धभुतकमाथ भगवान को बारं बार
नमस्कार है ॥९॥


नम आत्म प्रदीपाय सातिणे परमात्मने ।
नमो तगरां तवदूराय मनसश्चेतसामतप ॥१०॥
स्वयं प्रकाश एवं सबके सािी परमात्मा को
नमस्कार है । उन प्रभु को जो नम, वाणी एवं
तचिवृतियों से भी सवथिा परे हैं, बार बार
नमस्कार है ॥१०॥



                    गजेन्द्र-स्तुतत
                   गजेन्द्र स्तुतत




सत्त्वेन प्रततिभ्याय नैष्कम्येण तवपतश्चता ।
नमः के वल्यनािाय तनवाथणसुिसंतवदे ॥११॥
तववेकी पुरुष के द्वारा सत्त्वगुणतवतशष्ट तनवृतििमथ
के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोि सुि की
अनुभूतत रूप प्रभु को नमस्कार है ॥११॥


नमः शान्द्ताय घोराय मूढाय गुण िर्थमणे ।
तनर्थवशेषाय साम्याय नमो र्ज्ञानघनाय च ॥१२॥
सत्त्वगुण को स्वीकार करके शान्द्त , रजोगुण को
स्वीकर करके घोर एवं तमोगुण को स्वीकार करके
मूढ से प्रतीत होने वािे, भेद रतहत, अतएव सदा
समभाव से तस्ित र्ज्ञानघन प्रभु को नमस्कार है
॥१२॥




                   गजेन्द्र-स्तुतत
                    गजेन्द्र स्तुतत

िेत्रर्ज्ञाय नमस्तुभ्यं सवाथध्यिाय सातिणे ।
पुरुषायात्ममूिय मूिप्रकृ तये नमः ॥१३॥
शरीर इन्द्रीय आफद के समुदाय रूप सम्पूणथ तपण्डों
के र्ज्ञाता, सबके स्वामी एवं सािी रूप आपको
नमस्कार है । सबके अन्द्तयाथमी , प्रकृ तत के भी परम
कारण, फकन्द्तु स्वयं कारण रतहत प्रभु को नमस्कार
है ॥१३॥


सवेतन्द्रयगुणरष्ट्रे सवथप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः ॥१४॥
सम्पूणथ इतन्द्रयों एवं उनके तवषयों के र्ज्ञाता, समस्त
प्रतीततयों के कारण रूप, सम्पूणथ जड-प्रपंच एवं
सबकी मूिभूता अतवद्या के द्वारा सूतचत होने वािे
तिा सम्पूणथ तवषयों में अतवद्यारूप से भासने वािे
आपको नमस्कार है ॥१४॥




                    गजेन्द्र-स्तुतत
                     गजेन्द्र स्तुतत

नमो नमस्ते तिि कारणाय
तनष्कारणायद्धभुत कारणाय ।
सवाथगमान्द्मायमहाणथवाय
नमोपवगाथय परायणाय ॥१५॥
सबके कारण ककतु स्वयं कारण रतहत तिा कारण
होने पर भी पटरणाम रतहत होने के कारण, अन्द्य
कारणों से तवििण कारण आपको बारम्बार
नमस्कार है । सम्पूणथ वेदों एवं शास्त्रों के परम
तात्पयथ , मोिरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गतत
भगवान को नमस्कार है ॥१५॥ ॥




गुणारतणच्छि तचदूष्मपाय
तत्िोभतवस्िू र्थजत मान्द्साय ।
नैष्कम्यथभावेन तववर्थजतागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोतम ॥१६॥
जो तत्रगुणरूप काष्ठों में तछपे हुए र्ज्ञानरूप अति हैं,
उक्त गुणों में हिचि होने पर तजनके मन में सृतष्ट
                     गजेन्द्र-स्तुतत
                   गजेन्द्र स्तुतत

रचने की बाह्य वृति जागृत हो उठती है तिा आत्म
तत्त्व की भावना के द्वारा तवति तनषेि रूप शास्त्र से
ऊपर उठे हुए र्ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं
प्रकातशत हो रहे हैं उन प्रभु को मैं नमस्कार करता
हूँ ॥१।६॥




मादृक्प्प्रपिपशुपाशतवमोिणाय
मुक्ताय भूटरकरुणाय नमोsियाय ।
स्वांशेन सवथतनुभृन्द्मनतस प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥
मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अतवद्याग्रस्त) जीवों
की अतवद्यारूप िाूँसी को सदा के तिये पूणथरूप से
काट देने वािे अत्यातिक दयािू एवं दया करने में
कभी आिस्य ना करने वािे तनत्यमुक्त प्रभु को
नमस्कार है । अपने अंश से संपूणथ जीवों के मन में
अन्द्तयाथमी रूप से प्रकट रहने वािे सवथ तनयन्द्ता
अनन्द्त परमात्मा आप को नमस्कार है ॥१७॥

                   गजेन्द्र-स्तुतत
                     गजेन्द्र स्तुतत

आत्मात्मजाप्तगृहतविजनेषु सक्तै -
    थ
दुष्प्रापणाय गुणसंगतववर्थजताय ।
मुक्तात्मतभः स्वहृदये पटरभातवताय
र्ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥१८॥
शरीर, पुत्र, तमत्र, घर, संपंिी एवं कु टुंतबयों में
आसक्त िोगों के द्वारा कटठनता से प्राप्त होने वािे
तिा मुक्त पुरुषों के द्वारा अपने हृदय में तनरन्द्तर
तचतन्द्तत र्ज्ञानस्वरूप , सवथसमिथ भगवान को
नमस्कार है ॥१८॥


यं िमथकामािथतवमुतक्तकामा
भजन्द्त इष्टां गततमाप्नुवतन्द्त ।
कक त्वातशषो रात्यतप देहमव्ययं
करोतु मेदभ्रदयो तवमोिणम ॥१९॥
तजन्द्हे िमथ, अतभिातषत भोग, िन तिा मोि की
कामना से भजने वािे िोग अपनी मनचाही गतत
पा िेते हैं अतपतु जो उन्द्हे अन्द्य प्रकार के अयातचत
भोग एवं अतवनाशी पाषथद शरीर भी देते हैं वे
अततशय दयािु प्रभु मुझे इस तवपिी से सदा के

                     गजेन्द्र-स्तुतत
                    गजेन्द्र स्तुतत

तिये उबार िें ॥१९॥


एकातन्द्तनो यस्य न कं चनािथ
वांछतन्द्त ये वै भगवत्प्रपिाः ।
अत्यद्धभुतं तिटरतं सुमंगिं
गायन्द्त आनन्न्द समुरमिाः ॥२०॥
तजनके अनन्द्य भक्त -जो वस्तुतः एकमात्र उन
भगवान के ही शरण है-िमथ , अिथ आफद फकसी भी
पदािथ को नही चाह्ते, अतपतु उन्द्ही के परम
मंगिमय एवं अत्यन्द्त तवििण चटरत्रों का गान
करते हुए आनन्द्द के समुर में गोते िगाते रहते हैं
॥२०॥




तमिरं ब्रह्म परं परे श-
मव्यक्तमाध्यातत्मकयोगगम्यम ।
अतीतन्द्रयं सूिमतमवाततदूर-
मनन्द्तमाद्यं पटरपूणथमीडे ॥२१॥
                   गजेन्द्र-स्तुतत
                     गजेन्द्र स्तुतत

उन अतवनाशी, सवथव्यापक, सवथश्रेष्ठ, ब्रह्माफद के भी
तनयामक, अभक्तों के तिये प्रकट होने पर भी
भतक्तयोग द्वारा प्राप्त करने योग्य, अत्यन्द्त तनकट
होने पर भी माया के आवरण के कारण अत्यन्द्त दूर
प्रतीत होने वािे , इतन्द्रयों के द्वारा अगम्य तिा
अत्यन्द्त दुर्थवर्ज्ञेय, अन्द्तरतहत ककतु सबके आफदकारण
एवं सब ओर से पटरपूणथ उन भगवान की मैं स्तुतत
करता हूँ ॥२१॥


यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा िोकाश्चराचराः ।
               े
नामरूपतवभेदन िल्ग्व्या च किया कृ ताः ॥२२॥
ब्रह्माफद समस्त देवता, चारों वेद तिा संपूणथ
चराचर जीव नाम और आकृ तत भेद से तजनके
अत्यन्द्त िुर अंश के द्वारा रचे गये हैं ॥२२॥


यिार्थचषोिेः सतवतुगथभस्तयो
तनयाथतन्द्त संयान्द्त्यसकृ त स्वरोतचषः ।
तिा यतोयं गुणसंप्रवाहो

                     गजेन्द्र-स्तुतत
                     गजेन्द्र स्तुतत

बुतिमथनः िातन शरीरसगाथः ॥२३॥
तजस प्रकार प्रज्ज्वतित अति से िपटें तिा सूयथ से
फकरणें बार बार तनकिती है और पुनः अपने कारण
मे िीन हो जाती है उसी प्रकार बुति, मन, इतन्द्रयाूँ
और नाना योतनयों के शरीर – यह गुणमय प्रपंच
तजन स्वयंप्रकाश परमात्मा से प्रकट होता है और
पुनः उन्द्ही में िीन हो जात है ॥२३॥


स वै न देवासुरमत्यथततयंग
न स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्द्तुः ।
नायं गुणः कमथ न सि चासन
तनषेिशेषो जयतादशेषः ॥२४॥
वे भगवान न तो देवता हैं न असुर, न मनुष्य हैं न
ततयथक (मनुष्य से नीची – पशु , पिी आफद फकसी)
योतन के प्राणी है । न वे स्त्री हैं न पुरुष और नपुंसक
ही हैं । न वे ऐसे कोई जीव हैं, तजनका इन तीनों ही
श्रेतणयों में समावेश हो सके । न वे गुण हैं न कमथ, न
कायथ हैं न तो कारण ही । सबका तनषेि हो जाने

                    गजेन्द्र-स्तुतत
                    गजेन्द्र स्तुतत

पर जो कु छ बच रहता है, वही उनका स्वरूप है
और वे ही सब कु छ है । ऐसे भगवान मेरे उिार के
तिये आतवभूथत हों ॥२४॥


तजजीतवषे नाहतमहामुया फक-
मन्द्तबथतहश्चावृतयेभयोन्द्या ।
इच्छातम कािेन न यस्य तवप्िव-
स्तस्यात्मिोकावरणस्य मोिम ॥२५॥
मैं इस ग्राह के चंगुि से छू ट कर जीतवत नही रहना
चाहता; क्प्योंफक भीतर और बाहर – सब ओर से
अर्ज्ञान से ढके हुए इस हािी के शरीर से मुझे क्प्या
िेना है । मैं तो आत्मा के प्रकाश को ढक देने वािे
उस अर्ज्ञान की तनवृति चाहता हूँ, तजसका कािक्रम
से अपने आप नाश नही होता , अतपतु भगवान की
दया से अिवा र्ज्ञान के उदय से होता है ॥२५॥


सोsहं तवश्वसृजं तवश्वमतवश्वं तवश्ववेदसम ।
तवश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोतस्म परं पदम ॥२६॥
इस प्रकार मोि का अतभिाषी मैं तवश्व के
                   गजेन्द्र-स्तुतत
                     गजेन्द्र स्तुतत

रतचयता, स्वयं तवश्व के रूप में प्रकट तिा तवश्व से
सवथिा परे , तवश्व को तििौना बनाकर िेिने वािे,
तवश्व में आत्मरूप से व्याप्त , अजन्द्मा, सवथव्यापक
एवं प्राप्त्य वस्तुओं में सवथश्रेष्ठ श्री भगवान को के वि
प्रणाम ही करता हं, उनकी शरण में हूँ ॥२६॥


योगरतन्द्ित कमाथणो हृफद योगतवभातवते ।
योतगनो यं प्रपश्यतन्द्त योगेशं तं नतोsस्म्यहम
॥२७॥
तजन्द्होने भगवद्भतक्त रूप योग के द्वारा कमों को
जिा डािा है, वे योगी िोग उसी योग के द्वारा
शुि फकये हुए अपने हृदय में तजन्द्हे प्रकट हुआ देिते
हैं उन योगेश्वर भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ
॥२७॥


नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-
शतक्तत्रयायातिििीगुणाय ।
प्रपिपािाय दुरन्द्तशक्तये

                     गजेन्द्र-स्तुतत
                    गजेन्द्र स्तुतत

कफदतन्द्रयाणामनवाप्यवत्मथने ॥२८॥
तजनकी तत्रगुणात्मक (सत्त्व-रज-तमरूप ) शतक्तयों
का रागरूप वेग असह्य है, जो सम्पूणथ इतन्द्रयों के
तवषयरूप में प्रतीत हो रहे हैं, तिातप तजनकी
इतन्द्रयाूँ तवषयों में ही रची पची रहती हैं-ऐसे िोगों
को तजनका मागथ भी तमिना असंभव है, उन
शरणागतरिक एवं अपारशतक्तशािी आपको बार
बार नमस्कार है ॥२८॥


नायं वेद स्वमात्मानं यच््क्प्त्याहंतिया हतम ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्द्ततमतोsस्म्यहम ॥२९॥
तजनकी अतवद्या नामक शतक्त के कायथरूप अहंकार
से ढंके हुए अपने स्वरूप को यह जीव जान नही
पाता, उन अपार मतहमा वािे भगवान की मैं शरण
आया हूँ ॥२९॥




                   गजेन्द्र-स्तुतत
                    गजेन्द्र स्तुतत

श्री शुकदेव उवाच – श्री शुकदेवजी ने कहा -


एवं गजेन्द्रमुपवर्थणततनर्थवशेषं
ब्रह्मादयो तवतविलिगतभदातभमानाः ।
नैते यदोपससृपुर्थनतििात्मकत्वात
तत्रातििाममथयो हटररातवरासीत ॥३०॥
तजसने पूवोक्त प्रकार से भगवान के भेदरतहत
तनराकार स्वरूप का वणथन फकया िा , उस गजराज
के समीप जब ब्रह्मा आफद कोई भी देवता नही
आये, जो तभि तभि प्रकार के तवतशष्ट तवग्रहों को
ही अपना स्वरूप मानते हैं, तब सिात श्री हटर-
                               े
जो सबके आत्मा होने के कारण सवथदवस्वरूप हैं-
वहाूँ प्रकट हो गये ॥३०॥


तं तद्वदािथमुपिभ्य जगतिवासः
स्तोत्रं तनशम्य फदतवजैः सह संस्तुवतद्भ : ।
छन्द्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान -
श्चक्रायुिोsभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥३१॥
उपयुथक्त गजराज को उस प्रकार दुःिी देि कर तिा
                   गजेन्द्र-स्तुतत
                  गजेन्द्र स्तुतत

उसके द्वारा पढी हुई स्तुतत को सुन कर
सुदशथनचक्रिारी जगदािार भगवान इच्छानुरूप
वेग वािे गरुड जी की पीठ पर सवार होकर स्तवन
करते हुए देवताओं के साि तत्काि उस स्िान अपर
पहुूँच गये जहाूँ वह हािी िा ।


सोsन्द्तस्सरस्युरुबिेन गृहीत आिो
दृष््वा गरुत्मतत हटर ि उपािचक्रम ।
उतत्िप्य साम्बुजकरं तगरमाह कृ च्छा -
िारायतण्ििगुरो भगवान नम्स्ते ॥३२॥
सरोवर के भीतर महाबिी ग्राह के द्वारा पकडे
जाकर दुःिी हुए उस हािी ने आकाश में गरुड की
पीठ पर सवार चक्र उठाये हुए भगवान श्री हटर को
देिकर अपनी सूूँड को -तजसमें उसने (पूजा के
तिये) कमि का एक िू ि िे रक्प्िा िा-ऊपर
उठाया और बडी ही कटठनाई से “सवथपूज्य भगवान
नारायण आपको प्रणाम है” यह वाक्प्य कहा ॥३२॥




                  गजेन्द्र-स्तुतत
                  गजेन्द्र स्तुतत

तं वीक्ष्य पीतडतमजः सहसावतीयथ
सग्राहमाशु सरसः कृ पयोज्जहार ।
ग्राहाद तवपाटटतमुिादटरणा गजेन्द्रं
सम्पश्यतां हटररमूमुचदुतस्त्रयाणाम ॥३३॥


उसे पीतडत देि कर अजन्द्मा श्री हटर एकाएक गरुड
को छोडकर नीचे झीि पर उतर आये । वे दया से
प्रेटरत हो ग्राहसतहत उस गजराज को तत्काि झीि
से बाहर तनकाि िाये और देवताओं के देिते देिते
चक्र से मुूँह चीर कर उसके चंगुि से हािी को
उबार तिया ॥३३॥




                 गजेन्द्र-स्तुतत

				
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posted:9/7/2012
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