27 Aug. 2012_गुरु-विषयक प्रश्नोत्तर

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27 Aug. 2012_गुरु-विषयक प्रश्नोत्तर Powered By Docstoc
					                      आजकी शुभ तिति–
    अतिक भाद्रपद शुक्ल एकादशी, तव.सं.–२०६९, सोमवार
                     पुरुषोत्तमी एकादशीव्रि

                 गुरु-तवषयक प्रश्नोत्तर

(गि ब्लॉगसे आगेका)
   तवश्वातमत्रपराशरप्रभृियो वािाम्बुपर्ााशना-
                                              ै
          स्िेऽतप स्त्रीमुखपंकजं सुलतलिं दृष्टव मोहं गिााः ।
   शाल्यन्नं सघृिं पयोदतियुिं भुञ्जतति ये मानवा-
        स्िेषातमततद्रयतनग्रहो यदद भवेतित्यस्िरे त्सागरे ॥
                                                (भिृाहररशिक)
       ‘जो वायु-भक्षर् करके ,
जल पीकर और सूखे पत्ते
खाकर रहिे िे, वे तवश्वातमत्र,
पराशर आदद भी तस्त्रयोंके
सुतदर मुखको देखकर मोहको
प्राप्त हो गये, दिर जो लोग
शाली िातय (सांठी चावल)
को घी, दूि और दहीके साि
खािे हैं, वे यदद अपनी
इततद्रयका तनग्रह कर सकें िो
                स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज
मानो तवतिायाचल पवाि समुद्रपर िैरने लगा !’

       ऐसी तस्ितिमें जो जवान तस्त्रयोंको अपनी चेली
बनािे हैं, उनको अपने आश्रममें रखिे हैं, उनका स्वप्नमें भी
कल्यार् हो जायगा‒यह बाि मेरेको जँचिी नहीं ! दिर
उनके िारा आपका भला कै से हो जायगा ? के वल िोखा
ही होगा ।

      प्रश्न‒ऐसा कहिे हैं दक जीवतमुक्त महात्मा भोग भी
भोगे िो उसको दोष नहीं लगिा । क्या यह ठीक है ?

       उत्तर‒ऐसा सम्भव ही नहीं है । जीवतमुक्त भी हो
जाय और भोग भी भोगिा रहे‒यह सवािा असम्भव बाि
है । भोग िो सािनकालमें ही छू ट जािे हैं, दिर तसद्ध
पुरुषको भोग भोगनेकी जरूरि भी क्यों पड़ेगी ? ऐसी
बािें दम्भी-पाखण्डी लोग ही अपना स्वािा तसद्ध करनेके
तलये िै लािे हैं । इसतलये रामायर्में आया है‒

तमिारं भ दंभ रि जोई ।          िा कहँ संि कहइ सब कोई ॥
तनराचार जो श्रुति पि त्यागी । कतलयुग सोइ ग्यानी सो तबरागी ॥
                              (मानस, उत्तरकाण्ड ९८/२,४)

पर तत्रय लंपट कपट सयाने । मोह द्रोह ममिा लपटाने ॥
िेइ अभेदबादी ग्यानी नर । देखा मैं चररत्र कतलजुग कर ॥
                 स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज
                               (मानस, उत्तरकाण्ड १००/१)

       बुद्धािैिसित्त्वस्य         यिेष्टाचरर्ं यदद ।
       शुनां ित्त्वदृशां चैव को भेदोऽशुतच भक्षर्े ॥

       ‘यदद अिैि ित्त्वन रहा िो दिर अिैिका ज्ञान हो
जानेपर भी यिेच्छाचार बना रहा िो दिर अशुद्ध वस्िु
(मांस-मददरा आदद) खानेमें यिेच्छारी ित्त्वज्ञ और कु त्तेमें
भेद ही क्या रह गया ?’

       यस्िु प्रव्रतजिो भूत्वा पुनाः सेवेि मैिुनम् ।
        षतष्टवषासहस्त्रातर् तवष्ठायां जायिे कृ तमाः ॥
                       (सक्तदपुरार्, काशी॰ पू॰ ४०/१०७)

       ‘जो सतयास लेनेके बाद पुनाः स्त्रीसंग करिा है, वह
साठ हजार वषोंिक तवष्ठाका कीड़ा होिा है ।’

       भोगोंका कारर् कामना है और कामनाका सवािा
नाश होनेपर ही जीवतमुतक्त होिी है । भोगोंकी कामना िो
सािककी भी आरम्भमें तमट जािी है । अगर दकसी ग्रतिमें
ऐसी बाि आयी हो दक जीवतमुक्त भोग भी भोगे िो उसको
दोष नहीं लगिा, िो यह बाि उसकी मतहमा बिानेके तलये
हैं, तवति नहीं है । इसका िात्पया भोग भोगनेमें नहीं है ।
जैसे, गीिामें (१८/१७) जीवतमुक्तके तलये आया है दक
                 स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज
‘तजसका अहंकृिभाव नहीं है और तजसकी बुतद्ध तलप्त नहीं
होिी, वह इन सम्पूर्ा प्रातर्योंको मारकर भी न मारिा है
और न बंििा है’ िो इसका िात्पया यह नहीं है दक
जीवतमुक्त महात्मा सम्पूर्ा प्रातर्योंको मार देिा है !

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘क्या गुरु तबना मुतक्त नहीं?’ पुस्िकसे




                   स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज

				
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