; 10 July 2012_भगवत्प्राप्ति गुरुके अधीन नहीं
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10 July 2012_भगवत्प्राप्ति गुरुके अधीन नहीं

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  • pg 1
									                      आजकी शुभ तिति–
          श्रावण कृ ष्ण सप्तमी, तव.सं.–२०६९, मंगलवार

            भगवत्प्रातप्त गुरुके अधीन नहीं
         तजसको        हम
राप्त करना चाहिे हैं,
वह परमात्प्मित्त्व एक
जगह सीतमि नहीं है,
ककसीके कब्जेमें नहीं है,
अगर है िो वह हमें
क्या तनहाल करे गा ?
परमात्प्मित्त्व        िो
रातणमात्रको तनत्प्य राप्त
है । जो उस परमात्प्माित्त्वको जाननेवाले महात्प्मा हैं, वे न
गुरु बनािे हैं, न कोई फीस (भेंट) लेिे हैं, रत्प्युि सबको
चौड़े बिािे हैं । जो गुरु नहीं बनिे, वे जैसी ित्त्वकी बाि
बिा सकिे हैं, वैसी ित्त्वकी बाि गुरु बनानेवाले नहीं बिा
सकिे ।

         सौदा करनेवाले व्यति गुरु नहीं होिे । जो कहिे हैं
कक पहले हमारे तशष्य बनो, कफर हम भगवत्प्रातप्तका

                  स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज
रास्िा बिायेंगे, वे मानो भगवानकी तबक्री करिे हैं । यह
तसद्धान्ि है कक कोई वस्िु तजिने मूल्यमें तमलिी है, वह
वास्िवमें उससे कम मूल्यकी होिी है । जैसे कोई घड़ी सौ
रुपयोंमें तमलिी है िो उसको लेनेमें दूकानदारके सौ रुपये
नहीं लगे हैं । अगर गुरु बनानेसे ही कोई चीज तमलेगी िो
वह गुरुसे कम दामवाली अिााि गुरुसे कमजोर ही होगी ।
कफर उससे हमें भगवान कै से तमल जायँगे ? भगवान
अमूल्य हैं । अमूल्य वस्िु तबना मूल्यके तमलिी है और जो
वस्िु मूल्यसे तमलिी है, वह मूल्यसे कमजोर होिी है ।
                                               ँ
इसतलये कोई कहे के मेरा चेला बनो िो मैं बाि बिाऊगा,
वहाँ हाि जोड़ देना चातहये ! समझ लेना चातहये कक कोई
कालनेतम है ! नकली गुरु बने हुए कालनेतम राक्षसने
हनुमानजीसे कहा िा‒
                    सर मज्जन करर आिुर आवहु ।
                   कदच्छा देऊ ग्यान जेहह पावहु ॥
                                   (मानस, लंकाकाण्ड ५७/४)
        उसकी पोल खुलनेपर हनुमानजीने कहा कक पहले
गुरुदतक्षणा ले लो, पीछे मन्त्र देना और पूँछमें तसर लपेटकर
उसको पछाड़ कदया !

             नारायण !      नारायण !!      नारायण !!!

‒ ‘क्या गुरु तबना मुति नहीं ?’ पुस्िकसे
                   स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज
        संसारके साि एकिा और परमात्प्मासे तभन्निा
मानी हुई है ।
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        तवनाशीसे अपना सम्बन्ध माननेसे अन्िःकरण, कमा
और पदािा‒िीनों ही मतलन हो जािे हैं और तवनाशीसे
माना हुआ सम्बन्ध छू ट जानेसे ये िीनों ही स्विः पतवत्र हो
जािे हैं ।
                ❇❇❇ ❇❇❇ ❇❇❇ ❇❇❇

        जबिक संसारसे संयोग बना रहिा है, िबिक भोग
होिा है, योग नहीं । संसारके संयोगका मनसे सवािा
तवयोग होनेे़पर योग तसद्ध हो जािा है अिााि परमात्प्मासे
अपने स्विःतसद्ध तनत्प्ययोगका अनुभव हो जािा है ।
                ❇❇❇ ❇❇❇ ❇❇❇ ❇❇❇

        उत्प्पति-तवनाशशील वस्िुओंका आश्रय लेकर, उनसे
सम्बन्ध जोड़कर सुख चाहनेवाला मनुष्य कभी सुखी नहीं
हो सकिा‒यह तनयम है ।
                ❇❇❇ ❇❇❇ ❇❇❇ ❇❇❇

                                         (‘अमृि-तबन्दु’ पुस्िकसे)

                 स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज

								
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